कांग्रेस नेताओं ने सेना को पहले भी अपमानित किया है 

कांग्रेस नेताओं ने सेना को पहले भी अपमानित किया है प्रतीकात्मक तस्वीर।

दिल्ली के बड़े कांग्रेसी नेता और कांग्रेस प्रवक्ता संदीप दीक्षित ने सेना प्रमुख की तुलना सड़क के गुंडे से कर दी और बाद में माफी मांगी। वह आज भी कांग्रेस प्रवक्ता हैं। प्रवक्ता का विचार संगठन का विचार होता है भले ही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने सेना प्रमुख को गुंडा कहने को अनुचित माना। संदीप दीक्षित उस परिवार से आते हैं जिससे स्वनामधन्य उमाशंकर दीक्षित जो भारत सरकार में गृहमंत्री रहे थे और शीला दीक्षित जो दिल्ली की मुख्यमंत्री रही थीं।

कुछ समय पहले जब हमारी सेना ने पाकिस्तानी घुसपैठियों पर सर्जिकल स्ट्राइक किया तो कांग्रेस के बड़े और छोटे नेता इसका सबूत मांग रहे थे जिसका आशय था सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक किया ही नहीं। वास्तव में कांग्रेस का इतिहास ही है सेना पर अविश्वास और उसका तिरस्कार करने का। इस मामले में केवल लाल बहादुर शास्त्री को अपवाद कहा जाएगा जिन्होंने जवान और किसान को सम्मान दिया था। लेकिन नेहरू और इंदिरा गांधी की सोच अलग थी।

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देश आजाद हुआ था और स्वाभाविक रूप से किसी भारतीय को सेनाप्रमुख बनाया जाना चाहिए था। तब के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने सेना प्रमुख बनाया एक अंग्रेज जनरल लोकहार्ट को और उसके त्यागपत्र के बाद नेहरू ने किसी दूसरे अंग्रेज को आर्मी चीफ़ बनाना चाहा इस आधार पर कि हमारे सैनिकों को सेना संचालन का अनुभव नहीं है। देखा जाए तो देश चलाने का अनुभव भी किसी भारतीय को नहीं था तो प्रधानमंत्री किसी अंग्रेज को हाना चाहिए था। अन्ततः उन्हें मेजर जनरल के एम करियप्पा को सेना प्रमुख बनाना पड़ा।

पचास के दशक में चीन के साथ रिश्ते खराब होते जा रहे थे तब जनरल करियप्पा ने कहा था कि सरहद तक रसद और शस्त्रास्त्र पहुंचाने के लिए सड़कें नहीं हैं। इस पर नेहरू ने क्या कहा था तब के अखबारों में देखा जा सकता है। इतना ही नहीं चीन के साथ युद्ध में वायु सेना का प्रयोग ही नहीं किया और नतीजा क्या हुआ दुनिया जानती है। यह सेना का घोर निरादर था, भारत-चीन युद्ध की जांच रिपोर्ट यदि सार्वजनिक की जाए तो बहुत कुछ चैंकोने वाला देखने को मिलेगा, ऐसा सोचना है अनेक विचारकों का।

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प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी किन्हीं कारणों से ले. जनरल सिन्हा से अप्रसन्न हो गई थीं तो उन्होंने जनरल सिन्हा को आर्मी चीफ़ नहीं बनाया, जेनरल सिन्हा ने शालीनता से अपना त्यागपत्र दे दिया। शायद यह अकेला मौका था जब किसी ले. जनरल को प्रमोशन से वंचित किया गया था। जनरल सिन्हा का गुनाह बस इतना था कि वह स्वर्ण मन्दिर पर सेना द्वारा आक्रमण के पक्ष में नहीं थे। कश्मीर में हमारी सेनाओं को किस तरह कठिन परिस्थितियों में काम करने को कहा गया, कभी मानवाधिकार के नाम से तो कभी दूसरे कारणों से। आशा है अब यह सिलसिला बंद होगा।

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