‘मैं हलाला की जलालत नहीं झेल सकती थी’

‘मैं हलाला की जलालत नहीं झेल सकती थी’उनकी जुबानी, जिन्होंने तीन तलाक के दर्द को झेला।

तीन तलाक को खत्म करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अब हलाला और बहु विवाह को लेकर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। ट्रिपल तलाक बिल और विवाद के दौरान गांव कनेक्शन ने जानने की कोशिश थी कि आखिर क्या है हलाला..

अरविंद शुक्ला/नीतू सिंह

लखनऊ। “एक दिन पति (शौहर) ने गुस्से में आकर तलाक दे दिया। कुछ दिनों बाद उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ वो मुझे अपने साथ ले जाना चाहते थे। लेकिन उसके लिए जरूरी था कि मैं हलाला कराऊं। यानि मैं एक दिन के लिए ही किसी मर्द से शादी कर उसके साथ रात बिताऊं, मैं सिर्फ 16 साल की थी, लेकिन मैं जान गई थी ये बहुत गंदी चीज है।” रुबीना (28 वर्ष), तीन तलाक पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर खुशी जताते हुए कहती हैं।

रुबीना खान के पति लगातार उनके परिवार पर दबाव बना रहे थे, यहां तक उनके परिवारवाले भी राजी थी, कि रुबीना हलाला करें और पति के वापस लौट जाएं। कई मौलाना, मौलवी और रिश्तेदारों से इस विषय पर जब बात हुई तो सभी ने यही कहा तलाक के बाद हलाला करना पड़ेगा तभी साथ रह सकते हैं। लेकिन रुबीना ने बहुत पहले ही सीख लिया था कि न मतलब है ना ही होता है।

वो बताती हैं, “जब पति गलती मानकर वापस आता है तो कोशिश होती है कि हलाला उस व्यक्ति से हो जो उसका करीबी जैसे देवर, ससुर, जेठ, जीजा या कोई बहुत करीबी या फिर कोई बाहर का विश्वासपात्र व्यक्ति हो ताकि वो एक रात की शादी और शारीरिक संबंध के बाद तलाक दे सके। लेकिन ये कितना घिनौना है। आज तक जिस देवर या सुसर को पिता या भाई के नजर से देखते हैं उसके साथ सोना, दोबारा नजर कैसे मिलाएंगे, उसी घर में तो पीड़ित महिला को रहना होता है। हलाला मतलब जलालत ही है।”

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रुबीना (दाएं साइड)

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“अगर एक पति ने तलाक तलाक तलाक बोल दिया तो अगले पल से उस महिला के लिए वो घर (ससुराल) पति को देखना भी हराम होता है यही पति के लिए के लिए भी लागू होता है। वो महिला हराम न हो, इसलिए हलाला होता है।”, सामाजिक कार्यकर्ता और खुद तीन तलाक की शिकार अज़रा खातून गांव कनेक्शन को बताती हैं।

हलाला का जन्म हलाल शब्द होता है। अरबी में हलाल का मतलब होता है न्यायसंगत या वैध। निकाह के संबंध में जब तलाकशुदा (हराम हुई) महिला हलाला से गुजरती है तो वो वैध हो जाती है।

घर, परिवार कुछ परिचितों की सलाह के बावजूद रुबीना ने हलाला के लिए मना कर दिया। उन्होंने अकेले रहना मंजूर कर लिया था। शादी टूट गई थी। रुबीना बताती , “पहले तो तलाक ही किसी महिला को पसंद नहीं होता, ऊपर से ये हलाला। पर वो अकेले कहां जाएगी। इस डर से मजबूरी में उसे हलाला कराना पड़ता है और आगे की जिंदगी घुटन में जीनी पड़ती है। अगर कोई महिला तलाक के बाद हलाला का विरोध करती है तो उसके घरवाले उसे सहयोग नहीं करते हैं।”

जब पति गलती मानकर वापस आता है तो कोशिश होती है कि हलाला उस व्यक्ति से हो जो उसका करीबी जैसे देवर, ससुर, जेठ, जीजा या कोई बहुत करीबी या फिर कोई बाहर का विश्वासपात्र ताकि वो एक रात की शादी और शारीरिक संबंध के बाद तलाक दे सके। लेकिन ये कितना घिनौना है।

लंबी लड़ाई के सुप्रीम कोर्ट से तीन तलाक को मिली खुशी को मुस्लिम महिलाएं अपनी जिंदगी की नई सुबह मान मान रही हैं, क्योंकि रुबीना जैसी महिलाओं की संख्या लाखों में है। लखनऊ के कैसरबाग के जिस पुराने लेकिन हवेलीनुमा घर में रुबीना खान से मुलाकात हुई वहीं पर मिली अज़रा खातून इस बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाती हैं।

