'खेतों की सिंचाई तो दूर की बात है, यही गंदा पानी पीना पड़ता है'

बारिश की कमी के कारण झारखंड के कोडरमा के सूखा प्रभावित छह प्रखंडों में से डोमचांच और मरकच्चो की स्थिति काफी भयावह

कोडरमा (झारखंड)। "यही गंदा पानी पीना पड़ता है हमें, खनन की वजह से अभ्रक के कण मिले रहते हैं इस पानी में, मगर क्या करें, मजबूर हैं, हमारा गाँव आज सूखे की चपेट में है, पीने का साफ पानी तक नसीब नहीं है हमें, खेतों की सिंचाई तो दूर की बात है," कोडरमा जिले के अरैया गाँव में घर के बाहर खाट पर बैठे गंदौरी कुमार की ये मुश्किलें बातों-बातों में उनके माथों पर पड़ रही सिलवटों से बखूबी पहचानी जा सकती थीं।

सूखे की मार झेल रहा झारखंड का कोडरमा जिला। फोटो: मो. असगर खान

झारखंड का यही कोडरमा जिला सियासी और खनिज संपदा, दोनों ही दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जाता है। सियासी इसलिए क्योंकि झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी यहां से दो बार सांसद रहे, तो वर्तमान में भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र राय सांसद हैं। खनिज संपदा इसलिए क्योंकि यही वो जिला है जो भारत को दुनिया का सबसे बड़ा अभ्रक उत्पादक देश बनाने में अहम भूमिका निभाता है, बावजूद इसके कोडरमा के किसानों की बदहाली के लिए सरकार की कोई ठोस नीति नजर नहीं आती है।

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पिछले साल नवंबर में राज्य गृह आपदा प्रबंधन विभाग ने झारखंड के 18 जिलों के 129 प्रखंड को सूखाग्रस्त क्षेत्र घोषित किया है। जिन पांच जिले (गोड्डा, बोकारो, देवघर, पलामू, कोडरमा) को सबसे अधिक प्रभावित बताया गया है, उसमें कोडरमा भी है। बारिश की कमी के कारण कोडरमा के उन छह प्रखंडों में से डोमचांच और मरकच्चो की स्थिति काफी भयावाह मालूम पड़ती है।

राजधानी रांची से 165 किमी. दूर कोडरमा में अधिकांश किसान सिंचाई के लिए पूर्णतः मानसून पर ही निर्भर हैं। इसके आलावा जो इनके पास सिंचाई का साधन है वो तालाब और कुएं हैं, जो कि बारिश की कमी और इलाके में अवैध ढंग से जारी भारी खनन की वजह से बीते कई साल से जनवरी-फरवरी में ही सूखने लगते हैं।

दो चापाकल, एक कुआं सूखा पड़ा है...

सूखे की चपेट से गाँव में पानी की समस्या बयां करते गंदौरी कुमार इसी जिले के मरकच्चो प्रखंड के डगरनवा पंचायत के अरैया गाँव में रहते हैं। गंदौरी 'गाँव कनेक्शन' से आगे बताते हैं, "हमारे गाँव में 90 हाड़िया (परिवार) हैं, दो चापाकल (हैंडपंप) हैं, जो सूख पड़े हैं, एक कुआं है, जो फरवरी आते-आते सूख जाता है, तब हम गाँव वालों को दो किमी. दूर से पानी लाना पड़ता है। मानसून आने तक यही हमारी जिंदगी का हिस्सा है।"

किसान फिर खेती कैसे करते हैं, के सवाल पर गंदौरी आगे कहते हैं, "एक बिगहा के आस-पास हमारी खेतिहर जमीन है, पर बारिश हो गई तो धान की रोपाई होती है, नहीं तो मइका (अभ्रक) और मजदूरी से परिवार के लिए दो जून की रोटी जुटा पाते हैं।"

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झारखंड में 15.27 लाख हेक्टेयर में धान की फसल बोई गई थी, लेकिन वर्षा के अभाव में फसल का 40 प्रतिशत हिस्सा बर्बाद हो गया। आपदा प्रबंधन विभाग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि झारखंड में सात लाख हेक्टेयर कृषि भूमि सूखे की चपेट में है।

कुएं भी सूखे पड़े, पानी में साफ दिखाई देते हैं अभ्रक के कण। फोटो: मो. असगर खान

तमाम योजनाओं और दावों के बावूजद गाँव की तस्वीर और तकदीर बदलने की बजाय और बिगड़ती जा रही है। पिछले महीने की जब मैं यहां पहुंचा तो महिलाएं मिट्टी-बालू से अभ्रक के छोटे-छोटे कणों को चलनी से छांट रही थीं। वे इसे बेचकर दो पैसे जुटा पाती हैं। इन्हीं में से एक महिला कहने लगीं, "ये सब शौक से नहीं करते हैं, इसे छांटते-छांटते हम-सभी की सांस छूटने लगती है।"

