एक दलित नेता जो 3 बार मुख्यमंत्री बना, परिवार करता है मजदूरी, राशनकार्ड तक नहीं

गाँव कनेक्शन की नई सीरीज #गाँवयात्रा में बात आज Bihar के तीन बार के मुख्यमंत्री रहे भोला पासवान शास्त्री और उनके गाँव की। #GaonYatra भाग-2

बैरगाछी (पूर्णिया, बिहार)। लोकसभा चुनाव के लिए सबसे ज्यादा घमासान बिहार में है, मैं आपको उसी बिहार के एक गाँव ले चलता हूं। राजनीतिक बदलाव का गवाह रहा ये गाँव अपने आप में कई सवाल भी समेटे है।

ये गाँव बिहार की राजधानी पटना से करीब सवा चार सौ किलोमीटर दूर पूर्णिया जिले में है। गाँव में घुसने पर कुछ खास नहीं लगेगा, वही बांस और फूस वाले घर, उन पर सूखते पुराने कपड़े। यहां के ज्यादातर घरों में चूल्हा मजदूरी से चलता है।

इसी गाँव में सरकारी प्राथमिक स्कूल के पास एक और छोटा सा पक्का भवन है। दिल्ली-नोएडा के 2 बीएचके फ्लैट जितनी जगह में बने इस सामुदायिक भवन के पीछे ही वो घर है, जहां बिहार के तीन बार के मुख्यमंत्री रहे भोला पासवान शास्त्री का जन्म हुआ था।

वही भोला पासवान शास्त्री जो बिहार के पहले दलित मुख्यमंत्री थे, वही भोला पासवान शास्त्री जो राज्यसभा सांसद, इंदिरा गांधी सरकार में केंद्रीय मंत्री और देश में जब पहली पहली बार अनुसूचित और अनुसूचित जनजाति आयोग बना तो वो उसके पहले चेयरमैन थे।

बिहार के तीन बार मुख्यमंत्री रहे भोला पासवान शास्त्री। एक बार केंद्रीय मंत्री का भी संभाला पदभार।बिहार के तीन बार मुख्यमंत्री रहे भोला पासवान शास्त्री। एक बार केंद्रीय मंत्री का भी संभाला पदभार।

भोला पासवान शास्त्री के कोई बच्चा नहीं था, उनके परिवार के लोग आज भी इसी गाँव में रहते हैं। लेकिन वैसे नहीं जैसे आजकल के एक पार्षद या विधायक का परिवार का रहता है। वो मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं। कई घरों में राशन कार्ड तक नहीं है।

भोला पासवान शास्त्री के भतीजे विरंची पासवान बताते हैं, "आज कल कोई विधायक बनता है तो तुरंत उसका तिमंजिला मकान और गाड़ी-घोड़ा हो जाता है। मेरा चाचा तीन-तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री बने, दिल्ली सरकार में रेल मंत्री बने, लेकिन हम लोगों की हालत देखिए..."

"वो बहुत ईमानदार थे, काझा कोठी से हमारे गाँव (बैरगाछी) तक रोड बहुत खराब थी, तो हमने जाकर उनसे कहा कि कम से कम गाँव तक ये रोड बनवा दीजिए, तो वो बोले अगर हमने अपने ही गाँव का विकास कराया तो हमारे ऊपर दाग लग जाएगा। लेकिन मेरे मरने से पहले गाँव की नालियां तक पक्की हो जाएंगी,"विरंची पासवान दो लाइन में अपने चाचा की वो तस्वीर खींच जाते हैं जो आजकल की राजनीति में शायद ही देखने को मिले।

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चाचा की ईमानदारी पर विरंची को गर्व है, लेकिन एक कसक भी है। कसक इस बात की 21 सितंबर को उनकी जयंती पर बिहार के कई बड़े नेता उनके घर आते हैं। तस्वीर (मूर्ति नहीं लगी) पर फूल माला चढ़ाते हैं, किसी ने उनके परिवार की सुध नहीं ली।

विरंची पासवान बताते हैं, "हमारे परिवार में 15 लोग हैं और किसी के पास भी एक बिसवा जमीन नहीं है। हम लोग मेहनत मजदूरी करके गुजारा करते हैं। हमारे घर में कई लोगों के पास तो राशन वाला कार्ड तक नहीं है। राम विलास पासवान से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री जीतनमांझी तक उनके घर आ चुके हैं, लेकिन किसी ने गाँव के वैसे विकास के बारे में कुछ नहीं किया।"

बैरगाछी गाँव में एक सरकारी स्कूल, सोलर टंकी और छोटे से सामुदायिक भवन के अलावा कुछ भी खास नहीं है। हालांकि सड़क अब पक्की है और बिजली भी आ गई है।

बैरगाछी गांव, जहां हुआ था, बिहार के पहले दलित मुख्यमंत्री का जन्म।बैरगाछी गांव, जहां हुआ था, बिहार के पहले दलित मुख्यमंत्री का जन्म।


विरंची बताते हैं, "चाचा ने एक बार कहा था कि उनके मरने से पहले गाँव में सब कुछ होगा लेकिन फिर वो अचानक बीमार पड़ गए उसके बाद किसी ने कोई सुध नहीं ली।"

सन् 1967 में वो पहली बार कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने। ये वो दौर था जब पार्टियों की आपसी टूट-फूट और कलह के चलते तीन गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री अपनी कुर्सी गंवा चुके थे। कांग्रेस ने दलित नेता के तौर पर पासवान को आगे किया और 22 मार्च 1968 को वो मुख्यमंत्री बने, लेकिन गठबंधन की ये सरकार ज्यादा दिन तक नहीं चली और तीन महीने बाद ही भोला पासवान शास्त्री की भी कुर्सी चली गई।

