बिहार: बाढ़ पीड़ितों की कहानी केवल घरों में पानी घुस जाने भर की नहीं है, सरकारों की आंखों का पानी सूख जाने की भी है

बिहार के 17 जिले भीषण बाढ़ की चपेट में हैं। कई जिले ऐसे हैं जहां लोग अपने घरों में चचरी और मचान के सहारे को मजबूर हैं। गांव कनेक्शन ने कटिहार और भागलपुर जिलों के दो गांवों की तस्वीर देखी, जो कई सवाल खड़े करती है।

Hemant Kumar PandeyHemant Kumar Pandey   30 Aug 2021 11:53 AM GMT

कुरसेला (कटिहार-बिहार)। मंजू देवी 15 दिनों के बाद अपने घर को देखने पहुंची हैं। दो हफ्ते पहले गंगा और कोसी नदी एक साथ मिलकर उनके कच्चे घर में घुसी थीं, उस वक्त से ही वे नजदीकी सरकारी राहत शिविर के अभाव में रेल पटरी पर रहने को मजबूर हैं। मंजू देवी अपने कमरे की ओर इशारा करते हुए गंगा का जल स्तर बताती हैं। उनके कमरे की कच्ची दीवारों पर पानी के निशान अभी भी पिछले 15 दिनों की कहानी बयां कर रहे हैं। कुरसेला में गंगा और कोसी नदी आपस में मिलती हैं।

मंजू देवी (45वर्ष) बाढ़ के लिए कुख्यात बिहार के कटिहार जिले के कुरसेला प्रखण्ड के मलैनिया गांव में रेलवे की जमीन पर रहती हैं। वे उन सैकड़ों परिवारों में शामिल हैं, जिनकी जमीन को 25 साल पहले (साल 1996) गंगा नदी ने खुद में मिला लिया। ढाई दशक के बाद भी इन विस्थापित परिवारों को सरकार की ओर कोई जमीन मुहैया नहीं कराई गई है। ये लोग रेलवे की जमीन पर कोई पक्का मकान भी नहीं बना सकते हैं और कच्चे मकान के बाढ़ में गिरने का दंश ये सहते रहते हैं। इस बार उनका घर दशहरा के बाद (नवंबर) में घर रहने लायक होगा। इस घर को तैयार करने में पिछले साल ही 80,000 रुपये खर्च किया गया था।

"डेढ़ महीने से पहले घर-आंगन में पानी लगना शुरू हुआ था। मक्का और गेहूं वगैरह रखे थे, वह भी पानी में डूब गया। चार ड्राम में मक्का था। सब मक्का (करीब 7 कुंतल) सड़ गया। डेढ़ बीघा में खेत में मूली और भिंडी लगाए थे, वह भी डूब गया।" मंजू देवी बताती हैं।

मूसो मंडल ने अपना मक्का और गेहूं इन्हीं ड्रमों में रखा था जो कई महीनों से पानी में पड़े हैं। फोटो- हेमंत कुमार पांडेय

बिहार के 38 में से 17 जिले भीषण बाढ़ की चपेट में हैं। बिहार के राज्य आपदा प्रबंधन विभाग की 30 अगस्त की रिपोर्ट के अनुसार मुजफ्फरपुर, दरंभगा, खगड़िया, सहरसा, पटना, वैशाली, भागलपुर, सारण, कटिहार, मुंगेर, समस्तीपुर, पूर्णिया, सीतामढ़ी, पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, मधेपुरा जिलों के 86 प्रखंडों की 525 पंचायतों के 31.97 लाख लोग बाढ़ की चपेट में हैं, जबकि 213381 लोगों प्रभावित इलाकों से निकालकर राहत शिविरों और सुरक्षित जगह पहुंचाया गया है। बिहार में जून से आई बाढ़ के चलते अब तक 43 लोगों की मौत हुई है। बिहार के कई जिलों में पिछले कुछ दिनों में पानी कम भी होने लगा था लेकिन नेपाल से छोड़े गए पानी और प्रदेश में हुई बारिश के बाद बाधों (बाल्मिकी नगर बैराज और बीरपुर) से पानी छोड़े जाने के बाद आने वाले दिन फिर कई जिलों के मुश्किल भरे हो सकते हैं।

बिहार के आपदा प्रबंधन द्वारा 30 अगस्त को जारी रिपोर्ट

पानी उतरने के बाद भी लाखों को लोगों को बाढ़ से उबरने में महीनों लग जाते हैं। कटिहार की मंजू देवी की भी मुश्किलें पानी उतरने के साथ कम होती हुई नहीं दिख रही हैं। मंजू कहती हैं, "ग्रुप (स्वयं सहायता समूह) से एक लाख रुपये कर्ज लिए थे। अभी (बाढ़ की स्थिति में) पैसा के लिए ऊपर से प्रेशर दिया जा रहा है। कल ही पैसा वसूली के लिए आया था, दो बात सुनाकर गया है। ये पैसा नहीं रूकता है, लेकिन हम वापस कहां से करेंगे? जब खाने के लिए पैसा नहीं है, तो कर्ज का पैसा वापस कैसे करेंगे?"