अभी इनसे से बात कर ही रहा था कि मेरी नजर पास के कुएं से एक औरत को बाल्टी से पानी खींचते हुए पड़ी। पास जाकर उस कुएं को और निकाले गए पानी को देखा। कुआं के पानी में अभ्रक की चमक दिखाई दे रही थी।

किसानों के मुद्दों पर काम कर रही संस्था संग्राम के सचिव ओंकार विश्वकर्मा ने इस गाँव को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज कराई है। जिस पर आयोग ने संबंधित अधिकारी से चार सप्ताह में रिपोर्ट मांगी है। ओंकर बताते हैं, "डगरनवा पंचायत का कटियो, अरैया, बंदरचौकवा जैसे कई गाँव के किसानों को कृषि कार्य के लिए पानी की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। अब हालात यह है कि पूरे पंचायत के लोगों को पीने योग्य पानी तक नसीब नहीं मिल पा रहा है।"

समझें 90 और 95 प्रतिशत का अंतर

डोमचांच प्रखंड के लिए लौटने लगा तो बंदरचौकवा के पास अपने सूखे खेत में कुदाल से मिट्टी काट रहे किसान ताल हेबरम मिलें। इनके इलाके में सूखे की ऐसी मार है कि इन्होंने दो साल से एक धूर भी रबी की फसल नहीं लगा पाए हैं। ताल हेबरम बताते हैं, "ढाई एकड़ जमीन है हमारी, लेकिन बारिश के बिना बेकार है। कुछ धान लगाया था, लेकिन बारिश नहीं हो पाने के कारण सब मर गया।"

तो फिर जीवन यापन कैसे होता है, के सवाल पर हेबरम का जवाब था, "मजदूरी और उधार की बदौलत।" यहां की समस्या पर जब गाँव के मुखिया को फोन किया तो उनकी बेटी ने फोन उठाया और उनके घर पर न होने की बात कही। बाद में कई बार कॉल करने पर मोबाइल स्विच ऑफ मिला।

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सूखे खेत में कुदाल से मिट्टी काट रहे किसान ताल हेबरम। फोटो: मो. असगर खान

वहीं जिला कृषि अधिकारी सुरेश तिर्की गाँव कनेक्शन से बताते हैं, "स्थिति बहुत भयावह है। करीब 90 प्रतिशत किसान रबी की फसल नहीं लगा पाए हैं। थोड़ी बहुत जो बारिश हुई और इधर-उधर से कर लगभग 70 प्रतिशत किसानों ने धान की फसल रोपी थी, उसमें से 95 प्रतिशत फसल मर गई।"

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कोडरमा में करीब 2.5 लाख किसान हैं, जिसमें अधिकतर मझौले किसानों की श्रेणी में आते हैं। इनके पास एक से पांच एकड़ तक खेतिहर जमीन है। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक कोडरमा में कृषि योग्य भूमि 49,960 हेक्टेयर और 64,796.90 वन भूमि है। 109 पंचायत और 717 गाँव हैं।

सूखे के बाद इनके लिए सरकार ने क्या किया?

इस पर जिला कृषि अधिकारी सुरेश तिर्की बताते हैं, "सूखा घोषित होने के बाद हर ब्लॉक में किसान राहत राशि आई है, जिसे जल्द ही आवंटित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री कृषि आशीर्वाद योजना और प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत किसानों को सहायता राशि दी जाएगी, जिसके लिए आवेदन आने शुरू हो गए हैं।"

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हाल में झारखंड सरकार ने घोषाणा किया है कि पौने 23 लाख लघु और सीमांत किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए 'मुख्यमंत्री कृषि आशीर्वाद योजना' के तहत प्रति एकड़ हर साल 5000 रुपये सहायता राशि देगी। जबकि केंद्र सरकार ने कहा कि देश के किसानों को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत प्रति एकड़ हर साल 6000 रुपए मिलेगा।

या तो पलायन, या फिर मजदूरी

अब मैं डोमचांच प्रखंड के बेहराडीह पंचायत में था। गाँव घूमने लगा तो मेरी नजर घर के द्वार पर बैठे हुए नंदकिशोर महतो पर सबसे पहले पड़ी। वो इस बार भी बारिश की वजह कर रबी की बुआई नहीं कर पाए हैं और धान दो माह के खाने भर भी नहीं हुआ है।

