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बजट 2020 : 'हम पहले भी गरीब थे, आज भी गरीब हैं'

नीति आयोग की एसडीजी की रिपोर्ट में देश में गरीबी का आंकलन जिस हिसाब से किया गया है, उन पांच संकेतकों में मनरेगा में रोजगार पाने वाले लोगों का प्रतिशत भी शामिल है।

Kushal MishraKushal Mishra   27 Jan 2020 12:34 PM GMT

बजट 2020 :

"मनरेगा में सिर्फ 168 रुपए मजदूरी में क्या होता है? ऊपर से सिर्फ 100 दिन का काम मिलता है, यानी साल के 265 दिन हमारे पास काम नहीं। हमारे पास इतना पैसा भी हाथ में नहीं होता कि घर में किसी का इलाज करा पाएं। मजबूरी में उधार लेते हैं और सैकड़े का 15 रुपया हर महीने ब्याज देते हैं, क्या कर सकते हैं," झारखंड के लातेहार जिले के जाम्हो गांव में रहने वाली सरो देवी फोन पर कहती हैं, "हम पहले भी गरीब थे, आज भी गरीब हैं।"

रोजगार की गारंटी देने वाली दुनिया की सबसे बड़ी योजना मनरेगा गांव के लोगों के लिए एक बड़ी कमाई का जरिया है। अगर इसे मजबूत किया जाए तो गाँव के लोगों की बेरोजगारी दूर हो सकती है।

नीति आयोग की सतत विकास लक्ष्य इंडेक्स (एसडीजी) 2019-20 की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2030 तक 'गरीबी मुक्त भारत' के अपने लक्ष्य में भारत चार अंक और नीचे लुढ़क गया है, देश के 22 राज्य गरीबी दूर करने में आगे बढ़ने की बजाए काफी पीछे जा चुके हैं। देश में गरीबी रेखा से भी नीचे बसर करने वाली आबादी 21 फीसदी पहुंच चुकी है।

नीति आयोग की एसडीजी की रिपोर्ट में देश में गरीबी का आंकलन जिस हिसाब से किया गया है, उन पांच संकेतकों में मनरेगा में रोजगार पाने वाले लोगों का प्रतिशत भी शामिल है, लेकिन ग्रामीण भारत में मनरेगा में काम कर रहे मजदूर मौजूदा मजदूरी की दरों और मिलने वाले काम से संतुष्ट नहीं हैं।


"मनरेगा के मजदूर बहुत निराश हो जाते हैं जब उन्हें मनरेगा में समय से मजदूरी नहीं मिलती। हमारे पास भी शिकायत लेकर आते हैं, औरों से उधार पैसा मांगते हैं, क्योंकि परिवार तो पालना ही है। कम से कम सरकार मनरेगा कानून के अनुसार समय से मजदूरी तो दे। जब तक सरकार मनरेगा का बजट नहीं बढ़ाएगी, मनरेगा को और योजनाओं से जोड़कर दायरा नहीं बढ़ाएगी, साल के कम से कम 200 दिन काम नहीं देगी, तब तक गांव का विकास नजर नहीं आएगा। जरूरी है कि मनरेगा का बजट बढ़े," जितेन्द्र पासवान कहते हैं।

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बिहार के मनसाही ब्लॉक में चितौरिया ग्राम पंचायत के जितेंद्र पासवान और उनकी पत्नी सरस्वती देवी दोनों मनरेगा में काम करते रहे हैं। आज जितेंद्र सरपंच हैं, लेकिन उनकी पत्नी आज भी मनरेगा में मजदूरी करती हैं। मनरेगा में काम करने वाले ग्रामीणों की मजदूरी खेतों में काम करने वाले मजदूरों से भी कम मिलती है।

झारखंड में मनरेगा संघर्ष मोर्चा के संयोजक देबमाल्या नंदी 'गाँव कनेक्शन' से फोन पर कहते हैं, "ग्रामीण क्षेत्र में स्थिति खराब है, युवाओं के पास रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं है और वे सबसे कम मजदूरी में भी काम करने के तैयार हैं। जरूरी यह है कि सरकार मनरेगा में कम से कम 90 हजार करोड़ का बजट तय करे और मनरेगा का दायरा बढ़ाए। साथ ही, मनरेगा में मजदूरी दरों को भी बढ़ाया जाए ताकि ग्रामीणों के पास हाथ में पैसा आए और उनकी क्रय शक्ति बढ़े।"

दूसरी ओर व्यापार, सतत विकास, रोजगार और गरीबी दूर करने पर कार्य करने वाली संस्था अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने अपने हालिया आंकलन में बताया कि भारत की आर्थिक वृद्धि गिरी है, जिसके लिए ग्रामीणों की कम आमदनी बड़ी वजह है। साथ ही, यह भी संकेत दिया कि भारत की आर्थिक वृद्धि दर गिरने की वजह से वैश्विक आर्थिक वृद्धि में कमी आने का अनुमान है।

पश्चिम बंगाल में हालात और भी बदतर हैं। राज्य के पं. मेदिनीपुर जिले के दातां-02 ब्लॉक के दामोन्दा गांव के रहने वाले मनरेगा मजदूर संदीप सिंघा ने 'गांव कनेक्शन' से कहा, "एक साल से हमारे राज्य में कोई भी नया जॉब कार्ड नहीं बना, नए लोगों को भी काम नहीं मिल रहा। अभी ग्रामीण परिवार का सिर्फ एक जॉब कार्ड बनता है, जबकि सरकार ऐसा प्रावधान करे कि परिवार के हर व्यस्क आदमी को जॉब कार्ड दे ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को मनरेगा में काम मिले।"