“ पहले कई साल मारपीट, गाली गलौच का सिलसिला चला, फिर एक दिन उसने (पति) ने तलाक दे दिया। मेरे हाथ में कुछ था नहीं, दो बच्चे थे। उनके लिए कुछ करना था तो काम करने लगी, पैसे भी कमाने लगी थी, कुछ साल बाद शौहर मांफी मांगते हुए मेरा पास आ गया। लेकिन दुनियावाले (घर और रिश्तेदार) वाले बिना हलाला राजी नहीं थे, मैंने साफ कह दिया। रहना है तो ऐसे ही वर्ना नहीं। और मैने उन्हें रख लिया।”

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रख लिया शब्द इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इस बार अजरा ने बहुत कुछ दांव पर लगाया था। वो कहती हैं, “घर वालों ने बोलना बंद कर दिया और कई लोगों ने ताने मारे कि ये अधर्म है। लेकिन मुझे वो ठीक लगा था क्योंकि वो तलाक ही अवैध था, जिसमें धर्म के अऩुसार कुछ हुआ ही नहीं था। क्योंकि उनके तलाक देने का (तीन तलाक) का तरीका ही अवैध था।”

अजरा के मुताबिक कुछ दिनों बाद उनका पति उन्हीं हरकतों पर उतर आया था। और इस बार मैंने उसे निकाल दिया। अजरा अब सद्भभावना ट्रस्ट के साथ जुड़कर ऐसी तमाम महिलाओं को उनका हक दिलाने के लिए लड़ाई लड़ती हैं।

रुबीना अजरा से ज्यादा मुखर हैं और वो चाहती हैं तीन तलाक को अंसवैधानिक बनाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जो कानून बनाने को कहा है वो काफी सख्त बनाया जाए ताकि बहुत सारी रुबीना की जिंदगी बर्बाद न हो। तलाक शब्द आते ही रुबीना के चेहरे के भाव बदल जाते हैं। तलाक के कुछ सालों बाद रुबीना के एक दोस्त ने शादी का प्रस्ताव रखा।

रुबीना को लगा शायद शादी के बाद वो अपने पुराने दर्द से बाहर निकल पाएंगी पर हकीकत में ऐसा हुआ नहीं। शादी के एक दो महीने बाद मारपीट लड़ाई झगड़ा शुरू हो गया। रूबीना ने खुलकर विरोध इसलिए नहीं किया कि कहीं यहाँ भी तलाक की नौबत न जाए और उसे अकेले जिन्दगी गुजारनी पड़े।

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वो बताती हैं, “मेरी पौने दो साल की बेटी ने पेशाब कर दी थी इस बात से सास बहुत नाराज थी, उसी दिन मैं अपने पति के पैर दबा रही थी सास आकर मारने लगीं उस समय मैं सात महीने की गर्भवती थी। उसी शाम पति ने कहा तुम्हारा मूड खराब है तुम्हे घुमा लाते हैं। दिल्ली के शारदा स्टेशन पर ये कहकर रुकने के लिए बोल दिया की 10 मिनट में आतें हैं कुछ काम है आज पांच साल हो गये हैं अभी तक वापस नहीं आये है, दो साल पहले पता चला उन्होंने दूसरी शादी कर ली है।’ लेकिन रुबीना अब आगे बढ़ने का फैसला कर चुकी थी। उन्होंने वापस मुड़ कर नहीं देखा और अपने दो बेटियों और एक बेटे के साथ अलग लड़ाई शुरु कर दी है।

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शाइस्ता अंबर

तीन तलाक के पीड़ितों की संख्या कितनी है इसका लिखित आंकड़ा तो नहीं लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ऐसी महिलाओँ की आवाज़ मुखर जरुर हुई है। ऑल इंडिया मुस्लिम महिला ला बोर्ड की अध्यक्ष और तीन तलाक को लेकर लंबी लड़ाई लड़ने वालीं शाइस्ता अंबर बताती हैं, हजारों है इन महिलाओं की संख्या लेकिन पहले बोलती नही थी अब वो बोलने लगी हैं। दाल में नमक कम हुआ तो तलाक, थोड़ी सी बात तो तलाक। किसी ने पत्ती की तारीफ कर दी तो तलाक, मैसेज, फेसबुक और ईमेल पर तलाक.. कब तक सहें महिलाएं। ये फैसला महिलाओं की आजादी के हक में है। सुप्रीम कोर्ट के फैसला हैसला बढ़ाने वाला है और मैं मांग करती हूं कि सरकार हिंदू मैरिज एक्ट की तरह शरियत को ध्यान में रखकर मुस्लिम के लिए भी कानून बनाए।’

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