सिंचाईं की स्थिति पूछने पर नाराजगी जाहिर हुए कहते हैं, "बारिश ठीकठाक हुई होती तो द्वारी ना बैठा रहता, बल्कि खेतों में गेहूं की फसल को खाद-पानी करता रहता। हमारी तो वृद्धा पेंशन भी नहीं मिलती है, अबकी लगता है कि भूखे मर जाएंगे।" बेहराडीह पंचायत में 300 घर और करीब 500 परिवार हैं, पर इन सबकी समस्या भी समान है। किसान बहुल्य इस गाँव में सौ पर दो ही घर ने इस बार रबी की फसल बोई है बाकि का रोना भी समान है।

नंदकिशोर आगे कहते हैं, "अब तो 70 पार कर गए हैं। अब मजदूरी तो हो नहीं पाएगी हमसे, दो बेटे हैं जो दिहाड़ी मजदूरी में लगे हुए हैं वरना आठ जन भुखे मर जाए।"

पीने के पानी के लिए ग्रामीणों को रोज करना पड़ता है मुश्किलों का सामना। फोटो: मो. असगर खान

इनके पास एक बिगहा खेतिहर जमीन है पर उपज ना के बराबर। इनके मुताबिक पिछली बार 14 कुंतल धान हुआ था और इस बार महज पांच कुंतल ही हो पाया। ठीक यही हाल बगल वाले घर के रामचंद्र यादव का भी है। एक बिगहा में ये 12 कुंतल से दो पर आ गए हैं। रामचंद्र कहते हैं, "खेतों में सूखा पड़ गया। हर साल बारिश की मार दोहरी झेलनी पड़ रही है।"

डोमचांच के बेहराडीह के तहत कई टोले-मोहल्ले आते हैं, जहां के तालाबों और कुएं का पानी जनवरी में ही सूख गए हैं। बीते एक दो सालों में जो यहां नया ट्रेंड बना है वो है पलायन। सूखे का दंश अब नौजवानों के लिए पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और कोलकाता के रूप में पलायन का सबब बन रहा है।

गाँव की भयावह तस्वीर पर मुखिया राजेंद्र मेहता कहते हैं, "तालाब और कुएं का पानी पहले ऐसे नहीं सूखता था। एक तो बारिश की मार और ऊपर से आस-पास 500-500 फीट अवैध ढंग से पत्थर निकाले जा रहे हैं। इससे लगभग एक हजार बिगहा की खेती प्रभावित हुई है। ऐसे में गाँव का नौजवान मनरेगा की 168 रुपये की मजदूरी करेगा या फिर पलायन, ये आप ही बताइए।"

क्या है मनरेगा का हाल?

गाँव वालों की शिकायत है कि मनरेगा उन्हें निरंतर काम मुहैया नहीं कराता है। हाल में 51 दिनों से मनरेगा कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर थे जो 20 जनवरी से काम पर वापस लौटे हैं। और जितने दिन मनरेगा के काम गाँव वालों को मिलता है, उसके बदले प्रतिदिन 168 रुपए से इस महगांई में गुजारा मुश्किल है, इसलिए लोग या तो पत्थर खदान के काम में लग जाते हैं या फिर शहरों की तरफ निकल पड़ते हैं।

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हालांकि अधिकारी ये मानते हैं कि मनरेगा की मजदूरी, और मजदूरी के अपेक्षा कम है लेकिन इसकी वजह से लोग पलायन कर रहे हैं, इससे इंकार करते हैं।

किसानों से बातचीत करने पर पता चलता है कि सरकार की तरफ चलाई जा रही योजनाओं की या तो उन्हें जानकारी नहीं है या फिर उन तक पहुंच नहीं पाती है। जब पंचायत के मुखिया से जानना चाहा कि यहां के किसानों को सरकारी सुविधा मिलती है या नहीं? वो कहते, "सुविधा की बात मत कीजिए। भूख से निपटने के लिए पंचायत को मिलने वाले दस हजार रुपये की आर्थिक सहायता राशि भी नहीं मिली है।"

भूख से हुए मौत के बाद झारखंड राज्य खाद्य आपूर्ति विभाग द्वारा पूरे राज्य के मुखिया के खाते में दस हजार रुपये देने का प्रावधान किया है। मुखिया राजेंद्र मेहता के मुताबिक वो राशि तक बेहराडीह पंचायत को नहीं मिली। इस पर ओंकार विश्वकर्मा कहते हैं, "सरकारी योजानाएं 70 प्रतिशत तक फेल हो जाती है, जबकि 30 प्रतिशत का लाभ बिचौलिए ले लेते हैं, यानी किसानों को ना के बराबर।"

