सिर्फ मांड भात नहीं खातीं अब झारखंड की महिलाएं, किचन गार्डन से हो रहीं सेहतमंद

झारखंड की जुझारू महिला किसानों ने अपने सेहत का इंतजाम खोज निकाला है। अब इनकी थाली में सिर्फ माड़ भात नहीं रहता बल्कि कई तरह की हरी साग-सब्जियां और दाल भी रहती है।

पूर्वी सिंहभूम (झारखंड)। ग्रामीण महिला की थाली में हर रोज तीन चार प्रकार की हरी सब्जियां...जी हाँ ये असम्भव नहीं इसे हकीकत में बदल दिया है झारखंड की जुझारू महिलाओं ने। अब इनकी थाली में सिर्फ माड़ भात नहीं रहता बल्कि कई तरह की हरी साग-सब्जियां और दाल भी रहती है।

अपने पोषण बगान (पोषण वाटिका) में बीन तोड़ रही भद्रावती मांडी (60 वर्ष) ने बताया, "अब रोज साग-सब्जी बनाने के लिए सोचना नहीं पड़ता। सुबह-शाम खेत से ताजी सब्जी तोड़ लाते हैं। पहले ये सब्जी खाने भर के लिए लगाई थी अब अच्छी पैदा हो जाती है तो बाजार में रोजाना डेढ़ दो सौ की बेच भी देते हैं।" उन्होंने कहा, "हमारे घर में साग या सब्जी बनती है तो उसकी खुशबू पड़ोसियों के यहाँ तक जाती है क्योंकि हम लोग जो खाते हैं उसे शुद्ध उगाते हैं।"


भद्रावती की तरह यहाँ की सैकड़ों ग्रामीण महिलाओं के लिए आज से तीन चार साल पहले खरीदकर हरी सब्जियां खाना किसी सपने जैसा ही था लेकिन आज यहाँ की महिलाओं ने इसे हकीकत में बदल दिया है। ये न केवल रसायनमुक्त खा रहीं हैं बल्कि ज्यादा पैदावार होने पर उसे बेच भी रही हैं। बीमारी और कुपोषण से जूझ रही सखी मंडल से जुड़ी दीदियों ने वर्ष 2014-15 में पोषण वाटिका लगाकर अपनी सेहत का खजाना खोज निकाला है।

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महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना के तहत ये पोषण वाटिका हर महिला किसान अपने खेत में साढ़े सात मीटर चौड़ा और नौ मीटर लम्बा एक माडल बनाती है जिसमें आठ प्रकार का बेड बनाया जाता है। इसी बेड में अलग-अलग तरह की साग और सब्जियां उगाई जाती हैं।

अगर आपको हर दूसरे तीसरे घर में हरी-भरी मौसमी जैविक साग-सब्जियों से भरे किचन गार्डेन देखने हैं तो आप झारखंड के पूर्वी सिंहभूम के दो ब्लॉक पटमदा और बोड़ाम के इन 80 गाँव में जरुर जाएँ। जहाँ आपको 70 फीसदी घरों में छोटी-छोटी क्यारियों में कई तरह के साग और सब्जियां मिलेंगी। जिसे यहाँ के लोग बोलचाल की भाषा में पुष्टी बगान कहते हैं। एक समय यहाँ की महिलाएं और बच्चे ज्यादातर कमजोर और कुपोषित थे लेकिन अब इनका खानपान बेहतर होने के साथ ही इनका स्वास्थ्य में भी सुधार हुआ है।

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झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी द्वारा महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना के तहत पूर्वी सिंहभूम जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर पटमदा और बोड़ाम ब्लॉक के 80 गाँव में 1400 से ज्यादा पोषण बगान लगे हुए हैं। जिसमें आठ से दस प्रकार की सब्जियां और साग हैं। यहाँ की महिलाएं इसमें किसी भी तरह की रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाइयां नहीं डालतीं।


