महिला किसान दिवस विशेष : महिलाओं को क्यों नहीं मिलता किसान का दर्जा

महिला किसान दिवस विशेष : महिलाओं को क्यों नहीं मिलता किसान का दर्जामहिला किसान या किसान की पत्नी

लखनऊ। ग्रामीण क्षेत्रों घर के काम-काज से लेकर खेतों के भी ज्यादातर कामों की जिम्मेदारी महिलाओं के ही कंधों पर ही होती है, इसके बाद भी उन्हें किसान का दर्जा नहीं मिलता। वो बस किसान की पत्नी के रूप में जानी जाती हैं।

बांदा जिले से लगभग 14 किमी दूर बड़ोखर खुर्द गाँव की रहने वाली सहोदरा (46 वर्ष) की शादी 16 वर्ष की आयु में एक संयुक्त परिवार में हुई। शादी के कुछ सालों के बाद सहोदरा के पति की मृत्यु हो गई और तीन छोटे बच्चों की जिम्मेदारी सहोदरा पर आ गई।

सहोदरा बताती हैं, ''मेरे जेठ ने कहा तुम्हें खेत तो मिल नहीं सकता इसलिए तुम परिवार के साथ रहो, काम करो और खाओ। तब मुझे ये पता भी नहीं था कि जिस खेत पर मैं मजदूरों की तरह मेहनत करती हूं उसकी कानूनी तौर पर हकदार भी मैं ही थी।”

''मैनें 2००9 में आरोह की मदद से अपने अधिकारों को समझा। इसके बाद मैनें एसडीएम को प्रार्थना पत्र दिया और जेठ के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई। काफी संघर्ष के बाद मुझे मेरा खेत कानूनी तौर पर मिल गया।” सहोदरा बताती हैं। आरोह एक अभियान है जिसे गरीबी और असमानता पर काम करने वाली अंतर्राष्ट्रीय स्तर की गैर सरकारी संस्था ऑक्सफेम द्वारा महिला किसानों को उनका हक दिलाने के लिए चलाया जा रहा है।

सहोदरा ने तो संघर्ष करके फिर भी अपना हक पा लिया लेकिन ज्यादातर महिलाएं ये संघर्ष नहीं कर पातीं। ऐसी कई महिलाएं हैं जो पति के साथ या अकेले खेतों पर पूरा काम करती हैं लेकिन उन्हें किसान का दर्जा नहीं दिया जाता। ऑक्सफेम ने उत्तर प्रदेश में एक सर्वे किया था जिसमें ये बात स्पष्ट हुई कि प्रदेश में लगभग 38 प्रतिशत महिलाएं खेतिहर मजदूर हैं। इनमें से महज छह प्रतिशत महिलाओं के पास ही ज़मीन का मालिकाना हक है और केवल एक प्रतिशत महिलाएं ही सरकार द्वारा चलाये जा रहे प्रशिक्षणों में भाग ले पाती हैं।

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गोण्डा जिले से लगभग 23 किमी दूर कुंदरखी गाँव की रहने वाली कावेरी देवी (58) के तीन बेटे थे और पति की मृत्यु के बाद खेत बेटों के नाम हो गया। ''खेत बेटे के नाम हो गया और अब दिक्कत है कि मेरा खर्चा कौन चलाए? तीन बहुएं हैं लेकिन एक जून की रोटी बिना बातें सुनाए नहीं देतीं।” कावेरी देवी आगे झल्लाते हुए कहती हैं, ''नियम कानून समझ नहीं आता इसलिए ये हाल है और बुढ़ापे में अब पुलिस के चक्कर कौन काटने जाये।”

कावेरी जैसी ही कई महिलाएं हैं जो नियमों की जानकारी न होने की वजह से सम्पत्ति पर अपना हक नहीं जता पातीं, जबकि उनका बराबर का अधिकार होता है।

हाईकोर्ट लखनऊ के एडवोकेट डॉ केके शुक्ला बताते हैं, ''पति की संपत्ति पर उसके बेटे, बेटी और पत्नी का बराबर का हक होता है। इसलिए उसकी मृत्यु के बाद ये बराबर बांटी जायेगी।” डॉ शुक्ला आगे बताते हैं, ''अगर ऐसा होता है कि संपति सीधे बेटे के नाम हो जाये तो महिला, लेखपाल और तहसीलदार के पास विरोध में प्रार्थनापत्र दे सकती है। इसके बाद मुकदमा दर्ज करके वो अपनी जमीन पर हिस्सा मांग सकती है।”

काम करने के बाद भी किसान का दर्जा नहीं।

लगातार सरकार द्वारा चलाये जा रहे प्रयासों के बाद भी खेती करने वाली महिलाओं को किसान का दर्जा नहीं मिलता है। यही कारण है कि महिला किसानों से जुड़े आंकड़े देश में कम ही उपलब्ध हैं। उदाहरण के तौर पर महिला किसानों की आत्महत्या के आंकड़े नहीं मिलते क्योंकि वे कभी दर्ज ही नहीं किए गए। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार 1995 से 2005 के बीच लगभग डेढ़ लाख किसानों ने आत्महत्या की, जिसमें महिला किसानों का कोई आंकड़ा नहीं।

'राम मनोहर लोहिया लॉ विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री डॉ संजय सिंह बताते हैं, 'ग्रामीण समाज में आज भी महिलाओं को मालिकाना हक नहीं है, न उसके पास जमीन है और न ही अलग पहचान। इसलिए उसकी आत्महत्या को किसानों की आत्महत्या में रखा ही नहीं जाता।”

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’एकल परिवार में किसान की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी पर पूरा बोझ आ जाता है। महिला अपने बच्चों को पालने के साथ खेती भी करती है। लेकिन फिर भी उसे महिला किसान नहीं बल्कि किसान की पत्नी ही समझा जाता है।”
समाजशास्त्री डॉ संजय सिंह, राम मनोहर लोहिया लॉ विश्वविद्यालय

महिला किसान का दर्जा नहीं।

कुंता देवी ने पाया अपना हक

कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जिन्होंने संघर्ष करके अपना अधिकार पाया। सहारनपुर के छोटे से गाँव की रहने वाली कुंता देवी के पति अचनाक लापता हो गये थे। बच्चे छोटे थे, जब कुंता ने पति के हिस्से की जमीन मांगी तो परिवार ने इसका विरोध किया। अदालत के पास जाने पर पता चला अभी उसे सात वर्ष इतंजार करना पड़ेगा क्योंकि यह तय नहीं है कि उनके पति जीवित हैं या मृत।

कुंता ने तय किया कि वह अपने हक के लिए संघर्ष जारी रखेंगी। कुंता ने अपने पति की ज़मीन पर खेती करना जारी कर दिया। मेहनत की और अपने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया। जब कुंता आरोह अभियान से जुड़ीं तो उन्हें जानकारी मिली जिसके बाद उन्होंने खेत पर नाम दाखिले हेतु अभियान तेज कर दिया। प्रशासन को पति के गुमशुदगी के स्थान पर उसे मृत घोषित करना पड़ा। आज पांच बीघे जमीन कुंता के नाम है।

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