मंजू देवी के लिए इस कर्ज के पैसे को वापस करना अब इसलिए और भी मुश्किल हो गया है, क्योंकि उनका एक बेटा जो लॉकडाउन के बाद कमाने के लिए चेन्नई (तमिलनाडु) गया था, वहां काम न मिलने के चलते वापस आ रहा है। अब यहां की स्थिति देखकर मंजू को इसकी भी उम्मीद नहीं कि उसे यहां भी कोई काम मिल पाएगा। कुरसेला बाजार में मजदूरी करने वाले उनके पति मणिक लाल मंडल (50 वर्ष) के पास भी अभी कोई काम नहीं है।

मलैनिया स्थित गांव का एक बाढ़ पीड़ित

सरकार की ओर से अब तक बाढ़ राहत के नाम पर क्या मिला है? इस सवाल के जवाब में मंजू देवी चेहरे पर निराशा भरी भावों के साथ कहती हैं, "सरकार से पॉलिथीन मिला है और स्कूल में खाने के लिए दिया जाता है। वह भी कभी मिलता है, कभी नहीं।"

एक स्थानीय जनप्रतिनिधि के पति अपना नाम न बताने की शर्त पर बताते हैं कि बाढ़ पीड़ितों की जितनी संख्या है, उसके हिसाब से सामुदायिक रसोई में कम खाना बनता है। कई बाढ़ पीड़ितों का कहना है कि जहां (सरकारी विद्यालय) में खाना दिया जा रहा है, वहां कुछ दिनों पहले पहुंचना ही मुश्किल था।

इनमें से एक मुसो मंडल कहते हैं, "खाना तो दिया जा रहा है, लेकिन दूसरे लोग खा रहा है। यहां सरकार की ओर से राशन नहीं दिया जा रहा है। जो कमाकर रखे हैं, मकय (मक्का) गेहूंम (गेहूं) ड्राम में कसके (भरकर) रखे हैं, वही खा रहा हैं। नेता लोग देखने वाला है और देखकर जाने वाला है, देने वाला कोई नहीं है। अब तक पैसा (आर्थिक सहायता) भी नहीं मिला है।"

बाढ़ पीड़ितों की सरकार और प्रशासन से इन शिकायतों पर गांव कनेक्शन कटिहार के एडीएम विजय कुमार से फोन पर संपर्क किया। लेकिन उन्होंने अपनी व्यस्तता का हवाला देकर सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया। गांव कनेक्शन ने इस संबंध में कटिहार जिले में कुरसेला के प्रखण्ड विकास पदाधिकारी अजय कुमार से बात की। उन्होंने इन शिकायतों को खारिज करते हुए कहा, "आपदा की एसओपी (मानक संचालन प्रक्रिया) के अनुसार सभी वार्डों में सामुदायिक रसोई का संचालन किया जा रहा है। इसके अलावा बाढ़ राहत राशि भी जारी कर दी गई है। सामुदायिक केंद्रों पर पेयजल की भी व्यवस्था की गई है। जहां जरूरत है, वहां पीएचडी (पब्लिक हेल्थ एंड इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट) की ओर से चापाकल भी लगाया गया है।"

राज्य सरकार के मुताबिक प्रदेश में 327 कम्युनिटी किचन बाढ़ प्रभावित इलाकों में चलाई जा रही हैं। इसके साथ ही एनडीआरएफ की 17 टीमें और एसडीआरएफ की 12 टीमें प्रभावित इलाकों में कार्यरत है। इन कम्युनिटी किचन में खाने को लेकर पीड़ित सवाल उठाते रहे हैं। पिछले दिनों गांव कनेक्शन ने राजधानी पटना के हालात दिखाए थे जहां लोगों का आरोप था कि उन्हें हफ्तों से सिर्फ चावल खाने को दिया जा रहा है।

