हर साल आता है मौत का मौसम

हर साल आता है मौत का मौसमएन्सेफ्लाईटिस एक ऐसी बीमारी है जो ज्यादातर 0-3 वर्ष तक के बच्चों को अपना शिकार बनाती है। 

लखनऊ/गोरखपुर। बीआरडी मेडिकल कॉलेज में पत्नी का इलाज करा रहे गोरखपुर के अजय चन्द्र कौशिक ने बताया, "तीन-चार दिन से ज्यादा अफरातफरी है, पूरे वार्ड में कुल 23 से 24 बेड हैं। जिस पर एक-एक बेड पर चार-चार बच्चे लिटाए जा रहे हैं। मेरे सामने एक बच्चा बेड से नीचे गिरा और उसकी मौत हो गई। उसे झाड़ पोछकर माता-पिता को थमा दिया गया।"

कौशिक बताते हैं, "आईसीयू में देखा कि कई बच्चों के तीमारदार उन्हें पंप दे रहे होते हैं। फार्म पहले ही भरा लिया जाता है कि इंफेक्शन या किसी अन्य वजह से मौत हो जाती है तो अस्पताल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं होगी," आगे बताते हैं, मेडिकल कॉलेज में हर साल अब तक हजारों बच्चे अब तक दम तोड़ चुके हैं। और आगे भी ये सिलसिला थमता नहीं दिखता।

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एन्सेफ्लाईटिस एक ऐसी बीमारी है जो ज्यादातर 0-3 वर्ष तक के बच्चों को अपना शिकार बनाती है। इसमें दिमाग में सूजन आ जाती है और झटके लगते है। यह दो तरह की होती है, पहला जापानी एन्सेफ्लाईटिस, दूसरी एक्यूट एन्सेफ्लाईटिस सिंड्रोम। जेई मच्छरों और जानवरों से फैलता है, जब कि एक्यूट एन्सेफ्लाईटिस सिंड्रोम (एईएस) जल जनित बिमारी है। दोनों ही मामलों में अगर समय पर इलाज न मिले तो बच्चे की मौत हो जाती है, या वह अपंग हो जाता है।

अकेले गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में 2005 से 2013 तक करीब पांच हजार बच्चों की मौत हो चुकी है। यह आंकड़ा सिर्फ एक अस्पताल का है, यहाँ के आसपास निजी अस्पतालों में होने वाली मौतों को मिलाकर यह गिनती काफ़ी अधिक है।

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मानसून की पहली बारिश की फुहारें मासूमों के लिए मौत की आहात लेकर आती है। जैसे बगीचों में आम का सीजन आता है, लगभग उसी समय पूर्वान्चाल में मासूमों की मौत का सीजन आ जाता है। "जब एन्सेफ्लाईटिस का सीजन आता है तो एक बेड पर चार-चार बच्चों को लिटाना पड़ता है। मेडिकल कॉलेज के एन्सेफ्लाईटिस वार्ड में बैठी एक नर्स ने बताया। मासूमों की मौत का यह सीजन जुलाई से शुरू होकर नवंबर तक चलता है।

अजय कौशिक ने बताया, "हमने देखा कि पुलिस वैन में सुबह-सुबह पांच बजे आक्सीजन के सिलेंडर लाए जा रहे हैं। तो साथी से मजाक भी किया कि देखो अब पुलिस की गाड़ी सिलेंडर ढो रही है।"

आक्सीजन की सप्लाई नहीं रोक सकती एजेंसी

नाम न बताने की शर्त पर लखनऊ के मेडिकल कॉलेज में गैस सप्लाई करने वाली एजेंसी के एक प्रतिनिधि ने बताया, “अगर हम कहीं मेडिकल संस्थान में गैस की सप्लाई करते हैं तो हमारी पूरी जिम्मेदारी है लोगों की जान का ख्याल रखा जाए। गोरखपुर का जैसा मामला आया है कि उसने गैस की सप्लाई रोक दी थी, क्योंकि उसे पैसे नहीं मिले थे। बिल्कुल गलत है। हम संस्थान से गैस का पैसा मांग सकते हैं लेकिन गैस की सप्लाई नहीं रोक सकते हैं। अगर कम्पनी ने गैस की सप्लाई रोकी है तो वो कम्पनी पर केस हो सकता है और कम्पनी बंद हो सकती है।”

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अचानक इतनी मौतों की संख्या जांच का विषय

गोरखपुर के बांसगांव संसदीय क्षेत्र के सांसद कमलेश पासवान कहते हैं, “बच्चों की मौत तो कई कारणों से हो सकती है जन्म के समय बच्चा पानी पी लेता है। ये जो हल्ला पूरे शहर में हो रहा है कि अचानक मौतों की संख्या कैसे बाढ़ गयी ये वाकई में जांच का विषय है। मैंने अधिकारियों से बात कर ली है वो इसकी जाँच करेंगे और बतायेंगे कि बच्चों की मौत का कारण क्या है?

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