दिल्ली की देहरी: दिल्ली का दिलबसा कवि, ग़ालिब

Nalin ChauhanNalin Chauhan   27 Dec 2017 11:02 AM GMT

दिल्ली की देहरी:  दिल्ली का दिलबसा कवि, ग़ालिबदिल्ली शहर और ग़ालिब

इतिहास केवल चक्रवर्ती सम्राटों, उनके साम्राज्यों और विजय-पराजय की गाथा नहीं होता है। असली इतिहास अपने समय की छोटी-बड़ी घटनाओं को भिन्न दृष्टिकोण से देखने वाले रचनाधर्मी कवि-कथाकार का साथी-सहचर होता है। यही कारण होता है कि कालांतर में रचनाकार के कृतित्व में उस काल विशेष के दिग्दर्शन होते हैं।

देहली के आठवें शहर शाहजहांनाबाद के बल्लीमारान की गली कासिम जान की हवेली आज एक ऐसे ही व्यक्तित्व का स्मारक संग्रहालय है। उल्लेखनीय है कि एक समय में यह फारसी और उर्दू के प्रसिद्ध व्यक्तित्व का ठिकाना था, जिसने इस ठौर में न केवल अपने जीवन का एक बड़ा समय एक किराएदार के रूप में बिताया बल्कि यही अंतिम सांस ली। तत्कालीन दरबारी इतिहास में इस भवन सहित शहर के चरित्र सरीखी साधारण वस्तुओं से इस असाधारण व्यक्ति के संबंध कोलेकर पसरा मौन दरबार के रोजनामचे में भी दर्ज नहीं है।

है अब इस मामूरे में कहत-ऍ-ग़म-ऍ-उल्फ़त असद

हमने ये माना कि दिल्ली में रहें खावेंगे क्या

इस असाधारण व्यक्ति, गालिब का पूरा नाम असदुल्लाह था और उनका तखल्लुस पहले 'असद' था बाद में 'गालिब' रखा। असदुल्ला खान मिर्ज़ा ग़ालिब के बारे में मीर का मानना था कि अगर इस लड़के को कोई कामिल उस्ताद मिल गया और उसने इसे सीधे रास्ते पर डाल दिया, तो लाजवाब शायर बनेगा, वरना मोहमल (अर्थहीन) बकने लगेगा। अचरज की बात है कि 180000 से ज्यादा ग़ज़ल लिख चुके मीर केवल 1500 शेरों के मालिक "ग़ालिब" की तुलना में कम जाने जाते हैं। मिर्ज़ा गालिब ने अपने फारसी के 6600 शेर और उर्दू के 1100 शेर वाले दीवान पूरे किए थे। उनका संग्रह 'दीवान' कहलाता है। दीवान का सीधा सा अर्थ है शेरों का संग्रह।

शाहजहांनाबाद के बल्लीमारान की गली में स्थित ग‍़ालिब की हवेली।

अचरज नहीं कि अंग्रेजों की नयी दिल्ली में गालिब दूसरे को पीछे छोड़ने की महानगरीय दौड़ में कहीं पीछे छूटे लगते हैं। इस स्मारक के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गुलजार के शब्दों में, "मिर्जा गालिब को उनकी वर्षगांठ पर याद करके हम कुछ खास नहीं कर रहे हैं। उनका घर एक कोयला गोदाम में तब्दील हो गया था बाद में अटल बिहारी वाजपेयी ने इस स्मारक को सहेजने के लिए कदम उठाए। अब गालिब का घर एक संग्रहालय है और वहां एक मकबरा है, जहां हम हर साल उनकी वर्षगांठ पर पहुंचते हैं।"

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अफ़सोस की बात यह है कि आगरा की जिस हवेली में मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्म 27 दिसंबर 1797 को हुआ था, वह आज एक लड़कियों के एक कॉलेज में तबदील हो चुका है। आगरा के काला महल नामी इलाक़े के लोगों को ये भी नहीं मालूम उर्दू का महान कवि मिर्ज़ा ग़ालिब यहीं पैदा हुए थे। वहीं दूसरी ओर, मुग़लों की देहली यानि शाहजहांनाबाद में गालिब ने अपने जीवन के करीब पचपन बरस बिताएं। ग़ालिब का अधिकतर जीवन गली कासिम जान में बीता। दिल्ली के भूगोल के हिसाब से यह गली आज के चाँदनी चौक से मुड़कर बल्लीमारान के भीतर जाने पर शम्शी दवाखाना और हकीम शरीफखाँ की मस्जिद के बीच में है।

