कर्ज में पैदा हो कर्ज में खत्म होने वाली परम्परा का क्यों हिस्सा बन गया किसान

गाँव कनेक्शन | Jan 11, 2019, 12:47 IST
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जब से खेती में तकलीफ़ बढ़ी है, देश का जो किसान खेत की मेड़ पर होना था। आज वो देश की राजनैतिक और आर्थिक राजधानी में लाखों की भीड़ बनकर खड़ा हो रहा है, क्योंकि आज खेत की मेड़ पर जाने में किसान को डर लगने लगा है उस बर्बादी का जहां मेहनत से फसल उत्पादन तो बढ़ रहा है फिर भी कर्ज के बोझ में दबा जा रहा है।
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कर्ज में पैदा हो कर्ज में खत्म होने वाली परम्परा का क्यों हिस्सा बन गया किसान
जय जवान जय किसान वाले नारे को वास्तविकता में आज देश को साकार करने की जरुरत है, क्योंकि दोनों की देश के लिए अहम् भमिका है। आज देश के अन्न के भंडार भरने वाले किसान की आय सुनिश्चित नहीं और कर्ज में पैदा हो कर्ज में ख़त्म होने वाली परम्परा का स्थाई हिस्सा बनकर रह गया।

आज जो स्थितियां हैं, उससे सिर्फ दोनों किसान और जवान ही वाकिफ हैं बाकी को लगता है कि जितने मजे सैनिकों के हैं, उतने किसी के नहीं वैसा ही लगता है ऐसा ही हाल किसानों का है, जिन्होंने किसानों के खेत खलियान नहीं देखें, पौष की ठण्ड नहीं देखी हो, न जेठ की गर्मी नहीं देखी हो उनको सब जगह सावन की हरियाली दिखती है। देश के लोग शहर के पास के किसान जिन्होंने जमीन बेचकर घर बनाए उनको देखकर पुरे किसानों की आर्थिक हालत का अनुमान लगा रहे हैं, जबकि उस अनुमान से कोसो दूर है जो किसान अपनी फसल बेचकर घर के खपरैल नहीं बदल पा रहे हैं।

आज पूरे देश में किसान कर्जमाफी और लागत का मूल्य मांग रहा है, कर्जमाफी इसलिए क्योंकि जो पुराने आर्थिक नुकसान हैं उसकी भरपाई कर सके नहीं तो आज देश के किसान की आमदनी सिर्फ ब्याज भरने में ख़त्म हो रही है। दूसरा लागत का लाभकारी मूल्य जो की किसानों का अधिकार है, आज अन्नदाता सिर्फ अन्न पैदा करने की मशीन मात्र नहीं है उनका भी जीवन, परिवार और उम्मीदे हैं।

जब से खेती में तकलीफ़ बढ़ी है, देश का जो किसान खेत की मेड़ पर होना था। आज वो देश की राजनैतिक और आर्थिक राजधानी में लाखों की भीड़ बनकर खड़ा हो रहा है, क्योंकि आज खेत की मेड़ पर जाने में किसान को डर लगने लगा है उस बर्बादी का जहां मेहनत से फसल उत्पादन तो बढ़ रहा है फिर भी कर्ज के बोझ में दबा जा रहा है।

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देश की जनसंख्या में सबसे बड़ा तबका है, तो वो किसान है जिसकी गिनती करना भी अपने आप में एक नया गणित है, आखिर किसान कौन है? जिसके नाम पर जमीन है और उद्योग चलाते है? या जिनके नाम पर जमीन है और बड़ी-बड़ी नौकरी करते है? या वो जो खेत में काम करते हैं? आखिर किसान किसे माने?

जो वास्तविक किसान है उनकी आमदनी सैकड़ों में है और जो कागज पर टैक्स देने वाले किसान हैं उनकी आमदनी देखकर तो छोटा कैल्कुलेटर गणना बंद कर देता। आज इतनी बड़ी असामनता के बाद भी देश की नीतियों में अमीर किसान ही केंदित क्यों है।

आज देश में 85% किसानों के पास कुल आमदनी का 9% हिस्सा है वहीं 15% किसानों के पास 91% आमदनी का हिस्सा है तो इस असामनता पर हम चुप क्यों है, क्योंकि नहीं नीतियों में उन किसानों को जगह दें, जिनके पास जमीन छोटी है, पिछले वर्ष बैंक द्वारा 615 उद्योगपति किसानों को 60 हजार करोड़ का क्रॉप लोन दे दिया था, जबकि आज देश में सीमांत और लघु किसान को संस्थागत लोन मिल ही नहीं रहा है जबकि इतने बड़े लोन के करोड़ों किसानों की खेती को संबल मिलता।
जो लोग खेती में काम करते हैं वो आज देश को अच्छा उत्पादन करके दे रहे बाकि जो ख़राब या हल्की गुणवत्ता का बचा हुआ उत्पादन स्वयं खा रहे हैं यह वास्तविकता है। खैर यह बात अलग है की आजकल उपभोक्ता भी व्यापारियों की मिलावट के शिकार हैं।