बिहार में एक बड़ी आबादी इन दिनों सड़कों के किनारे जीने को मजबूर है। इनमें से ज्यादातर लोगों के पास शौचालय और पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है। भागलपुर जिले के रंगरा पंचायत में अपने लिए पानी का इंतजाम करते ग्रामीण। फोटो-
हेमंत कुमार पांडे

कटिहार के कुरसेला के बाढ़ पीड़ितों का कहना है कि उन्हें पीने का पानी रेलवे स्टेशन या अन्य जगहों से करना पड़ रहा है। वहीं प्रशासन की शौचालय की भी व्यवस्था नहीं की गई है। इसकी वजह से खासकर महिलाओं को अधिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा रहा है।

"हमें शौच के लिए खुले में ही जाना पड़ता है। हम लोगों को शौचालय भी नहीं दिया गया है। बच्चों को अधिक परेशानी हो रही है।" मलैनिया इलाके की चिंता देवी (48 वर्ष) कहती हैं।

आस-पास बाढ़ पीड़ितों के रहने और शौच के लिए ऊंचा स्थान रेलवे की पटरी ही दिखती है। इसकी वजह से इन्हें न केवल गंदगी को सहना पड़ रहा है, बल्कि ट्रेनों की लगातार आवाजाही के चलते इनकी जान पर भी खतरा मंडराता रहता है।

60 वर्षीय सदानंद शर्मा गांव कनेक्शन को बताते हैं कि रक्षाबंधन के दिन उनकी बहन राखी बांधने आई थीं, लेकिन वापस जाते वक्त ट्रेन से कट गईं। पटरी किनारे रहने वाले बाढ़ पीड़ित ट्रेन की चपेट में आने की आशंका से हमेशा चिंतित रहते हैं और बच्चों की देख-भाल के लिए हमेशा एक व्यक्ति उनके साथ रहता है।

वहीं, बाढ़ का पानी नीचे उतरने के बाद लोगों में कई तरह की बीमारियां जैसे, डायरिया, बुखार और अन्य बीमारियां न फैलें, इसके लिए भी सरकार की ओर से कोई व्यवस्था जमीन पर दिखाई नहीं देती हैं। कुरसेला के प्रखण्ड विकास पदाधिकारी के दावे के उलट गांव कनेक्शन को ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव और अन्य जरूरी कार्रवाई नहीं दिखीं। हालांकि पीने के पानी को लेकर भी प्रखण्ड विकास पदाधिकारी अजय कुमार का कहना है कि जहां-जहां चापाकल (Handpump) की जरूरत हुई है, वहां पीएचडी की ओर से चापाकल लगाया गया है।

भागलपुर में रंगरा पंचायत का पानी में डूबा एक टोला।

पेयजल को लेकर अधिकांश बाढ़ प्रभावित इलाकों की स्थिति एक जैसी दिखती है। बिहार के एक और बाढ़ प्रभावित जिले भागलपुर के बाढ़ प्रभावित रंगरा ग्राम पंचायत के मुस्लिम टोला के लोग खुद पहल करके सड़क किनारे चापाकल लगाने का काम कर रहे हैं। यहां के स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि सरकार की ओर से अब तक इन्हें पॉलिथीन (तिरपाल आदि) भी नहीं दिया गया है। इस पंचायत की ऐसी स्थिति तब है जब यहां से रंगरा प्रखण्ड कार्यालय की दूरी केवल 500 मीटर है। स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि जिला मुख्यालय से अधिकारी लोग दो दिन पहले आए थे, लेकिन सड़क पर पानी होने के चलते बिना इधर आए ही वापस चले गए। उसके बाद कोई न तो कोई देखने के लिए आया है और न ही हमें कुछ मिला है।

रंगरा पंचायत के निवासी ओम प्रकाश मंडल (41 वर्ष) कहते हैं, "यहां न तो पब्लिक को पॉलिथीन मिला, न ही राशन मिला और न ही मवेशी को चारा मिला। अगर सरकार की ओर से थोड़ा बहुत मिलता भी है तो यहां बंदरबांट होता है।"

वे आगे बताते हैं कि रंगरा के किसानों की पूरी फसल बाढ़ में बर्बाद हो चुकी है। ओम प्रकाश कहते हैं कि जिन किसानों के फसल बर्बाद हुए हैं, उन्हें राशि (मुआवजा) दिया जाए।" इन किसानों को न तो फसल बीमा के बारे में जानकारी है ना ही कभी उन्हें फसल बीमा का लाभ मिला है। (बिहार में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू नहीं है।)

भागलपुर (Bhagalpur) की रंगरा पंचायत में टूटे पड़े लोगों के घर और भरा पानी। फोटो- हेमंत कुमार पांडेय