पटमदा बस्ती की रहने वाली भद्रावती मांडी ने अपना पोषण बगान दिखाते हुए कहा, "इसमें हम कोई भी बाजार से खरीदी खाद या दवा नहीं डालते। क्योंकि इसमें जो साग और सब्जियां निकलती हैं उसे हम और हमारे बच्चे खाते हैं। अगर दवाइयों वाली सब्जियां खायेंगे तो बीमार पड़ेंगे इसलिए जैविक सब्जियां खाते हैं।" भद्रावती की तरह यहाँ की सैकड़ों महिला किसानों को जैविक का मतलब भले ही न पता हो पर वो इतना जरुर जानती हैं कि वो जो खायेंगी उसमें बाजार की खाद और दवाई नहीं डालेंगी।

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देशभर में चल रही महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना के तहत झारखंड में तीन लाख से ज्यादा महिला किसान कम लागत में खेती का हुनर सीख अच्छा मुनाफा कमा रहीं हैं। इस योजना के तहत ग्रामीण विकास विभाग एवं झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी ने झारखंड के कुछ ऐसे जिले भी चिन्हित किये हैं जहाँ पर महिलाएं और बच्चे बहुत ज्यादा कुपोषित थे। इन क्षेत्रों में सखी मंडल से जुड़ी ग्रामीण महिलाओं को अपनी कुछ जमीन में जैविक पोषण वाटिका लगाने की सलाह दी गयी। जिससे इनको पोषणयुक्त भोजन मिल सके और इनका स्वास्थ्य बेहतर हो। अबतक राज्यभर में 2,000 से ज्यादा पोषण वाटिका लगाई जा चुकी हैं।


महिला किसानों के आलावा ये पोषण वाटिका चिन्हित जिलों के हर आंगनबाड़ी सेंटर पर भी होती है जिससे यहाँ आयी महिलाएं इस पोषण वाटिका के महत्व को समझ सकें और ज्यादा से ज्यादा इसका उपयोग करें। यहाँ कुपोषित महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य में पहले से सुधार हो रहा है। अब इन्हें हर रोज सब्जी खरीदने के लिए बाजार में पैसे खर्च नहीं करने पड़ते बल्कि ये इसी पोषण वाटिका में उगाई ताजी हरी सब्जियों का इस्तेमाल करती हैं।

पटमदा बस्ती में रहने वाली सखी मंडल की सक्रिय सदस्य मोनिका महतो (30 वर्ष) बताती हैं, "हम हर बैठक में सभी को हरी सब्जियां साग और मौसमी फल खाने के फायदे बताते हैं। अब बहुत सारी दीदी पपीता, अमरुद, गाजर, खीरा सब लगाती हैं और खाती भी हैं।" वो आगे बताती हैं, "कई दीदी तो अपने बच्चों की फीस भी यही सब्जी बेचकर भर्ती हैं। पहले हमारे यहाँ के बच्चे बहुत कमजोर दिखते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है।"



ऐसा होता है इनका किचन गार्डेन

खेत में या घर के पास पड़ी किसी खाली जगह में ये किचन गार्डेन बनाया जाता है। सात मीटर चौड़ा और नौ मीटर लम्बा एक माडल तैयार किया जाता है जिसमें आठ बेड (क्यारी) बनाई जाती हैं और इन क्यारियों में अलग-अलग तरह के साग और सब्जियां होती हैं। इसके पास में ही केचुआ खाद के लिए नाडेप बना होता है और अजोला भी होता है। छोटी जगह में होने के कारण सिंचाई करने में कोई दिक्कत नहीं होती। ये कुआं या नल के पानी से इसकी सिंचाई कर लेते हैं।

किचन गार्डेन से सप्ताह में 400-500 रुपए की हो जाती है आमदनी

छोटी जगह में शुरू हुई इस पोषण वाटिका को अब ये महिलाएं बढ़ाने लगी हैं ये न केवल जैविक सब्जियां खा रही हैं बल्कि पास में लगने वाली हाट में बेचती भी हैं। वहीं लक्षीपुर गाँव की उर्मिला महतो (40 साल) बताती है, "साग-सब्जी ज्यादा निकल आती तो उसे बाजार में बेच देते हैं। हफ्ते में 400-500 रुपए की आसानी से बिक्री हो जाती है। अब तो हमने जगह भी बढ़ा ली है।"

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