बुंदेलखंड से एक किसान की प्रेरणादायक कहानी, इंट्रीग्रेडेट फॉमिंग और लाखों की कमाई

बुंदेलखंड से एक किसान की प्रेरणादायक कहानी, इंट्रीग्रेडेट फॉमिंग और लाखों की कमाईअपने फार्म पर लाल खां। फोटो विनय गुप्ता

बांदा (उत्तर प्रदेश)। बुंदेलखड में रहने वाला कोई किसान खेती-किसानी से 10-15 लाख रुपए सालाना कमाता होगा, ये सोचना थोड़ा मुश्किल है। लेकिन कुछ किसान हैं जो सूखी धरती पर अपने ज्ञान और अनुभव के सहारे तरक्की की फसल उगा रहे हैं। ये किसान न सिर्फ खुद खेती से कमाई कर अपना नाम रोशन कर रहे हैं बल्कि हजारों किसानों के लिए भी प्रेरणा बने हैं।

ऐसे ही एक प्रगतिशील किसान और किसान प्रशिक्षक हैं लाल खां। बुंदेलखंड में बांदा जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में विंध्यवासनी देवी मंदिर के आगे बरईमानपुर गाँव में लाल खां का फॉर्म है। करीब 25 एकड़ में फैले लाल खां के फॉर्म में मिश्रित खेती और पशुपालन करते हैं। उनका फार्म हाउस या घर आपको एक बड़ा खेती का स्कूल नजर आएगा। लाल खां बकरी, मछली और मुर्गी पालन के लिए देशभर के किसानों को ट्रेनिंग देते हैं, जबकि मथुरा स्थित भारतीय बकरी अनुसंधान संस्थान के रजिस्टर्ड सलाहकार हैं। सूखे जैसे क्षेत्र में जहां लाल खां इंट्रीग्रेडेट फॉमिंग से लाखों कमा रहे है। बीएससी कर चुके लाल खां तिल की फसल पर रिसर्च कर रहे हैं, जल्द ही अपनी रिसर्च का पेंटेट कराने वाले हैं, इंतजाम पर उनकी प्रजाति को मान्यता मिलनी है।

यहां पर गेहूं और धान की खेती करके अपना जीवनयापन नहीं कर सकता है तो मैंने इंट्रीग्रेटेड फॉमिग को अपनाया, इससे अच्छा मुनाफा भी हो रहा है।
लाल खां, किसान, बांदा

मुर्गी और बकरी पालन की ट्रेनिंग भी देते हैं लाल खां।

पिछले वर्ष गांव कनेक्शन की टीम बांदा में उनके फार्म हाउस पहुंची थी। फार्म हाउस के एक हिस्से में मूंग की फसल को दिखाते हुए लाल खां बताते ने कहा,''यहां पर गेहूं और धान की खेती करके अपना जीवनयापन नहीं कर सकता है या तो उसके पास उतनी सुविधा हो। खेती में खर्चा बढऩे लगा तो इंट्रीगेडेट फॉमिग को अपनाया और आज इससे अच्छा मुनाफा भी हो रहा है।''

उनके फॉर्म में 70 देशी प्रजाति के बकरे हैं इसके साथ ही 600 ग्रे-रेड प्रजाति की मुर्गियां है। दुग्ध व्यवसाय के लिए लाल खां ने मुर्रा प्रजति की तीन भैंसे भी पाल रखी हैं। लाल खां पशुपालन तो करते ही हैं साथ कई किसानों को ट्रेनिंग भी दे चुके हैं। लाल खां बताते हैं, ''कई बार किसान पशुपालन व्यवसाय तो अपना लेता है पर जानकारी के अभाव में वो ज्यादा मुनाफा नहीं कमा पाते है। पशु को खिलाने के तरीका, रखरखाव जैसी पशुपालन संबधी जानकारी हम लोगों को देते है।'' लाल खां से अब तक 150-200 किसान प्रशिक्षण ले चुके हैं। इसके लिए वो बाकायदा 500 रुपये प्रति किसान से फीस भी लेते हैं।