विरंची पासवान, भोला पासवान शास्त्री के भतीजे।

इसके बाद वो दो बार और सीएम बने। चार बार पटना विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे। बिहार के साथ दिल्ली में उनकी जबर्दस्त पकड़ थी। राज्यसभा सांसद चुने जाने के बाद भोला पासवान शास्त्री 1973 इंदिरा गाँधी सरकार में केंद्रीय मंत्री बनें। कुछ समय बाद उन्होंने राजनीति से संन्याय ले लिया था। नौ सितंबर 1984 को बिहार के इस दिग्गज नेता का निधन हो गया।

विरंची बताते हैं, "जब वो बीमार पड़े तो मैं पूर्णिया के कलेक्टर के यहां गया और उनसे खुद को दिल्ली पहुंचाने की बात कही ताकि मैं चाचा से मिल सकूं। किसी तरह मैं दिल्ली पहुंचा था तब रामविलास पासवान के डेरे पर रुका था। बाद में जब उनकी मृत्यु हुई तो मैंने मुखाग्नि दी थी। उनके पास भी कोई संपत्ति नहीं थी।"

सामुदायिक भवन के किनारे से देखने पर एक दरवाजे पर फटा से परदा लटका था, उसके बगल में लगे हैंडपंप का पानी आस-पास कीचड़ फैला था। यही विरंची और उनके तीन बेटे रहते हैं। घर का बंटवारा हो चुका है। घर में गैस सिलेंडर नहीं है और सामने के छप्पर और बरामदे के नीचे तीन चूल्हे चलते हैं।

सामने के एक छोटे से कमरे को दिखाते हुए विरंची कहते हैं, "यहीं जन्म हुआ था उनका (भोला पासवान)। बाद में ये छप्पर गिर गया था, खपरैल रखवा दिया। जब वो पहली बार सीएम बने और गाँव आए तो आसपास के हजारों लोग उनको देखने आए थे। हमारे समाज (पासवान) के भी सैकड़ों लोग थे। लोगों ने उन्हें हाथी पर बैठाया, और कई लोग तो उनकी एक झलक पाने के लिए छप्पर पर चढ़ गए, तब घर में यहां छप्पर था वो भी टूट गया था।"

भोला पासवान शास्त्री चार बार बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और राज्यसभा के सदस्य भी रहे।भोला पासवान शास्त्री चार बार बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और राज्यसभा के सदस्य भी रहे।

चाचा के मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार घर आने का किस्सा विरंची बड़े गर्व से सुना रहे थे। लेकिन सामने बैठी उनकी एक बहू को ये सब पसंद नहीं आ रहा था। अपने ससुर विरंची के कहने के बावजूद वो चुप नहीं हुईं, उनका गुस्सा, नेता, पत्रकार और उन अधिकारियों पर था जो सिर्फ इस परिवार की गरीबी या फिर उनकी जयंती पर फोटो खिंचवाने आते हैं।

मीडिया से खासी नाराज ननकी देवी गुस्सा शांत होने पर कहती हैं, "भोला शास्त्री हमारे ददिया ससुर थे। नाम तो उनका पूरे देश में है, लेकिन उनके घर में कुछ नहीं है। हमारे पास राशन कार्ड नहीं है, न गेहूं मिलता है न चावल। किरोसिन तेल तक नहीं मिल रहा है। लोग आते हैं चूल्हा जलाते हुए फोटो खींचकर ले जाते हैं।"

वो आगे कहती हैं, "राम विलास पासवान, जीनत मांझी आ चुके हैं। साल में एक बार डीएम-इंजीनियर भी आते हैं, उन्हें नहीं देखना चाहिए कि भोला पासवान शास्त्री का परिवार किस हाल में रह रहा है।"

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग के पहले चेयरमैन बनने के बाद इंडिया टुडे ने उनका इंटरव्यू किया था, उसमें इंडिया टुडे ने लिखा कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद रहे भोला पासवान शास्त्री आपनी सादगी भरे जीवन के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपना इंटरव्यू दिल्ली के वेस्टर्न कोर्ट इलाके में अपने वन रूम अपार्टमेंट में दिया।

बैरगाछी के लोगों से बात कीजिए, उन्हें गर्व है कि कोई उनके बीच से निकलकर इस मुकाम तक पहुंचा, लेकिन ज्यादातर लोगों को इस बार का मलाल भी उनके नाम पर राजनीति करने वाले लोगों ने इस गांव को भुला दिया। भोला पासवान शास्त्री के घर के बाहर स्थिति सामुदायिक भवन में अब एक शाम की पाठशाला चलती है, जिसमें एक युवक और विरंची पासवान शास्त्री के परिवार के लोग की दूसरी महिलाओं को पढ़ाते हैं। कुछ घटों के इस स्कूल की बदौलत अब तक अंगूठा लगाने वाली महिलाएं बैंक और दूसरे कागजों पर साइन करने लगी हैं।

बैरागाछी के सरकारी स्कूल में विधानसभा चुनाव के दौरान बनाया गया निर्वाचन केंद्र।बैरागाछी के सरकारी स्कूल में विधानसभा चुनाव के दौरान बनाया गया निर्वाचन केंद्र।



शाम की पाठशाला की पूरी ख़बर यहां पढ़िए- अंगूठाछाप महिलाएं अब अंग्रेजी में बताती हैं नाम

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