यूरोपीय देशों की तरह कब बढ़ेगी भारत में आलू की उत्पादकता

यूरोपीय देशों की तरह कब बढ़ेगी भारत में आलू की उत्पादकताआलू की खेती।

लखनऊ। देश में आलू की खेती का क्षेत्रफल बढ़ने के बाद भी आलू की जितनी पैदावार होनी चाहिए नहीं हो रही है। केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला की एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2020 तक देश को 49 लाख टन आलू का उत्पादन करना होगा इसके लिए आलू की उत्पादकता यूरोपीय देशों की तरह बढ़ाना होगा।

यहां के निदेशक डॉ. स्वरूप कुमार चक्रवर्ती ने बताया, ''भारत में आलू की उत्पादकता अभी 183.3 कुंतल प्रति हेक्टेयर है जबकि बेल्जियम, में 490, न्यूजीलैंड में 450 और ब्रिटेन में 397 कुंतल प्रति हेक्टेयर है। ऐसे आलू की उत्पादकता को बढ़ाना एक कृषि वैज्ञानिकों के लिए एक चुनौती बन गया है, इसलिए यूरोप की तर्ज पर देश में आलू की खेती को लेकर अनुसंधान किया जा रहा है।''

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यूरोपीय देशों में आलू की फसल गर्मी के मौसम में उगाई जाती है और इसका मुख्य भंडारण का मौसम सर्दियों में होता है जबकि, भारत में, 85 प्रतिशत आलू सर्दियों में बोया जाता है और इसका भंडारण लंबी अवधि वाले गर्मी के दिनों में होता है। आलू के भंडारण के लिए इसे 2-4 डिग्री सेन्टीग्रेड तापक्रम पर शीतगृह में रखने की आवश्यकता है जिसमें पर्याप्त लागत आती है। ऐसे मौसम में आलू कंदों में से शर्करा का संचय भी हो जाता है, जो आलू को खराब कर देता है। ऐसे में इस फसल चक्र को बदलने के लिए भी वैज्ञानिक काम कर रहे हैं।

देश में जो आलू पैदा भी हो रहा है वह विदेशों में जितना निर्याता होना चाहिए नहीं हो रहा क्योंकि आलू की खेती और भंडारण को लेकर यहां के लोग जो तकनीक अपना रहे हैं वह मानकों पर खरा नहीं रही है।

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आलू अनुसंधान संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. विजय कुमार दुआ ने बताया, ''विश्व में कुल पैदा हो रहे आलू में भारत का योगदान 7.55 है लेकिन दुनियभर में निर्यात में भारत की हिस्सेदारी मात्र 0.7 प्रतिशत की है। देश में आलू की खुदाई के बाद आलू को विभिन्न कोल्ड स्टोरोज में 2 से लेकर 4 डिग्री सेंटीग्रेड पर भंडारित किया जाता है, जिससे आलू में मिठास आ जाती है। इस प्रकार के आलू प्रसंस्करण के लिए भी अनुउपयुक्त हो जाते हैं।''

उन्होंने बतया कि ऐसे में किसानों को यह जानकारी देने की जरुरत है कि कोल्ड स्टोरेज में आलू को 10 से लेकर 12 डिग्री पर भंडारित करें। केवल बीज वाले आलू को ही 2 से लेकर 4 डिग्री पर भंडारित करना चाहिए।

केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार विश्व की अर्थव्यवस्था में आलू प्रसंस्करण तेजी से उभरता हुआ क्षेत्र है, प्रसंस्करण के लिए आलू की मांग दिनों-दिन बढ़ रही है लेकिन बात अगर भारत की जाए तो यहां पर सालाना उत्पादित हो रहे आलू में मात्र 2 प्रतिशत से भी कम आलू खाद्ध प्रसंस्करण उद्योग में उपयोग हो पा रहा है। अमेरिका अपने कुल वार्षिक आलू उत्पादन का 60 प्रतिशत, नीदरलैंड 47 प्रतिशत और चीन 22 प्रतिशत खाद्ध प्रसंस्करण में उपयोग कर रहा है।

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केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान की ओर से विकसित की गई आलू की 9 किस्में कुफरी चिप्सोना-1, कुफरी चिप्सोना-2, कुफरी चिप्सोना-3, कुफरी ज्योति, कुफरी चन्द्रमुखी, कुफरी लवकार, कुफरी सूर्या, कुफरी हिमसोना और कुफरी फ्राईसोना प्रसंस्करण के उद्देश्य से विकसित की गई हैं। भारत में संगठित क्षेत्र में आलू प्रसंस्करण लगभग एक दशक पहले शुरू हुआ है। केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान की विकसित की गई मुख्य रूप से देशी आलू प्रसंस्करण किस्में कुफरी चिप्सोना-1 और कुफरी चिप्सोना-3 के कारण इस क्षेत्र का प्रसार हुआ। आजकल इन दोनों किस्मों का इस्तेमाल खाद्य प्रसंस्करण में चिप्स और फ्रैन्च फ्राईज बनाने में किया जा रहा है।

आलू की पैदावार बढ़ाने के लिए आलू अनुसंधान संस्थान की तरफ से कृषि वैज्ञानिक आलू प्रजातीय सुधार पर लगातार काम कर रहे हैं, इसी का नतीजा है कि देश के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए अब तक 52 आलू की किस्में तैयार की जा चुकी हैं, जिनमें से केवल 28 किस्मों को उत्तर भारत के मैदानीं इलाकों के लिए तैयार किया गया है।

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संस्थान की तरफ से विकसित की गई किस्मों को भारत के साथ-साथ कई पड़ोसी देशों में उगाया जा रहा है। आलू की किस्म कुफरी चन्द्रमुखी को अफगानिस्तान में, कुफरी ज्योति को नेपाल और भूटान में, कुफरी सिन्दूरी को बंग्लादेश और नेपाल में उगाया जाता है।

17वीं सदी में भारत में आया आलू

देशभर में किचन का अनिवार्य हिस्सा बन चुका आलू का भोजन के रूप में इस्तेमाल कई तरीके से होता है। आलू जिसका वैज्ञानिक नाम सोलेनम ट्यूबरोसम है यह गेहूं, मक्का और चावल के बाद सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसलों में से एक है। पूरी दुनिया में सोलेनेसी परिवार की कंद फसल की लगभग 200 जंगली प्रजातियां हैं। आलू की दक्षिणी अमेरिका की उच्च रेडियन पहाड़ियों से उत्पत्ति हुई, जहां से पहली बार 16वीं सदी के अंत में स्पेनिश विजेताओं के माध्यम से यूरोप में इसकी शुरूआत हुई। वहां पर आलू को एक शीतोष्ण फसल के रूप में विकसित किया गया और बाद में यूरोपीय देशों के औपनिवेशिक विस्तार के परिणामस्वरूप इसे बड़े पैमाने पर दुनिया भर में फैलाया गया। माना जाता है कि भारत में इसे 17वीं सदी में ब्रिटिश मिशनरियों या पुर्तगाली व्यापारियों के माध्यम से लाया गया।

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