बल्ली मारां की वो पेचीदा दलीलों की-सी गलियाँ

एक कुरआने सुखन का सफ्हा खुलता है

असद उल्लाह खाँ गालिब का पता मिलता है

अगर इतिहास के पृष्ठों को पलटे तो पता लगता है कि एक समय में बल्लीमारान श्रेष्ठ नाविकों का घर था। सो इस स्थान का नाम बल्लीमारान पड़ा यानी बल्ली मारने वाले। इसी गली में, गालिब के चाचा का विवाह कासिमजान (जिनके नाम पर यह गली है) के भाई आरिफजान की बेटी से हुआ था और बाद में जब गालिब का विवाह हुआ तो उनकी बारात आरिफजान की पोती और लोहारू के नवाब की भतीजी, उमराव बेगम के लिए इसी गली में आई। और भाग्य का फेरा देखिये कि साठ बरस बाद जब उनका देहांत हुआ तो शब्दों के चितेरे वृद्ध कवि की अंतिम यात्रा इसी गली से निकली। इस दृष्टि से यह हवेली, गालिब के जीवन के प्रतीक से अधिक उनका मृत्यु शिलालेख है।

दिल्ली के रहने वालों असद को सताओ मत।

बेचारा चंद रोज का यां मेहमान है।

तत्कालीन शाहजहांनाबाद की गली कासिम जान में गालिब के अलावा अनेक नवाबों की हवेलियाँ भी थी। उस समय की दिल्ली पर "द लास्ट मुग़ल" किताब लिखने वाले विलियम डेलरिम्पल ने अनुसार, यह नवाबों का प्रभाव था कि देश के पहले स्वतन्त्रता संग्राम (1857) के बाद दिल्ली में हुई मारकाट से बल्लीमारान बचा रह गया था। गालिब ने 1858 में अपने शागिर्द मुंशी हरगोपाल तफ्ता के नाम लिखी चिट्ठी में ग़ालिब ने ग़दर का हाल बयान किया है।

"अंग्रेज की कौम से जो इन रूसियाह कालों के हाथ से कत्ल हुए,

उसमें कोई मेरा उम्मीदगाह था और कोई मेरा शागिर्द।

हाय, इतने यार मरे कि जो अब मैं मरूँगा

तो मेरा कोई रोने वाला भी न होगा।"

इस बात को ध्यान में रखते हुए अगर प्रश्न किया जाए कि क्या गालिब दिल्ली के जनसाधारण की सोच में जिंदा है? और अगर हाँ तब कैसे और नहीं तो क्यों। दिल्ली में गालिब की उपस्थिति एक ऐतिहासिक तथ्य तो है उनकी मृत्यु भी क्योंकि आखिर उनका मकबरा भी निज़ामुद्दीन में ही है। और सचमुच में गालिब के नयी दिल्ली के अंग्रेजों की राजधानी बनने से पहले ही गालिब इस दुनिया-ए-फानी को अलविदा कह गये। शायद यही कारण है कि वे आज की नयी दिल्ली की कहानी से गायब है। शायद इस भावी तिरस्कार और एकाकीपन का उन्हें पूर्वाभास हो गया था। जो इन पंक्तियों में प्रकट होता है,

लेता नहीं मेरे दिल ए आवारा की खबर

अब तक वो जानता है कि मेरे पास है

गालिब के निधन के पश्चात ग़ालिब के दो समकालीनों ने उनकी जीवनियाँ लिखी। मोहम्मद अल्ताफ हुसैन 'हाली' ने 'यादगारे-ए-ग़ालिब' (1897) और मिर्जा मोज 'हयात-ए-ग़ालिब' (1899)। ये जीवनियाँ हमें उनके जीवन और समय को समझने की अंतदृष्टि प्रदान करती है। ग़ालिब के उर्दू दीवान का पहला संस्करण 1841 में प्रकाशित हुआ। 'मयखाना-ए-आरजू' शीर्षक के अंतर्गत फारसी लेखक का संग्रह 1895 में प्रकाशित हुआ। उनकी फारसी डायरी 'दस्तम्बू' (1858) सिपाही विद्रोह और दिल्ली पर इसके प्रभाव का प्रामाणिक दस्तावेज है।