बाढ़ की विभीषिका, प्रशासन की उदासीनता और राहत-बचाव कार्यों को लेकर कटिहार के कुरसेला और भागलपुर के रंगरा गांव के हालत एक से लगते हैं। इनके दर्द को सुनने वाला और इसे दूर करने के लिए सरकार और स्थानीय प्रशासन की ओर से कोई चुस्त-दुरूस्त व्यवस्था नहीं दिखाई देती है।

भागलपुर जिले में बाढ़ की स्थिति और राहत कार्यों के बारे जानकारी लेने के लिए गांव कनेक्शन ने जिलाधिकारी सुब्रत कुमार सेन से संपर्क करने की कोशिश की। उनके दफ्तर के कर्मी राहुल कुमार ने बताया कि डीएम सर को आपके बारे में जानकारी दे दी है। वे खुद फोन करेंगे। इस रिपोर्ट को लिखे जाने तक भागलपुर के जिलाधिकारी की प्रतिक्रिया नहीं मिली थी। आपदा प्रबंधन सेल के प्रभारी अधिकारी विकास कुमार कर्ण से भी संपर्क करने की कोशिश की। लेकिन उनसे भी बात नहीं हो पाई। अधिकारियों से जवाब मिलते ही उन्हें खबर में अपडेट किया जाएगा।

हालांकि, रंगरा के अंचलाधिकारी (सीओ) आशीष कुमार बाढ़ राहत में सरकार की ओर से कुछ कमियों को स्वीकार करते हुए दिखते हैं। वे बताते हैं, "यहां 5,000 से अधिक पॉलिथीन की जरूरत थी, लेकिन हमें 1530 पॉलिथीन ही दिया गया। इसके अलावा सरकार की ओर से बाढ़ राहत पर काम किया जा रहा है। बाढ़ प्रभावितों के बैंक खाते में 6,000 रुपये कुछ दिनों के भीतर जमा हो जाएगा।"

गांव कनेक्शन ने सीओ से राहत राशि में देरी होने की वजह पूछी तो उनका कहना था, "रंगरा में बाढ़ नहीं आता है, इसलिए इसके लिए सूची तैयार नहीं की गई थी।" सीओ आशीष कुमार की यह बात बिहार सरकार की बाढ़ पूर्व तैयारियों पर भी सवाल उठाती है, इसके अलावा सवाल सवाल सरकार की नजर पर भी उठता है।

सीओ आशीष कुमार से गांव कनेक्शन की मुलाकात जिस कार्यालय में हुई, उसके पीछे की बस्ती के घरों में बाढ़ का पानी घुसा हुआ है। दो हफ्तों के बाद भी सड़क पर घुटने भर और कई घरों में कमर भर पानी है। लेकिन सरकार की राहत इन तक अभी भी नहीं पहुंच पाई है।

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इसी बस्ती में लक्ष्मी देवी (25 वर्ष) का भी घर है। बीते 19 अगस्त को उन्होंने सरकारी अस्पताल में एक बेटी को जन्म दिया। लेकिन उन्हें कोई सरकारी वित्तीय मदद उपलब्ध नहीं हो पाई है। इससे पहले नीतीश कुमार की सरकार ने इसका एलान किया था कि बाढ़ प्रभावित परिवार में बेटे के जन्म पर 10,000 रुपये और बेटी के जन्म पर 15,000 रुपये दिए जाएंगे।

लक्ष्मी देवी के पति पप्पू मंडल (30 वर्ष) ने गांव कनेक्शन ने बताया, "हम लोग वहां (अस्पताल) गए थे, लेकिन कहा गया कि जो गर्भवती महिला नाव से आएंगी, उसे ही इसका लाभ दिया जाएगा। अब यहां नाव था नहीं तो हम लोग बिना नाव के ही पहुंच गए थे।"वहीं, इस मामले में सीओ आशीष कुमार ने कहा, "उनकी जानकारी में यह मामला है। कुछ कारणों से ऐसा हुआ है। जल्द ही उसे राशि जारी कर दी जाएगी।" रंगरा के अंचलाधिकारी का आगे कहना है कि यह पंचायत पहले से बाढ़ प्रभावित नहीं रहा है।

यानी बिहार में बाढ़ का पानी अब उन इलाकों में घुसना शुरू कर दिया, जो इलाके अब तक इससे बचे हुए थे। वहीं जो इलाके पहले से बाढ़ संभावित क्षेत्रों में आते हैं, वहां बाढ़ के चलते पहले से अधिक तबाही हो रही है।

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