हालांकि कृषि विभाग का कहना है कि सरकार प्रधानमंत्री कृषि सिंचाईं योजना के तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर के लिए लघु एवं सीमांत किसानों को 90 प्रतिशत सब्सिडी और बाकि किसानों को 80 प्रतिशत सब्सिडी देती है। सुखाड़ से उभरने के लिए किसानों की हर संभव मदद की जा रही है।

सूख रहे हैं तालाब

सूखे तालाब को दिखाते अशोक तूरी। फोटो: मो. असगर खान

शहर से 30 किलोमीटर चलकर गिरिडीह जाने वाली स्टेट हाइवे की बाईं ओर बसा पंचायत धरगांवा कहलाता है, जहां की आबादी 600 घर की बताई जाती है। बाहर बने चबूतरे पर बैठे कई किसान आपस में बातचीत कर रहे थे। उनमें से एक छोटू यादव बताने लगें, "बहुत मुश्किल से इस बार गेहूं बो पाया हू, इसके लिए पंप वाले को दो सौ रुपये घंटे के हिसाब से देना पड़ा। दो साल से एक एकड़ में धान 25-30 मन ही हो पा रहा है, जबकि इससे पहले दोगुना होता था। इस बार वर्षा नहीं हो पाने के कारण सात मन के करीब ही धान हुआ है।"

डोमचांच प्रखंड की यह पंचायत आबादी के अनुसार से सबसे बड़ी है। यहां के किसानों की कुल मिलाकर 500-600 एकड़ खेतिहर जमीन है।

मुखिया सुरेश यादव ने बताया, "गाँव में पिछली बार की तुलना में इस बार 50 प्रतिशत अधिक फसल बारिश कम होने के कारण तबाह हो गई। कुंए और तालाब जो हैं, वो जनवरी से ही सूखने लगे हैं, हर साल स्थिति बदतर होती जा रही है, सरकार ने जो डोभा (छोटा तालाब) बनवाया था, वो पहले ही सूख गए हैं।"

एक किलोमीटर आगे बढ़ने पर एक विशाल अहरा दिखाई दिया जो कमोबेश सूख चुका है। उसकी तस्वीर लेने लगा तो दूर खड़े अशोक तूरी पास आ गए और वो कहते हैं, "इस अहरे का नाम सतगढ़ा है जो सौ साल से भी पुराना है। इसी से करीब 150 एकड़ खेतों की सिंचाई-पटाई होती थी। बीते दो साल से फरवरी के आखिर तक इसमें जानवर के पीने तक के लिए पानी नहीं बचता है।"

अशोक तूरी के पास पांच एकड़ जमीन है, लेकिन वो इस बार एक डिसिमिल में भी रबी की फसल नहीं लगा पाए हैं। उनके मुताबिक समस्या से अधिकारी और प्रतिनिधि दोनों ही अवगत हैं, पर हल कुछ भी नहीं निकला है।

इसी तरह का डोमांच प्रखंड में पड़ने वाला एक ऐतिहासिक तालाब शिवसागर है। स्थानीय लोग बताते हैं कि यह तालाब पहली बार पिछले साल सूखा था। जो थोड़े बहुत पानी है इसमें, वो टैंकर से लाकर भरा गया है। अब ये फिर से धीरे-धीरे सूखने लगा है।

क्या कहते हैं कृषि निदेशक

तालाबों में जानवरों के पीने तक नहीं उपलब्ध है पानी। फोटो: मो. असगर खान

झारखंड के कृषि निदेशक रमेश घोलप 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, "इस बार औसत बारिश से 28 प्रतिशत कम वर्षा हुई है। राज्य की लगभग सात लाख हेक्टेयर जमीन सूखे की चपेट में आई है। सरकार ने इसे देखते हुए 18 जिलों के 129 प्रखंडों के सूखा प्रभावित किसानों को बीज पर 90 प्रतिशत की सब्सिडी उपलब्ध कराई है।"

रमेश आगे कहते हैं, "फसल बीमा पर किसानों के द्वारा दिए जाने वाले दो प्रतिशत के प्रमियम का भी वहन सरकार कर रही है। इसके अतिरिक्त एग्रीकल्चर इनपुट सब्सिडी के लिए प्रस्ताव भारत सरकार को भेज दिया गया है। वहीं गाँव में नये तालाबों का निर्माण और पुराने का जीर्णोद्वार किया जा रहा है। सूखा घोषित होने के बाद अलग से राहत आपदा के तहत भारत सरकार को 1535.292 करोड़ रुपए की राशि का मेमोरंडम बनाकर भेजा गया है, जिसे सूखा प्रभावित क्षेत्रों में खर्च किया जाएगा।"

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