हसरत मोहानी की 5 नज़्में...

हसरत मोहानी की 5 नज़्में...मौलाना हसरत मोहानी

अाज मशहूर शायर हसरत मोहानी का जन्मदिन है। उनका जन्म 1 जनवरी 1875 को उत्तर प्रदेश के मोहान में हुआ था। ऐसा कहते हैं कि उर्दू की शायरी में हसरत से पहले औरतों को वो मकाम हासिल नहीं था। आज की शायरी में औरत को जो साहयात्री और मित्र के रूप में देखा जाता है वह कहीं न कहीं हसरत मोहानी की ही देन है। शायद ही कोई शख्स होगा जिसे उनकी लिखी गज़ल 'चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है' पसंद न हो। इस ग़ज़ल को गुलाम अली ने गाया और बाद में 'निकाह' फिल्म में भी इस ग़ज़ल को शामिल किया गया। आज उनके जन्मदिन पर पढ़िए उनकी ये पांच नज़्में...

1. इश्क़े-बुतां को जी का जंजाल कर लिया है

इश्क़े-बुताँ को जी का जंजाल कर लिया है
आख़िर में मैंने अपना क्या हाल कर लिया है

संजीदा(1) बन के बैठो अब क्यों न तुम कि पहले
अच्छी तरह से मुझको पामाल (2) कर लिया है

नादिम (3) हूँ जान देकर, आँखों को तूने ज़ालिम
रो-रो के बाद मेरे क्यों लाल कर लिया है

1. गम्भीर, 2. पद-दलित, 3. लज्जित

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2. मातम न हो क्यों भारत में बपा दुनिया से सिधारे आज तिलक

मातम न हो क्यों भारत में बपा दुनिया से सिधारे आज तिलक (1)
बलवन्त तिलक, महराज तिलक, आज़ादों के सरताज तिलक
जब तक वो रहे, दुनिया में रहा हम सब के दिलों पर ज़ोर उनका
अब रहके बहिश्त में निज़्दे-ख़ुदा (2) हूरों पे करेंगे राज तिलक
हर हिन्दू का मज़बूत है जी, गीता की ये बात है दिल पे लिखी
आख़िर में जो ख़ुद भी कहा है यहीं फिर आएंगे महराज तिलक

1. लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, 2. ईश्वर के पास

3. चुपके-चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है

चुपके-चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

बा-हज़ाराँ इज़्तराब-ओ-सद हज़ाराँ इश्तियाक़ (1)
तुझसे वो पहले-पहल दिल का लगाना याद है

तुझसे मिलते ही वो बेबाक हो जाना मेरा
और तेरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है

खेंच लेना वोह मेरा परदे का कोना दफ़तन(2)
और दुपट्टे से तेरा वो मुँह छुपाना याद है

जानकार सोता तुझे वो क़स्दे पा-बोसी (3) मेरा
और तेरा ठुकरा के सर वो मुस्कराना याद है

तुझको जब तन्हा कभी पाना तो अज़ राहे-लिहाज़
हाले दिल बातों ही बातों में जताना याद है

जब सिवा मेरे तुम्हारा कोई दीवाना न था
सच कहो क्या तुमको भी वो कारख़ाना (4) याद है

ग़ैर की नज़रों से बच कर सबकी मरज़ी के ख़िलाफ़
वो तेरा चोरी छिपे रातों को आना याद है

आ गया गर बस्ल की शब (5) भी कहीं ज़िक्रे-फ़िराक़ (6)
वो तेरा रो-रो के मुझको भी रुलाना याद है

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए
वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है

देखना मुझको जो बरगशता तो सौ-सौ नाज़ से
जब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है

चोरी-चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है

बावजूदे-इद्दआ-ए-इत्तिक़ा (7) ‘हसरत’ मुझे
आज तक अहद-ए-हवस का वो ज़माना याद है

1. असीम बेचैनी और अति-उत्सुकता के साथ, 2. अचानक, 3. पाँव चूमने का प्रयास, 4. समय, 5. मिलन की रात, 6. विरह की बात, 7. पवित्रता की कस्मों के बावजूद

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4. ख़ू समझ में नहीं आती तेरे दीवानों की

ख़ू (1) समझ में नहीं आती तेरे दीवानों की
जिनको दामन की ख़बर है न गिरेबानों की

आँख वाले तेरी सूरत पे मिटे जाते हैं
शम‍अ़-महफ़िल की तरफ़ भीड़ है परवानों की

राज़े-ग़म से हमें आगाह किया ख़ूब किया
कुछ निहायत(2) ही नहीं आपके अहसानों की

आशिक़ों ही का जिगर है कि हैं ख़ुरसंदे-ज़फ़ा(3)
काफ़िरों की है ये हिम्मत न मुसलमानों की

याद फिर ताज़ा हुई हाल से तेरे 'हसरत'
क़ैसो-फ़रहाद के भूले हुए अफ़सानों की

1. आदत, 2. हद, 3. अकृपा पर भी प्रसन्न

5. याद हैं सारे वो ऐशे-बा-फ़राग़त के मज़े

याद हैं सारे वो ऐशे-बा-फ़राग़त (1) के मज़े
दिल अभी भूला नहीं आग़ाज़-उल्फ़त(2) के मज़े

वो सरापा (3) नाज़ (4) था बेग़ाना-ए-रस्म-ए-जफ़k (5)
और मुझे हासिल थे लुत्फ़े-बे-निहायत(6) के मज़े

हुस्न से अपने वो ग़ाफ़िल(7) था, मैं अपने इश्क़ से
अब कहाँ से लाऊँ वो नावाक़फ़ीयत के मज़े(8)

मेरी जानिब(9) से निगाहे शौक़ की बेताबियाँ
यार की जानिब से आग़ाज़े-शरारत(10) के मज़े

याद हैं वो हुस्नो-ओ-उल्फ़त की निराली शोख़ियाँ
इल्तमास-ए-उज़्र-ओ-तमहीद-ए-शिकायत के मज़े

सेहतें लाखों मेरी बीमारी-ए-ग़म (11) पर निसार(12)
जिस में उठ्ठे बारहा उनकी अयादत(13) के मज़े

1 ख़ाली समय के आनंद, 2. प्रेमारंभ, 3. सर से पाँव तक, 4. सुन्दरता, 5. जफ़ा की रस्म से अनभिज्ञ, 6. असीम आनंद, 7. अनभिज्ञ, 8. अज्ञानता का आनंद, 9. ओर, 10. शरारत का आरंभ, 11. ग़म की बीमारी, 12. न्योछावर, 13. आग

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