माेबाइल व टीवी के दौर में खो गए गाँव के आल्हा गीत 

माेबाइल व टीवी के दौर में खो गए गाँव के आल्हा गीत धीरे धीरे गाँवों से खो गए आल्हा गीत।

एक समय था जब गाँवों में भीड़ इकट्ठा होती थी और लोग अपने-अपने घरों से तैयार होकर आल्हा की कहानियां सुनने जाते थे। आल्हा सुनते ही लोगों के बाजुओं में फड़कन और रक्त में उबाल पैदा होने लगता था। लेकिन धीरे धीरे आल्हा का स्वर क्षीण होता गया।

बदलते दौर में जहां मनोरंजन के साधन बदले वहीं आल्हा का चलन भी कम होता गया। अब गाँवों में न पहले जैसे आल्हा के कलाकार बचे हैं और न ही सुनने वाले। कानपुर जिले के शिवराजपुर के रहने वाले रामचन्द्र (65 वर्ष ) पिछले 20 वर्षों से आल्हा में ढोलक बजाते हैं। वो बताते हैं, “वो दौर अब खत्म हो गया जब लोग चाव से आल्हा सुनते थे। युवा पीढी के लिए अब टीवी, मोबाइल ही मनोरंजन का साधन है और पुरानी पीढ़ी जिसे ये पंसद था वो खत्म होती जा रही है।”

वो आगे बताते हैं, “आल्हा अब कभी कभार ही होता है, वो भी पहले जैसे नहीं, जवाबी कीर्तनों में ही गाया जाता है। अब तो कलाकार अगर इसके भरोसे ही रहें तो उन्हें खाने के लाले पड़ जाएं। हमें साथ ही दूसरा कोई कमाई का जरिया ढूढना पड़ता है।”

आल्हा और ऊदल दो भाई थे। ये बुन्देलखण्ड (महोबा) के वीर योद्धा थे, इनकी वीरता की कहानी ही आल्हा में गाई जाती है। जगनिक ने आल्ह-खण्ड नामक एक काव्य की रचा भी की थी उसमें इन वीरों की गाथा का वर्णन है।

बाराबंकी जिले के अटवटमऊ गाँव के रहने वाले रामनारायण (75वर्ष) बताते हैं, “पहले गाँवों में सावन में खासकर चौपालें लगती थीं और तब से आल्हा गाया जाने लगता था। घर की महिलाएं, आदमी सब अपना कामकाज निपटाकर ये गीत सुनने चल देते थे। लेकिन अब कहां ये सब बचा। गाँव शहर होते जा रहे हैं, वैसे ही मनोरंजन के साधन भी बदल गए हैं।”

ये भी पढ़ें: #स्वयंफेस्टिवलः नैना के आल्हा को सुनकर फड़क उठी लोगों की भुजाएं

आल्हा किस तरह गाया जाता था इस बारे में कानपुर के ही अल्हैता लाखन सिंह (50वर्ष) बताते हैं, “आल्हा में 55, 56 लड़ाईयां गाई जाती हैं। आल्हा गायन के साथ वाद्य यंत्रों में ढोलक, झांझ, मंजीरा बजाए जाते हैं। वहीं ब्रज क्षेत्र में आल्हा के साथ सारंगी भी बजती है। आल्हा में धीरे धीरे लय तेज होती जाती है। हमारे पास ढोलक होती है जैसे जैसे गाने के बोल तेज होते हैं ढोलक की थाप भी तेज हो जाती है।”

अाल्हा कैसे सीखा इस बारे में लाखन बताते हैं, “हमारे बड़े भाई किताबें पढ़ते थे उसमें आल्हा हम भी सुनते थे। हमें बहुत अच्छा लगता था तो धीरे धीरे हम गाने भी लगे। पहले तो जब गाने जाते थे गाँवों में हजारों की भीड़ लगती थी। सम्मान मिलता था लेकिन अब ऐसा नहीं है, बहुत कम प्रोग्राम होते हैं बरसात में वो भी सिर्फ।”

ये भी पढ़ें: सौ वर्षों से उन्नाव के इस मंदिर में लग रहा है मेला

ये भी पढ़ें: नृत्य और संगीत से श्रोताओं को किया मंत्रमुग्ध

Share it
Top