श्रद्धालुओं से लाखों की आमदनी, तीर्थस्थलों पर शौचालय फिर भी नहीं 

श्रद्धालुओं से लाखों की आमदनी, तीर्थस्थलों पर शौचालय फिर भी नहीं खुले में जाना पड़ता है शौच

अजय मिश्र/मोहम्मद परवेज, स्वयं कम्युनिटी जर्नलिस्ट

(तिर्वा)कन्नौज। ‘‘एक वर्ष पहले जब मेरी शादी होनी थी, कुछ मेहमान मुझे देखने के लिए आने को थे। तभी मेरे पापा ने कहा कि रोज-रोज अच्छा नहीं लगता है, जितने भी लोग आएं एक बार में देख लें। उसी समय मेरे पापा मुझे मां अन्नपूर्णा देवी मंदिर परिसर में लेकर आए थे। मैं करीब चार-पांच घंटे रूकी थी, तभी मुझे बाथरूम लगी। यहां आस-पास कोई शौचालय न होने के कारण मेरा भाई बाइक से अपने दोस्त के घर ले गया था।’’ यह कहना है 25 वर्षीय रूचि सक्सेना का।

ये भी पढ़ें: भारत में 35 करोड़ से ज्यादा महिलाओं और लड़कियों को अब भी शौचालय का इंतजार’

कन्नौज जिला मुख्यालय से करीब 23 किमी दूर तिर्वा तहसील क्षेत्र के बेलामऊ सरैया निवासी यह समस्या केवल रूचि की ही नहीं है, बल्कि प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में कन्नौज जनपद के अधिकतर तीर्थस्थलों पर आने वाले श्रद्धालुओं की है ये समस्या प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में कन्नौज जनपद के अधिकतर तीर्थस्थलों पर आने वाले श्रद्धालुओं की है जिन्हें शौचालय न होने की वजह से शर्मिंदा होना पड़ता है। साथ ही मामला जिले को निर्धारित समय पर खुले में शौच से मुक्त करने में भी रोड़ा है। खास बात यह है कि यहां लगने वाले मेला, बाजारों, चढ़ावा और उठने वाले ठेकों आदि से साल में लाखों रूपए की आमदनी ठेकेदारों और स्वामियों को होती है। इसके बाद भी मां अन्नपूर्णा देवी मंदिर तिर्वा और कन्नौज से करीब आठ किमी दूर गंगाजी के मेहंदीघाट पर इंतजाम नहीं हैं।

वाटर एड्स की स्टेट ऑफ द वर्ल्ड टॉयलेट्स 2017 की रिपोर्ट के अनुसार, ‘भारत में करीब 35.5 करोड़ महिलाओं और लड़कियों को अब भी शौचालय का इंतजार है।’ सरकारी आंकड़ों के हवाले से ये रिपोर्ट कहती है कि स्वच्छ भारत मिशन के जरिये साफ-सफाई की स्थिति में निसंदेह काफी प्रगति हुई है। इसके तहत अक्टूबर 2014 से नवंबर 2017 के बीच 5.2 करोड़ घरों में शौचालयों का निर्माण कराया गया। 'आउट ऑफ ऑर्डर' शीर्षक वाली रिपोर्ट में कहा गया है कि खुले में शौच को कम करने और बुनियादी साफ-सफाई की स्थिति में सुधार के मामले में भी भारत 10 शीर्ष देशों में शामिल है।

ये भी पढ़ें:- आदिवासी महिला अन्नपूर्णा ने गहने गिरवी रखकर बनवाया शौचालय

यूपी की राजधानी लखनऊ से करीब 130 किमी दूर कानपुर जिले के उत्तरीपूरा निवासी 50 साल की गुलाब देवी ने बताया, "मेरा यहां कई साल से आना-जाना है। आज यहां मुंडन होना था जो आयी थी, अचानक पेट दर्द शुरु हुआ, बहुत देर बाद हमने अपने पति को बताया उन्होंने इधर-उधर शौचालय का पता किया तो शौचालय कहीं नजर आए, मजबूरी में खेत में जाना पड़ा।"

गुलाब देवी आगे बताती हैं, "दिन के समय तो कोई खेत में पानी लगाए रहता है तो कोई कहीं जानवर चरा रहा होता है, बहुत दूर तक जाना पड़ता है, यहां शौचालय बन जाए तो सबको आराम मिल जाए।"

ये भी पढ़ें- विधवा के पास मकान नहीं, शौचालय में बनाती है खाना

तिर्वा मेले में सिल बट्टा, तिवाई-बेलन का कारोबार करने वाले पप्पू (28 वर्ष) का कहना है कि ‘‘हमको बाजार में दुकान लगाए लगभग दो वर्ष हो गए हैं। तबसे हम यही देख रहे हैं कि मेले में वसूली होती है और उन पैसों से तो शौचालय बनवाया जा सकता है। न ठेकेदार सुनते हैं न मालिक। रविवार के दिन कोई न कोई अधिकारी अपने परिवार के साथ दर्शन को आ ही जाता है, पर यहां की कमियों को कोई ध्यान नहीं देता है। मेरी पत्नी रात-बिरात खेतों में शौच करने जाती है। जब तक वो लौट नहीं आती डर बना रहता है।’’

आज मैं खुद मंदिर गया था। जो-जो कमियां थीं सभी पर विशेष ध्यान दिया गया। रानी सुनीता सिंह से मिलकर पंचवटी मंदिर का सुंदरीकरण का काम शुरू कराने को कार्ययोजना तैयार की जा रही है, जिसमें शौचालय का निर्माण भी कराया जाएगा।’
डॉ. अरूण कुमार सिंह, एसडीएम, तिर्वा

मेहंदीघाट के बाबा शिवप्रकाशानंद बताते हैं, ‘‘प्रतिदिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। पर्व पर तो संख्या बहुत हो जाती है। यहां पर काफी कार्य अधूरे पड़े हैं। शौचालय भी अधूरे हैं, जिसकी वजह से बाहर से आने वाले श्रद्धालु और हम लोगों को काफी दिक्कतें होती हैं।’’

‘गंगाजी घाट पर शौचालय निर्माण अधूरा है यह आपने बताया है। हम पता करेंगे कि जिला पंचायत का काम है या जिला पंचायती राज विभाग का। इसे हर हाल में पूरा कराया जाएगा।’’ शालिनी प्रभाकर, एसडीएम- कन्नौज सदर

विश्व शौचालय दिवस: देखें आज भी महिलाओं को शौच जाने के लिये किन मुश्किलों का करना पड़ता है सामना

Share it
Top