दुर्गा खोटे, जिन्होंने फ़िल्मों में महिलाओं की राह आसान बनाई

vineet bajpaivineet bajpai   14 Jan 2019 5:47 AM GMT

दुर्गा खोटे, जिन्होंने फ़िल्मों में महिलाओं की राह आसान बनाईआज दुर्गा खेटे का जन्मदिन है।

दुर्गा खोटे अपने ज़माने में हिन्दी व मराठी फ़िल्मों की प्रसिद्ध अभिनेत्री थीं। उन्होंने अनेक हिट फ़िल्मों में शानदार अभिनय किया। शुरुआती फ़िल्मों में नायिका की भूमिकाएँ करने के बाद जब वे चरित्र अभिनेत्री की भूमिकाओं में दर्शकों के सामने आईं, तब उनके बेमिसाल अभिनय को आज तक लोग याद करते हैं। दुर्गा खोटे ने क़रीब 200 फ़िल्मों के साथ ही सैंकड़ों नाटकों में भी अभिनय किया और फ़िल्मों को लेकर सामजिक वर्जनाओं को दूर करने में अहम भूमिका निभाई। हिंदी एवं मराठी फ़िल्मों के अलावा रंगमंच की दुनिया में क़रीब पांच दशक तक सक्रिय रहीं दुर्गा खोटे अपने दौर की प्रमुख हस्तियों में थी जिन्होंने फ़िल्मों में महिलाओं की राह आसान बनाई।

एक प्रतिष्ठित परिवार में 14 जनवरी 1905 को पैदा हुईं दुर्गा खोटे का शुरुआती जीवन सुखमय नहीं रहा और मात्र 26 साल की उम्र में ही उनके पति का निधन हो गया। दुर्गा खोटे का बचपन तो सामान्य रूप से कटा लेकिन अपनी पसन्द से विवाह के बाद भी उनका घरेलू जीवन बहुत ही कठिन व दुख से भरा रहा। अपने पति की ओर से बेहद परेशान रही दुर्गा को जो कुछ खुशी मिली, वह अपने बच्चों से ही मिली। पति के निधन के बाद दुर्गा खोटे पर दो बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी भी आ गई थी। ऐसे में उन्होंने फ़िल्मों की राह ली।

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वर्ष 1936 में आई फिल्म अमर ज्योति के एक सीन में दुर्गा खोटो।

दुर्गा खोटे मूक फ़िल्मों के दौर में ही फ़िल्मों में आ गई थी और 'फरेबी जाल' उनकी पहली फ़िल्म थी। बतौर नायिका 'अयोध्येचा राजा' उनकी पहली फ़िल्म थी जो मराठी के साथ साथ हिंदी में भी थी। यह फ़िल्म कामयाब रही और दुर्गा खोटे नायिका के रूप में सिनेमा की दुनिया में स्थापित हो गईं। दुर्गा खोटे की कामयाबी ने कइयों को प्रेरित किया और हिंदी फ़िल्मों से जुड़ी सामाजिक वर्जना टूटने लगी।

दुर्गा खोटे के फ़िल्मों में आने से पहले महिलाएं फिल्मों में बहुत कम काम करती थीं ज्यादातर पुरुष ही महिलाओं का रोल निभाते थे। हिन्दी फ़िल्मों के पितामह दादा साहेब फाल्के ने जब पहली हिन्दी फीचर फ़िल्म "राजा हरिश्चंद्र" बनायी तो उन्हें राजा हरिश्चंद्र की पत्नी तारामती का किरदार निभाने के लिए कोई महिला नहीं मिली। उन्हें मजबूर होकर एक युवक सालुंके से यह भूमिका करानी पड़ी।

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उन्होंने 1931 में प्रभात फ़िल्म कम्पनी की मूक फ़िल्म 'फरेबी जाल' में एक छोटी सी भूमिका से अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत की लेकिन उनका अनुभव अच्छा नहीं रहा और फ़िल्मों से उनका मोहभंग हो गया था। वह शायद फिर फ़िल्मों में काम नहीं करतीं लेकिन निर्माता-निर्देशक वी. शांताराम ने उन्हें मराठी और हिन्दी भाषाओं में बनने वाली अपनी अगली फ़िल्म 'अयोध्येचा राजा' 1932, में रानी तारामती की भूमिका के लिए किसी तरह मना लिया। उन्होंने इस काम के लिए फ़िल्म के नायक गोविंदराव तेम्बे की मदद ली। कहा जाता है कि तेम्बे शांताराम बापू के साथ दुर्गा खोटे के घर इतनी बार गए कि उनका रंग काला पड गया और लोग कहने लगे थे कि उन्हें 'अयोध्येचा राजा' कहा जाए या 'अफ्रीकाचा राजा' बोला जाए।

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मराठी की इस पहली सवाक् फ़िल्म की जबरदस्त कामयाबी के बाद दुर्गा खोटे ने फिर पलट कर नहीं देखा। प्रभात फ़िल्म कंपनी की ही 1936 में बनी फ़िल्म 'अमर ज्योति' से वह सुर्खियों में आ गयीं। 1934 में कलकत्ता की ईस्ट इंडिया फ़िल्म कंपनी ने 'सीता' फ़िल्म का निर्माण किया, जिसमें उनके नायक पृथ्वीराज कपूर थे। देवकी कुमार बोस निर्देशित इस फ़िल्म में उनके दमदार अभिनय ने उन्हें शीर्ष अभिनेत्रियों की कतार में खडा कर दिया। वह भारतीय अभिनेत्रियों की कई पीढ़ियों की प्रेरणास्रोत रहीं। इनमें शोभना समर्थ जैसी नायिकाएं भी शामिल थीं जो बताया करती थीं कि किस तरह दुर्गा खोटे से उन्हें प्रेरणा मिली। इस हस्ती का 22 सितंबर 1991 में निधन हो गया।

यादगार फ़िल्में

हिंदी फ़िल्मों में उन्हें माँ की भूमिका के लिए विशेष रूप से याद किया जाता है। फ़िल्मकार के. आसिफ की बहुचर्चित फ़िल्म मुग़ल ए आजम में जहाँ उन्होंने सलीम की माँ जोधाबाई की यादगार भूमिका निभाई वहीं उन्होंने विजय भट्ट की 'भरत मिलाप' में कैकेई की भूमिका को भी जीवंत बना दिया। बतौर माँ उन्होंने चरणों की दासी, मिर्जा गालिब, बॉबी, विदाई जैसी फ़िल्मों में भी बेहतरीन भूमिका की।

निर्माण एवं निर्देशन

अभिनय के अलावा दुर्गा खोटे ने लंबे समय तक लघु फ़िल्में, विज्ञापन फ़िल्में, वृत्त चित्रों और धारावाहिकों का भी निर्माण किया। दुर्गा खोटे ने वर्ष 1937 में 'साथी' नाम की एक फ़िल्म का निर्माण और निर्देशन भी किया।

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