तमिलनाडु में समुद्र से सटा ये पूरा गांव खस की खेती से हो रहा मालामाल

तमिलनाडु में समुद्र से सटा ये पूरा गांव खस की खेती से हो रहा मालामालतमिलनाडु के चन्नाराज खुद करते हैं 100 बीघे में खस की खेती..

सुनामी या साइक्लोन की वजह से हर वर्ष तमिलनाडु के किसान चन्नाराज के खेतों में समुद्र का पानी भर जाता था और दो-तीन महीनों तक भरा रहता था, जिससे कोई फसल नहीं हो पाती थी। लेकिन फिर इस समस्या से निबटने के लिए उन्होंने वेटीवर (खस) की खेती करनी शुरू कर दी, फसल तो होनी शुरू हो गई, लोकिन उसे खोई खरीदने को तैयार नहीं था। इस समस्या के बारे में जब उन्होंने ने सीमैप लखनऊ से सम्पर्क किया तो न सिर्फ उन्हें समस्या की वजह बताई गई बल्कि उनकी समस्या को दूर भी किया गया। आज तमिलनाडु में करीब एक हज़ार एकड़ में खस की खेती की जा रही है।

''हमारे खेतों में सुनामी या साइक्लोन की वजह से समुद्र का पानी भरा रहता था, जिस वजह से कोई फसल नहीं होती थी। फिर मैने खस की खेती करनी शुरू की क्योंकि खस ऐसी जगहों पर भी हो जाता है।'' किसान चन्नाराज तमिलनाडु में कडलूर जिले के नचीकड़ गाँव के रहने वाले हैं। उन्होंने बताया, ''खस की पैदावार तो होने लगी थी लेकिन उसे खरीदने वाले नहीं मिलते थे और जो खरीदते भी थे वो उसकी अच्छी कीमत नहीं देते थे।''

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किसान चन्नाराम लखनऊ के सीमैप में आयोजित किसान मेले में खस के तेल और उसकी जड़ से बने कई तरह के उत्पादों की स्टॉल लगाए हुए थे। उन्होंने बताया कि आज हमारे आसपास के करीब 100 किसान खस की खेती कर रहे हैं। चन्नाराज पिछले करीब 15 वर्षों से खस की खेती कर रहे हैं।

सीमैप में आयोजित किसान मेेले में अपनी स्टॉल पर किसान चन्नाराम।

खस की खेती उसके तेल के लिए की जाती है। जोकि खस के पौधे की जड़ों में पाया जाता है। तेल का उपयोग सुगंधित सुपारी बनाने, परफ्यूमरी तथा शर्बत आदि में किया जाता है। खस की जड़ों से तेल निकालने के बाद जो घास बचती है उससे खिड़की एवं कूलर के पर्दे बनाये जाते हैं। खस की खेती तमिलनाडु के साथ-साथ राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश तथा झारखण्ड में की जाती है।

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एरोमा मिशन की गतिविधियों को देखने वाले सीमैप के वैज्ञानिक आलोक कालरा ने बताया, ''चन्नाराज जिस खस की खेती करते थे उसकी जड़ों में तेल की मात्रा सिर्फ 0.3 प्रतिशत थी जो बहुत कम थी, जिस वजह से उसके खरीददार नहीं मिलते थे।'' उन्होंने गाँव कनेक्शन को आगे बताया, ''उसके बाद हम वहां गए और किसानों से एक नई किस्म 'सिम वृद्धि' की खेती करने का सुझाव दिया। इसके लिए हमने एक ट्रक सिम वृद्धि पंतनगर से वहां भेजा, फिर वहां पर किसानों ने इसकी खेती शुरू कर दी।''

इसके बाद हुए चमत्कारिक बदलाव के बारे में उन्होंने बताया, ''पहले जहां किसानों की खस सिर्फ 100 से 110 रुपए में मुश्किल से बिकती थी आज वहां पर दसियों इंडस्ट्रीज़ खस की जड़ों को खरीदने के लिए वहां पर आती हैं, जो 180 से 190 रुपए किलो के हिसाब से खरीदती हैं। सिम वृद्धि किस्म की खस की जड़ों से डेढ़ से दो प्रतिशत तक तेल निकलता है।'' आलोक कालरा ने बताया कि तमिलनाडु में आज करीब एक हज़ार एकड़ (‍एक एकड़ = 43560 वर्ग फीट) में खस की खेती की जा रही है।

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तराई का क्षेत्र एक पट्टी के रूप में पश्चिम में यमुना नदी से लेकर पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी तक फैला हुआ है तथा इसका बहुत बड़ा भाग नेपाल में पड़ता है। इसके उत्तरी किनारे पर, जहां भाभर (भाभर हिमालय और शिवालिक की पहाड़ियों के दक्षिणी ओर बसा एक क्षेत्र है, जहां पर जलोढ़ ग्रेड हिन्द-गंगा क्षेत्र के मैदानों में मिल जाती है।) का अंत होता है। घाघरा तराई की सबसे बड़ी एवं मुख्य नदी है।

ऐसे क्षेत्रों में किसान वेटीवर (खस) की खेती कर सकते हैं क्योंकि खस एक ऐसी फसल है जो किसी भी तरह का मौसम हो, कितनी भी बाढ़ आ जाए इस फसल को नुकसान नहीं होगा।

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