आज देश में सभी को छूट चाहिए अधिकारियों को नौकरी की उम्र, बड़े व्यापरियों को टैक्स में छूट चाहिए, लोगों को सस्ती सब्जी चाहिए, दूध सस्ता चाहिए, नेताओं को फसलों के भाव सस्ते चाहिए क्योंकि महंगाई डायन खायत जाए हैं जैसे गानों से वोट बैंक बदलता है फिर किसानों का क्या होगा, क्या कभी कोई सोचेगा?

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खेती एक ऐसा व्यवसाय है जिसमें किसान के खेती के खर्चे ऑफिस में बैठे लोग अपनी मर्जी से कम्प्यूटर की एक्सेल सीट पर जोड़ रहे हैं। वो भी रिवर्स कैलकुलेशन के फार्मूले द्वारा जिसमें पहले कुल अनुमानित खर्चा लिखते हैं फिर उसमें से खाद बीज और खर्चों में बांटते बांटते फायदा निकाल देते है और वही दूसरी तरफ हर बर्ष बजट में बड़ी खबर आती है कि किसानों के लिए कर्ज की लिमिट दो लाख करोड़ बढ़ा दिया है, कैसी गणना है एक तरफ समर्थन मूल्य की गणना फायदे को मानकर दिखा रहें वही बजट में कर्ज का दायरा बढ़ाए जा रहे हैं।

आज किसानों के कर्ज माफ़ी पर पूरे कार्पोरेट में हल चल है, सातवां वेतन आयोग का लाभ लेने वाले अधिकारी चिंतित हैं, टैक्स में छूट लेने वाले चिंतित हैं, वो यह कभी नहीं देखते हैं कि देश के टैक्स का सबसे बड़ा फायदा वो खुद उठा रहे, अच्छी सड़कें, अच्छा अस्पताल, अच्छी शिक्षा सब कुछ पहले उन लोगों के पास है जो अपने आप को टैक्स देने वाला कहते हैं, उनके पास कोई सुविधा नहीं जो मंडी टैक्स देते हैं, फसलों को आधे दाम में देते हैं और देश के सबसे बड़े उपभोक्ता हैं जिनकी मेहनत के पैसों की कमाई से लोग टैक्स देने वाले बने हैं।

देश में करीब कुल फसल उत्पादन को जोड़ा जाए तो करीब 40 लाख करोड़ है, अगर यही वास्तविक लागत मूल्य से जोड़े तो करीब 60 लाख करोड़ हो सकती है। तो देश का किसान अपने अनाज को देश के कुल बजट के बराबर का हिस्सा देश को इनडायरेक्ट टैक्स के रूप सस्ता अनाज फल सब्जी दूध के रूप दे रहा है फिर क्यों जो उद्योगपति एमआरपी पर व्यापार करने वाले उनमें से चंद लोगो का 3.25 लाख करोड़ पिछले चार में कर्जा माफ़ हुआ है? आज वो लोग किसानों की कर्ज माफ़ी और लागत मूल्य पर बोल रहे हैं। जो अपने उत्पाद की एमआरपी स्वयं निर्धारित करते हैं और वो लोग बोल रहे हैं जिनको एक लाख करोड़ से ज्यादा का फायदा सातवें वेतन आयोग से मिला चुका है।
देश का किसान कभी नहीं कहता है की इनकी एमआरपी की गणना ठीक नहीं है, वो कभी नहीं कहता की बेरोजगारों के देश में अब अधिकारियों की अधिकतम तनख्वाह निर्धारित हो जानी चाहिए तो फिर किसानों के लिए नकारात्मक भाव हमारे देश में क्यों?

आज देश के किसानों को कर्जमाफी की जरुरत है, फसलों के लागत मूल्य की जरुरत है, हम सब जानते हैं कि देश में बेरोजगारी और भुखमरी एक बड़ा चुनौती है लोगों को भोजन देना देश का कर्तव्य है, इसका मतलब यह नहीं की सब का हर्जाना किसानों को उठाना पड़े, इसलिए किसान के नुकसान की भरपाई के लिए देश की सरकार को किसानों का कर्जा माफ़ करना चाहिए और किसानों की आय सुनिश्चित के लिए कदम उठाना पड़ेगा।

(लेखक किसान कांग्रेस मध्य प्रदेश के कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष है.. ये उनके निजी विचार हैं।)

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