एक माझी की कहानी : मेरा अगला जनम भी तेरे चरणों में हो...

लोगों को नदी की सैर कराना और घाटों में रहकर ज़िंदगी बिताते हैं यह नाविक


नदी के किनारे घाट पर रहकर और नदी में अपनी नाव पर लोगों को घुमाना ही इनकी जि़ंदगी का सहारा है। आइए हम आपको उन नाविकों से मिलाते हैं, जिनकी ज़िन्दगी के जीने का जरिया सिर्फ और सिर्फ नाव है। कानपूर के बिठूर घाट पर पिछले 13 वर्षों से नाव चलाने वाले जयंत शुक्ला (71 वर्ष) बताते हैं, "हम जब यहाँ पर पूरा दिन नाव चलाते हैं, लोगों को घुमाते हैं, तब जाकर 200-300 रुपए मिल जाते हैं।"जयंत आगे कहते हैं, "हम यहीं घाट पर ही रहते हैं, जब कोई बुलाता है तो तुरंत आ जाते हैं और लोगों को घुमाते हैं। घाट पर इसलिए रहना पड़ता है क्योंकि तूफ़ान या आंधी आ जाएगी तो हमारी नाव बह जाने का डर रहता है। नाव की भी देखरेख करनी पड़ती है, नाव ही हमारा सहारा है तो हम इसे छोड़ कर भी कहीं जा नहीं सकते हैं।"




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जयंत शुक्ला बताते हैं,"यहाँ पर आने वाले यात्रियों को घुमाने के अलावा उन्हें स्नान करवाते हैं। दूसरे गाँव में ग्रामीणों को छोड़ने जाते हैं तो भाड़ा भी मिल जाता है। हम लोग एक सीमित दायरे के अंदर ही अपना नाव चला सकते हैं और लोगों को घुमा सकते हैं क्योंकि पुल के आगे मछुआरे रहते हैं और वो वहां पर मछलियाँ पकड़ने का काम करते हैं तो उनके क्षेत्र में हम नहीं जा सकते हैं।"नाव चलाने वाले पुरुषोत्तम द्विवेदी बताते हैं, "बरसात के समय जून-जुलाई में जब गंगा जी का पानी का स्तर बढ़ जाता है तब हमें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में कोई भी यात्री नाव की यात्रा करने से डरता है।हमारे लिए बरसात का समय बहुत कठिन होता है। तब हम लोग घर में शक्कर, चाय का इंतजाम भी नहीं कर पाते हैं।" लखनऊ के बख्शी तालाब स्थित चन्द्रिका देवी मंदिर के किनारे में गोमती नदी में नाव चलाने वाले रमेश (35 वर्ष) जोपिछले 20 वर्षों से नाव चला रहे हैं, बताते हैं, "हम नाव लोगों को घुमाने के लिए चलाते हैं। यहाँ पर पहले बहुत नाव चला करती थीं, लेकिन अब धीरे-धीरे कम हो गई हैं। हम लोगों को 10 रुपए में भी घुमाते हैं और 200 रुपए में भी घुमाते हैं। जिस हिसाब से लोग घूमना चाहते हैं उस हिसाब से उनकी सेवा करते हैं।"

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तब पलट गई थी नाव

नाविक रमेशबताते हैं,"एक बार मेरे मना करने के बाद भी मेरे नाव पर 15 लोग सवार हो लिए और बोले चलो, हम लोग साथ में ही चलेंगे। हम उन लोगों को लेकर जा रहे थे, मगर पानी का बहाव उस समय ज्यादा था, नाव पलट गई,लेकिन शुक्र है कि किसी को कोई चोट नहीं पहुंची। दूसरी नाव बुलाकर जल्दी से लोगों को बाहर निकल लिया गया था।नाव चलाने का काम अब वैसा नहीं रह गया है, जैसे पहले हुआ करता था, लेकिन हो आज भी रहा है।"

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