ग्रामीण भारत में स्ट्रोक के मरीजों के इलाज में कारगर साबित हो रहा है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस

भारत में 4000 से ज्यादा लोगों को हर दिन स्ट्रोक होता है, जिसमें से 42 फीसदी लोगों की मौत हो जाती है। यह देश और दुनिया भर में मौत के शीर्ष पांच प्रमुख कारणों में से एक है।

Justy Antony ChiramalJusty Antony Chiramal   5 July 2021 11:25 AM GMT

ग्रामीण भारत में स्ट्रोक के मरीजों के इलाज में कारगर साबित हो रहा है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस

भारत के सामने एक और बड़ी चुनौती स्ट्रोक के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी होना भी है। यहां 1.4 अरब की आबादी के लिए केवल 2,500 न्यूरोलॉजिस्ट और 10,000 रेडियोलॉजिस्ट हैं।

असम के एक गांव में सुबह तकरीबन सात बजे चाय बागान में काम करने वाले रामचरण (45 वर्ष) घर पर नाश्ता कर रहे थे कि तभी वे अचानक अपनी कुर्सी से गिर गए। उन्होंने महसूस किया कि उनका दाहिना हाथ और दायां पैर काम नहीं कर रहा है। हालांकि राम बीड़ी के अलावा और किसी तरह का कोई धूम्रपान नहीं करते और ना ही उन्हें कोई बड़ी बीमारी है।

इसके बाद, परिवार के लोग राम को लेकर नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र गए, जहां डॉक्टर ने बताया कि उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ है। इसके साथ ही डॉक्टर ने उन्हें राम का ब्रेन सीटी (computed tomography) स्कैन कराने के लिए कहा।

हालांकि, नजदीकी डायग्नोस्टिक सेंटर 25 किलोमीटर दूर था। राम जब तक सीटी स्कैन करवाकर लौटेते, तब तक सुबह के करीब 9 बज चुके थे। उनका ब्लड प्रेशर 190/100 नीचे लाने के लिए उन्हें दवा दी गई। वहां जो चिकित्सक थे, वे पहले से ही ER में रोगियों की अधिक संख्या की वजह से उलझे हुए थे। इसलिए उन्होंने सीटी स्कैन पर एक नज़र डाली, लेकिन यह सुनिश्चित नहीं किया गया कि उन्हें ब्लड थिनर (खून को पतला करने वाली दवाई) लेना है या नहीं।

तंबाकू का सेवन ब्रेन स्ट्रोक के लिए एक योगदान कारक के रूप में जाना जाता है। Photo: iStock

जब तक राम को बैपटिस्ट क्रिश्चियन अस्पताल, तेजपुर (असम - अरुणाचल प्रदेश बॉर्डर के पास एक शहर) भेजा गया, तब तक दोपहर के 12 बज चुके थे। स्ट्रोक संबंधी गाइडलाइन (अमेरिकन स्ट्रोक एसोसिएशन) के अनुसार स्ट्रोक के बाद जिस समय सीमा के भीतर थक्का हटाने के लिए इंजेक्शन लगाया जाता है, उससे वे चूक गए थे।

स्ट्रोक के लिए इंजेक्शन और रेडियोलॉजी प्रक्रियाएं भी अस्पताल के सीमित साधनों की वजह से पूरी नहीं हो पाई। एक महीने की फिजियोथेरेपी और पुनर्वास सहित पोस्ट-स्ट्रोक देखभाल के बाद राम को अंततः छुट्टी दे दी गई, जबकि उनके शरीर के कई अंग अब भी काम नहीं कर रहे थे।

इलाज में देरी की वजह से चली जाती है जान

भारत में राम चरण जैसे 4000 से ज्यादा लोगों को हर दिन स्ट्रोक होता है, जिसमें से 42 फीसदी लोगों की मौत हो जाती है। यह देश और दुनिया भर में मौत के शीर्ष पांच प्रमुख कारणों में से एक है।

पिछले एक दशक में निम्न और मध्यम आय वाले देशों में स्ट्रोक के मामलों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है। दुनिया भर में स्ट्रोक के कुल मामलों में से 80 फीसदी मामले इन्हीं देशों में सामने आते हैं।

स्ट्रोक के मामले अधिक आने के पीछे का मुख्य कारण हाई ब्लड प्रेशर, तम्बाकू का सेवन और उम्र का ज्यादा होना है। इसके साथ ही कई बार यह डायग्नोस्टिक की गुणवत्ता की वजह से भी होता है।

हाई बल्ड प्रेशर स्ट्रोक का एक सबसे बड़ा कारण है। असमिया आबादी और चाय बागान श्रमिकों में हाई ब्लड प्रेशर की समस्या राष्ट्रीय औसत से अधिक बताई जाती है। इस क्षेत्र की विभिन्न रिपोर्ट और अस्पताल-आधारित अध्ययनों से यह पता चलता है कि असम के लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं।

स्ट्रोक को कभी-कभी 'ब्रेन अटैक' भी कहा जाता है। यह एक ऐसी समस्या है जो आमतौर पर दिमाग में रक्त का प्रवाह रूक जाने के कारण होती है, इस स्थिति में पीड़ित व्यक्ति के दिमाग की कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं, जिसके बाद दिमाग को काम करने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

कैसे किया जाता है स्ट्रोक का इलाज

ब्रेन इमेजिंग स्कैन के ज़रिए खून के बहने या थक्के का पता लगाकर स्ट्रोक का इलाज किया जाता है। अगर थक्का जम रहा हो तो लक्षण की शुरुआत के साढ़े चार घंटे के भीतर थक्के को तोड़ने के लिए एक इंजेक्शन दिया जाना चाहिए, लेकिन ऐसा पांच फीसदी से भी कम मामलों में होता है।

आगे के इलाज के तहत थक्के को हटाने का काम केवल बड़े स्ट्रोक केंद्रों में ही हो सकता है, जो कि ज्यादातर शहरी इलाकों में होते हैं। अधिकांश विकसित देशों में स्ट्रोक के इलाज के लिए सभी तरह की व्यवस्थाएं है, लेकिन ज्यादातर निम्न व मध्यम आय वाले देशों में इसका अभाव है।

भारत के सामने एक और बड़ी चुनौती स्ट्रोक के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी होना भी है। यहां 1.4 अरब की आबादी के लिए केवल 2,500 न्यूरोलॉजिस्ट और 10,000 रेडियोलॉजिस्ट हैं।

क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ली जा सकती है मदद?