बुंदेलखंड में उम्मीद बने लाल खां बताते हैं, ''कई किसानों ने हम से प्रशिक्षण लेकर पशुपालन व्यवसाय को अपनाया। मुझे पूरे देश से फोन भी आते हैं जिनको में फोन पर ही सलाह देता हूं।'' पशुपालन व्यवसाय के अलावा मौसमी सब्जी को भी अपने फॉर्म में लगाते है। खेती में आने वाली दिक्कतों के बारे में लाल खां बताते हैं, ''यहां सिंचाई का कोई साधन नहीं है फिर भी हम खेती कर रहे है। आस-पास कोई भी ट्यूबवेल की व्यवस्था भी नहीं है। खुद का तालाब है उससे ही पानी निकल कर खेती करते है और उसी में मछलियों के बीज भी डाले हुए हैं।''

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“खेती के बारे में हम किसानों की राय सोच बड़ी परंपरागत है। हम खेती को मुख्य व्यव्साय नहीं बल्कि कुछ न होने पर उसे करते हैं। घर के जो पढ़े लिखे लड़के होते हैं उनके नौकरी और दूसरे व्यवसाय करवाते हैं जबकि जो पीछे रह जाता है उसे खेती में ढकेल देते हैं। जो किसी तरह उसे बस ढोते रहते हैं न अपने तरफ से कोई प्रयास करते हैं न नए तरीके अपनाते हैं, जो उनकी पिछड़ने और घाटे का कारण बनता है।”

अपने मूंग के खेत में लाल खां। फाइल फोटो

कृषिशास्त्र से स्नातक लाल खां दूसरे किसानों की समस्या को लेकर वो कहते हैं, “खेती के बारे में हम किसानों की राय सोच बड़ी परंपरागत है। हम खेती को मुख्य व्यव्साय नहीं बल्कि कुछ न होने पर उसे करते हैं। घर के जो पढ़े लिखे लड़के होते हैं उनके नौकरी और दूसरे व्यवसाय करवाते हैं जबकि जो पीछे रह जाता है उसे खेती में ढकेल देते हैं। जो किसी तरह उसे बस ढोते रहते हैं न अपने तरफ से कोई प्रयास करते हैं न नए तरीके अपनाते हैं, जो उनकी पिछड़ने और घाटे का कारण बनता है।”

इऩ हालातों में लाल खां उपलब्धि सराहनीय है, कृषि विभाग भी हर संभव मदद करता है। इन्हें देखकर दूसरे किसानों को प्रेरणा मिलती है।
बाल गोविंद यादव, जिला कृषि अधिकारी, बांदा, यूपी

लाल खां की प्रगति से बांदा का कृषि महकमा भी गदगद है। बरमईमानपुर में उनके जन्नत कृषि फार्म पर मिले जिलाकृषि अधिकारी बाल गोविंद यादव बताते हैं, ''इऩ हालातों में लाल खां उपलब्धि सराहनीय है, कृषि विभाग भी हर संभव मदद करता है, अभी इन्हें एक तालाब बनाया है। इन्हें देखकर दूसरे किसानों को प्रेरणा मिलती है।”

छप्पर की बखारी (स्टोर रुम) में प्याज दिखाते हुए वो कहते हैं, ''कौन कहता है बुंदेलखंड में पानी की समस्या है, यहां औसतन 400 मिलीमीटर पानी बरसता है जबकि खेती के लिए जरूरत 150 मिमीलीटर की सालाना होती है। पानी खूब बरसता है, लेकिन वो सब बंगाल चला जाता है। समस्या पानी रोकने की है। मेरे पास एक तालाब पहले से है और एक अभी सरकार की खेत तालाब योजना से बनवाया है।”

नोट- ये ख़बर मूल रूप से 2016 में बुंदेलखंड में 1000 घंटे सीरीज में प्रकाशित की गई थी।

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