भारतीय लोक प्रशासन संस्थान, नई दिल्ली की अर्थशास्त्री आशा कपूर मेहता फोन पर समझाती हैं, "जहां तक मनरेगा की बात है तो ग्रामीण क्षेत्रों के लिए मनरेगा का बजट बहुत ही कम है। सरकार को न सिर्फ बजट बढ़ाना चाहिए, बल्कि एक ग्रामीण परिवार को साल में सिर्फ 100 दिन काम मिलता है, इसे भी बढ़ाया जाए और यह तभी होगा जब सरकार मनरेगा का दायरा बढ़ाएगी।"

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अर्थशास्त्री आशा कपूर आगे कहती हैं, "पहली बात यह कि अगर कोई काम करने को राजी है तो सरकार का यह दायित्व है कि वो रोजगार उपलब्ध कराए। देश में बढ़ती गरीबी और बेरोजगारी बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है, और इस पर केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर काम करने की जरूरत है, अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग स्थितियों का गहराई से आंकलन होना चाहिए और उसी के अनुसार रूपरेखा बनाकर जमीनी स्तर पर काम होना चाहिए।"

नीति आयोग की एसडीजी रिपोर्ट के अनुसार देश के गरीब राज्यों में सबसे खराब स्थिति छत्तीसगढ़ की है, जहां करीब 40 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे बसर कर रही है। छत्तीसगढ़ के बाद झारखंड की स्थिति है, जहां 37 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं।

छत्तीसगढ़ के ब्लॉक लुण्ड्रा के बिल्हमा गांव के रहने वाले सीमांत किसान धरम साय कहते हैं, "हमारे राज्य में भले ही प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध हैं, मगर गांव में आदमी या तो खेती करता है या फिर मनरेगा में काम। कई भूमिहीन किसान हैं, वे मनरेगा में काम न मिलने पर खाली बैठे रहते हैं, क्योंकि दूर शहर में जाकर काम कर नहीं सकते, जबकि सरकार को और भी रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना चाहिए।"

फोटो साभार : जीबिज डॉट कॉम

वहीं, छत्तीसगढ़ में ही पं. रविशंकर शुक्ला यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र विभाग के प्रो. अमरकांत पाण्डेय कहते हैं, "सरकार को गरीबी को कम करने के साथ रोजगार बढ़ाने पर जोर देना चाहिए। इसके अलावा हर चीज मुफ्त में बांटने की प्रवृत्ति भी सही नहीं है, इसलिए गरीबी के हालात और भी गंभीर स्थिति में हैं। लोगों को काम मिले और उनका जीवन स्तर सुधरे, जरूरी यह है।"

गरीबी और बेरोजगारी से उपजी भयावह तस्वीर को देश भर में अपराध के आंकड़े एकत्र करने वाली संस्था एनसीआरबी ने भी दिखाया है। उसकी वर्ष 2018 की रिपोर्ट के अनुसार गरीबी और बेरोजगारी की वजह से देश में हर रोज 10 लोग आत्महत्या कर रहे हैं।

नई दिल्ली की जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी में तीन दशकों तक रहे अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे अरुण कुमार कहते हैं, "देश में गरीबी और बेरोजगारी तेजी से पांव पसार रहे हैं। आज देश में जिस 05 प्रतिशत विकास दर की बात करते हैं, असल में यह विकास दर शून्य भी नहीं, बल्कि अब - 02 प्रतिशत पहुंच चुकी है क्योंकि विकास दर की गणना ही गलत है। ऐसा इसलिए क्योंकि असंगठित क्षेत्र तो इस गणना में आता ही नहीं है।"

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दुनिया से गरीबी खत्म करने के लिए काम करने वाली संस्था ऑक्सफेम ने जनवरी-2020 में जारी रिपोर्ट में बताया है कि देश के एक फीसदी अमीर लोगों की संपत्ति निचले तबके के 70 प्रतिशत आबादी की कुल सम्पत्ति से भी चार गुना ज्यादा है। देश के 63 अरबपतियों की संपत्ति देश के एक साल के बजट से भी ज्यादा है।

इस पर वरिष्ठ अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार कहते हैं, "ऑक्सफेम की रिपोर्ट में अमीरों के पास संपत्ति का बहुत बड़ा आंकड़ा सामने आया है। हम पहले भी सरकार को राय देते रहे हैं कि जरूरी यह है कि अमीर वर्ग पर सरकार संपत्ति कर वसूले और इस धन को योजनाओं के जरिए गांव, गरीब और किसान के लिए दिया जाए ताकि ग्रामीण और कृषि अर्थव्यवस्था सुधरे, लोगों को रोजगार मिले।"

गांव के लोगों को रोजगार की किस हद तक जरूरत है यह वाराणसी के कज्जाकपुरा में काम करने वाले सूरज कुमार (27 वर्ष) बताते हैं, "पढ़ा-लिखा हूं मगर क्या करूं, कोई नौकरी ही नहीं है, यहां एक कारखाने में पीतल की डलिया बनाने का काम करता हूं, एक डलिया के हिसाब से पैसा मिलता है तो दिन में 120-130 रुपए कमाता हूं, काम पेचीदा है, चोट लग जाए तो अलग से कोई पैसा भी नहीं मिलता, मगर क्या करें यही छोटा-मोटा काम करना पड़ता है, सरकार हम जैसे लोगों को कम से कम अच्छी नौकरी तो दे।"


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