राम चरण जैसे लोग केवल छोटे अस्पतालों तक ही पहुंच पाते हैं, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों का अभाव होता है। विशेषज्ञता की कमी के कारण निर्णय लेने की प्रक्रिया में देरी हो जाती है। उभरती हुई डिजिटल टेक्नालॉजी, टेली- कंसल्टेशन प्लेटफार्मों (जैसे टेलीस्ट्रोक) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) मांग और आपूर्ति के बीच की खाई को पाटने में मदद कर रही है।

तेजपुर में बैपटिस्ट क्रिश्चियन हॉस्पिटल (BCH) 130 बिस्तरों वाला अस्पताल है, जहां असम और अरुणाचल प्रदेश, दोनों जगहों से मरीज इलाज के लिए आते हैं। अस्पताल सीटी स्कैन मशीनों से लैस है क्योंकि यहां एक स्थापित चिकित्सक एलईडी स्ट्रोक यूनिट है।

हालाँकि BCH इमेजिंग रिपोर्ट के लिए टेली-रेडियोलॉजी सेवाओं के साथ-साथ रेफरल अस्पतालों में न्यूरोलॉजिस्ट पर निर्भर करता है।

qER को यूनाइटेड स्टेट्स फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) द्वारा अनुमोदित किया गया है और यह रक्तस्राव, फ्रैक्चर, स्ट्रोक आदि का पता लगा सकता है, जिससे एक मिनट से भी कम समय में परिणाम सामने आते हैं।

दौड़ भाग के चलते देरी ना हो और इलाज ठीक से हो सके इसके लिए BCH ने हाल ही में मुंबई स्थित स्वास्थ्य-तकनीक फर्म Qure.ai की AI टेक्नोलॉजी - qER को अपनाया है। यह टेक्नोलॉजी ट्राइएज और हेड सीटी स्कैन को स्वचालित तरीके से करने में मदद करता है। इस सुविधा की वजह से चिकित्सक पहले गंभीर मरीजों का इलाज कर पाते हैं।

qER को यूनाइटेड स्टेट्स फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) द्वारा मान्यता दी गई है। यह खून का बहना, फ्रैक्चर और स्ट्रोक का पता लगा सकता है। इसके ज़रिए एक मिनट के भीतर ही रिपोर्ट प्राप्त किया जा सकता है और चिकित्सकों से फोन पर बात करके तुरंत ही रिपोर्ट संबंधी जानकारी ली जा सकती है।

सीटी स्कैन के गंभीर मामलों के संबंध में डॉक्टरों और दूरदराज के रेडियोलॉजिस्ट से तुरंत बात करने से इसमें लगने वाला 60 मिनट से भी अधिक का समय घटकर पांच मिनट से भी कम हो गया है। यह स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारियों में, जिसमें एक-एक मिनट काफी संवेदनशील होते हैं, बेहद महत्वपूर्ण है। qER जैसी टेक्नोलॉजी ऐसे डॉक्टर जो विशेषज्ञ नहीं है, के लिए भी काफी मददगार साबित होता है।

Qure की AI तकनीक को किसी जटिल हार्डवेयर की आवश्यकता नहीं है, इसका उपयोग करना काफी आसान है और इसने स्ट्रोक केयर को पूरी तरह बदल दिया है। बीसीएच, तेजपुर के एक चिकित्सक जेमिन वेबस्टर कहते हैं, "जब रेडियोलॉजिस्ट उपलब्ध ना हो तब यह एक उपयोगी उपकरण है। ग्रामीण इलाकों में जहां सीटी स्कैन सेंटर हैं, वहां रिपोर्ट मिलने में कुछ दिनों का वक्त लग जाता है। बहुत ज्यादा केस वाले केंद्रों में और ऐसे जगहों में जहां न्यूरो-विशेषज्ञ या रेडियोलॉजिस्ट नहीं हैं, वहां यह तकनीक काफी मददगार है।"

भारत में स्ट्रोक के इलाज संबंधी व्यवस्थाओं में सुधार करने में व विशेषज्ञों की कमी वाले छोटे अस्पतालों में Qure की AI तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। स्ट्रोक के इलाज की गुणवत्ता और दक्षता में सुधार से इसकी व्यवस्था में सुधार हो सकता है, जिससे कई रोगियों की जान बचाई जा सकती है।

*मरीजों के नाम बदल दिए गए हैं*

(जस्टी एंटनी चिरामल 10 से अधिक वर्षों के नैदानिक ​​अनुभव और विशेष रूप से महामारी विज्ञान में 5 वर्षों के अनुसंधान अनुभव के साथ एक डॉक्टर हैं, जो वर्तमान में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और दवा के इंटरफेस की खोज कर रही हैं। पिछले 5 वर्षों से, वह Qure.ai, मुंबई के लिए नैदानिक ​​​​सलाहकार के रूप में काम कर रही हैं। यह उनके निजी विचार हैं)

अंग्रेजी में खबर पढ़ें

Next Story

More Stories


© 2019 All rights reserved.