हर 100 में से 17 लड़कियां दसवीं से पहले छोड़ देती हैं पढ़ाई

Pragya BhartiPragya Bharti   25 April 2019 6:13 AM GMT

पन्ना, मध्यप्रदेश। भारत में हर साल 100 में से औसतन 17 लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं। ये आंकड़े हाईस्कूल यानी दसवीं कक्षा तक के हैं। शिक्षा शहरों में हमें जितनी अनिवार्य और सुलभ नज़र आती है, गाँव में उतनी ही दुर्लभ और उपेक्षित है। हमारे लिए शिक्षा आधारभूत आवश्यकता है लेकिन गाँव में इसका मोल शायद कुछ भी नहीं; इतना कि मन नहीं होने पर स्कूल छोड़ देना आम बात है।

गाँव कनेक्शन की दो महिला रिपोर्टर्स ने 'दो दीवाने' प्रोजेक्ट के तहत बुंदेलखण्ड क्षेत्र के चित्रकूट, बांदा (उत्तर प्रदेश), सतना और पन्ना जिलों (मध्यप्रदेश) के गाँवों में 500 कि.मी. की यात्रा तय की। इस दौरान हमने जो लड़कियां स्कूल छोड़ चुकी हैं उनसे बात कर जाना कि उन्होंने पढ़ाई क्यों छोड़ी?

जनवार-


मध्यप्रदेश के पन्ना शहर से लगभग 10 किलोमीटर दूर जनवार गाँव में हमें कृष्णा आदिवासी मिली। कृष्णा अपनी उम्र 18 वर्ष बताती हैं। उन्होंने पांचवी कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी। पढ़ाई छोड़ने का कारण पूछने पर वो बताती हैं-

"जब हम पांचवी में थे तो मौसी के छोटे बच्चे थे, उनकी देखभाल के लिए चले गए और तब से पढ़ाई छूट गई।"

कृष्णा अपने माता-पिता की मदद करने के लिए उनके साथ मज़दूरी करती हैं। क्या वो दोबारा पढ़ना चाहेंगी सवाल पर कृष्णा ने गाँव कनेक्शन को बताया कि, "नहीं, अब हम पढ़ना नहीं चाहते। मम्मी-पापा काम करते हैं, उन्हीं की मदद करना है। हमसे छोटे भाई-बहन हैं, वो अकेले कहां तक करेंगे? हम उनका हाथ बंटा रहे हैं।"

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मानव संसाधन विकास मंत्रालय की एक प्रेस रिलीज़ के मुताबिक यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एड्युकेशन की वर्ष 2015-16 की रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में लड़कियों के स्कूल छोड़ने की सालाना औसतन दर (ड्रॉप आउट रेट) 16.88% फीसदी है। हालांकि, लड़कों के ड्रॉप आउट रेट की तुलना में ये कम है। लड़कों का ड्रॉप आउट रेट हर साल 17.21% रहा है। भारत में कुल ड्रॉप आउट रेट 17.06% है। (इसके बाद के आंकड़े उपलब्ध नहीं है)

कैमासन-


पन्ना शहर से लगभग 16 कि.मी. दूर कैमासन गाँव में रहने वालीं रौशनी गोंड बताती हैं कि वो केवल दसवीं तक ही पढ़ाई कर पाईं। रौशनी कहती हैं, "हमें दसवीं से पढ़ाई छोड़ना पड़ा। जब दसवीं कक्षा में पढ़ रहे थे तो अचानक तबियत खराब हो गई़।"

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रौशनी को नहीं पता है कि उन्हें क्या हुआ था। बहुत इलाज करने पर भी उनकी तबियत नहीं ठीक हुई। डॉक्टर्स ने बताया कि उन्हें टी.बी है, जिसके लिए छह महीने दवाई भी खाई लेकिन उनकी हालत में कुछ सुधार नहीं हुआ। गाँव के लोगों और मां-बाप के कहने पर झाड़-फूंक भी कराई लेकिन उसका भी कोई खास असर नहीं हुआ। उनकी हालत अभी भी नाज़ुक बनी हुई है। चलने-फिरने में बहुत दिक्कत होती है। थोड़ा ठीक होती हैं फिर वही कमजोरी हो जाती है।

एक जुलाई 2018 को रौशनी की शादी हो गई। शादी के बाद पढ़ना चाहती हैं पूछने पर रौशनी ने कहा-

"चाहते तो हैं लेकिन घर (ससुराल) में सबसे बड़े हैं। घर की देखभाल करते हैं। तबियत भी ठीक नहीं रहती है तो कैसे पढ़ें?"

रौशनी ये भी बताती हैं कि उनके गाँव में बहुत सी लड़कियां हैं जो प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद पढ़ाई छोड़ देती हैं। उन लड़कियों से हम बात करने सबके घर तक गए लेकिन अधिकतर मजदूरी करने बाहर गई हुई थीं। गांव के एक कोने पर रूपी बाई सरसों साफ करती हुईं मिली। रूपी बाई ने बताया कि उनकी बेटी कौसा बाई स्कूल छोड़ कर घर बैठ गई है। बार-बार बोलने पर भी स्कूल नहीं जाती है।

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रूपी बाई की 16 साल की बेटी कौसाबाई ने केवल सातवीं तक पढ़ाई की है। वो कहती है-

"मैंने पांच साल पहले पढ़ाई छोड़ दी थी क्योंकि स्कूल जाने का मन नहीं था। स्कूल में पढ़ाई तो होती थी लेकिन हमारा मन ही नहीं लगता था वहां। हमें घर में रहना अच्छा लगता है। मां अकेले रहती हैं तो उनकी मदद करने के लिए हमने स्कूल छोड़ दिया। यहीं खाना बनाते हैं, पानी भरते हैं, इस ही तरह दिन बीत जाता है।"

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