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1868 में 'कुल्लियत-ए-नत्र-ए-फारसी-ए ग़ालिब' नाम से उनका फारसी लेखन का एक और संग्रह प्रकाशित हुआ जिसमे पत्र, प्राक्कथन, टिप्पणियाँ आदि थे। एक गद्य लेखक के रूप में उनकी ख्यति उनके पत्रों के कारण है, जो 'उद्-ए-हिंदी' (1868) और 'उर्दू-ए-मुअल्ला' (1869) नाम के दो संकलनों में प्रकाशित है। ग़ालिब से पहले उर्दू शायरी गुल-बुलबुल और हुस्‍न-औ-इश्‍क की चिकनी-चुपड़ी बातें हुआ करती थी। उन्‍हें वे 'गजल की तंग गली' कहा करते थे। ग़ालिब के पुख्‍ता शेर उस गली से नहीं निकल सकते थे। यह एक कम जानी बात है कि गालिब का बस एक ही ब्लैक एंड व्हाइट फोटो है, जिसके आधार पर अनेक कलाकारों ने चित्र बनाए हैं। गालिब के दौर में पिन-होल कैमरा नया-नया आया था और उस समय इस कैमरे से अवध के नवाब वाजिद अली शाह और गालिब के दोस्त बहादुर शाह जफर के फोटो भी लिए गए थे। गालिब का पहला और एक तरह से अंतिम फोटो दिल्ली के फोटोग्राफर रहमत अली ने उतारा था। अफसोसजनक बात यह है कि आज रहमत अली का नाम और काम दोनों ही दुनिया की नजरों से ओझल है, दूसरे शब्दों में इतिहास की किताब में रहमत अली का पन्ना गायब है।

शाहजहांनाबाद के बल्लीमारान की गली में स्थित ग‍़ालिब की हवेली।

दिल्ली की आज की पीढ़ी को शायद ही इस सच्चाई का आभास हो कि उर्दू काव्य का यह शीर्ष कवि दिल्ली में ही दफन है। तिस पर शायद कम लोग ही इस तथ्य से परिचित होंगे कि दक्षिणी दिल्ली की बस्ती निज़ामुद्दीन में गालिब की मजार हिन्दी ऐतिहासिक फिल्मों के निर्माता-अभिनेता सोहराब मोदी के कारण सुरक्षित है। मजेदार है कि हिन्दी में ग़ालिब पर बनी पहली फिल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' पर भी हिंदी ही लिखा था। फ़िल्म में शायरी उर्दू थी, कल्चर उर्दू का था। तब भी प्रमाणपत्र पर हिंदी ही लिखा था। सोहराब मोदी ने ही हजरत निजामुद्दीन औलिया की खानकाह के पास गालिब की कब्र पर संगमरमर पत्थर चिनवा कर उसकी सुरक्षा की वरना खुदा ही मालिक था।

पूछते हैं वो के गालिब कौन है?

कोई बतलाओ के हम बतलाएं क्या?

वैसे तो यह भी एक कम जाना सच है कि स्वतंत्र भारत में गालिब की शताब्दी समारोह के समय ही गालिब की हवेली से कोयले की टाल हटाई गई थी। गालिब जिसे कहते हैं कि उर्दू का ही शायर था उर्दू पे सितम ढा के गालिब पे करम क्यों है आज भी निजामुद्दीन में वीरान रहने वाली गालिब की मजार और बल्लीमारान की हवेली में वर्ष में एक बार प्रकाश होता है वह भी, एक परंपरा को निभाने के रूप में। गालिब का काव्य दिल्ली और देश की अमूल्य धरोहर है और उनके स्मृति-चिन्ह थाती। लेकिन दिल्ली की आज की जनता है कि अपने शहर के कवि को ही बिसराए हुए हैं। शायद इसी दिन के लिए ग़ालिब ने लिखा था,

न सताइश की तमन्ना न सिले की परवाह,

गर नहीं हैं मेरे अशआर में मानी, न सही।

उर्दू-साहित्य को मीर और गालिब से क्या हासिल हुआ, इस बारे में अपनी पुस्तक "गालिब" में रामनाथ सुमन कहते हैं कि जिन कवियों के कारण उर्दू अमर हुई और उसमें 'ब़हारे बेख़िज़ाँ' आई उनमें मीर और ग़ालिब सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं। मीर ने उसे घुलावट, मृदुता, सरलता, प्रेम की तल्लीनता और अनुभूति दी तो ग़ालिब ने उसे गहराई, बात को रहस्य बनाकर कहने का ढंग, ख़मोपेच, नवीनता और अलंकरण दिये। वही दूधनाथ सिंह के शब्दों में, "गालिब से बड़ा अवसरवादी और पैरासाइट कम मिलेंगे लेकिन उसकी कविता उससे क्षरित नहीं होती। आत्मभोज वहां भी है लेकिन वह एशिया के सबसे बड़े कवि के रूप में उभर कर आता है। अत: कला की कोई शर्त नहीं है कि कैसा जीवन जियो। बड़ी कला और लेखक के जीवन का कोई अन्तर्सामंजस्य जरूरी नहीं है।" गालिब ने उर्दू भाषा को जो श्रेष्ट हो सकता था वह दिया, लेकिन बेवफाई के सिवाय अवाम ने क्या दिया। इसके बावजूद गालिब को यह यकीन था कि -

हमने माना के तगाफुल न करोगे लेकिन,

खाक हो जायेंगे हम तुमको खबर होने तक।

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