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झारखंड : लॉकडाउन में विदेश में फंसे दो मजदूरों की मौत, दो महीने बाद भी शव का इंतजार कर रहे ग्रामीण परिवार

लॉकडाउन के दो महीने बाद भी विदेश में बड़ी संख्या में फँसे मजदूर अभी भी सामने आ रहे हैं, मगर कुछ ऐसे मजदूर हैं जो वहां लॉकडाउन के दौरान अपनी जान गवां बैठे हैं, अब इनके परिजन बुरी तरह परेशान हैं, लम्बे इंतजार के बाद भी इन्हें अपनों के शव नहीं मिल सके हैं।

Kushal MishraKushal Mishra   3 Jun 2020 2:24 PM GMT

झारखंड : लॉकडाउन में विदेश में फंसे दो मजदूरों की मौत, दो महीने बाद भी शव का इंतजार कर रहे ग्रामीण परिवारलॉकडाउन के दौरान विदेश में मजदूरों की मौत से सदमे में हैं झारखण्ड के ग्रामीण परिवार।

पूनम देवी की रो-रो कर आंखें पथरा गयी हैं, विदेश में मजदूरी के लिए गए उनके पति रामेश्वर महतो की लॉकडाउन के दौरान आई मौत की खबर से उनका पूरा परिवार टूट गया है। दो महीने बीत जाने के बाद भी अब तक अपने पति का शव न मिल पाने से झारखंड के गिरिडीह जिले की 28 साल की पूनम अब बुरी तरह आहत हो चुकी हैं।

पूनम की ही तरह ही हजारीबाग जिले की मंजू देवी का भी रो-रो कर बुरा हाल है। अफ्रीका के मरुतानियां मजदूरी के लिए गए उनके पति महादेव सोरेन की लॉकडाउन के दौरान अचानक मौत हो गयी। मगर उनके पति का शव अब तक उनके परिवार को नसीब नहीं हो सका है। गाँव में अपने चार बच्चों के साथ रोती-बिलखती मंजू हर किसी से अपने पति का शव दिलाने की गुहार लगा रही हैं।

देश के सिर्फ दूसरे राज्यों से ही नहीं, विदेश में मजदूरी के लिए गए और लॉकडाउन में वहीं फंसकर रह गए हजारों प्रवासी मजदूर भी लगातार सामने आ रहे हैं। ऐसे में झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार इन प्रवासी मजदूरों को हवाई जहाज से झारखंड लाने का प्रयास कर रही है। मगर कुछ मजदूर ऐसे भी हैं जो लॉकडाउन के दौरान विदेश में अपनी जान गवां बैठे हैं, अब इनके परिजन बुरी तरह परेशान हैं, लम्बे इंतजार के बाद भी इन्हें अपनों के शव नहीं मिल सके हैं।

झारखंड के इन्हीं परिवारों में गिरिडीह जिले के अतकी ग्राम पंचायत में धावाटांड गाँव की पूनम देवी का परिवार भी शामिल है। पूनम के पति रामेश्वर महतो (32 वर्ष) एक साल पहले मलेशिया गए थे, वहां लाईरिको ट्रांसमिशन कंपनी में वो टावर फिटिंग में मजदूरी करते थे। लॉकडाउन के दौरान रामेश्वर भी और मजदूरों की तरह वहीं फंसकर रह गए, मगर छह अप्रैल को अचानक तबियत ख़राब होने से मलेशिया के ही एक अस्पताल में उनकी मौत हो गयी।

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मलेशिया में मजदूरी के लिए गए रामेश्वर की मौत की खबर मिलने के बाद शव का दो महीने से इंतज़ार कर रहा पूनम का परिवार

रामेश्वर की पत्नी पूनम बताती हैं, "दो महीना होने को आ रहा है, मगर कोई हम लोगों की मदद नहीं कर रहा है, हम सबको उनका (रामेश्वर का) शव दिलाने के लिए बोले हैं, सरकार के लोगों से भी बोले, मगर अब तक कुछ नहीं हो सका।"

गाँव में पूनम के परिवार में उनके सास-ससुर और दो बच्चे हैं। रामेश्वर ही अपने परिवार का खर्चा चलाते थे और हर महीने अपने घर पैसा भेजा करते थे, मगर उनकी मौत के बाद अब पूनम पर सारा बोझ आ गया है।

पूनम बताती हैं, "घर में कोई काम-धंधा करने वाला नहीं है, सास-ससुर हैं, दो बच्चे हैं, अब कैसे गुजर-बसर करेंगे, जो थोड़े-बहुत पैसे हैं अगर वो भी खर्च हो जाएंगे तो हम क्या करेंगे, कोई मदद भी नहीं करने वाला।"

पूनम जैसा हाल हजारीबाग जिले के भेलवारा ग्राम पंचायत के बिसुइया गाँव में अपने चार बच्चों के साथ रहने वाली मंजू देवी का भी है। मंजू के पति महादेव सोरेन मजदूरी के लिए अफ्रीका के मरुतानियां गए थे। मरुतानियां में वह कल्पतरु ट्रांसमिशन कंपनी में मजदूरी करते थे, मगर 26 मई को बाथरूम में पैर फिसल जाने से महादेव की मौत हो गयी। मौत की खबर मिलने के बाद गाँव में परिवार के लोग सदमे में हैं।

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महादेव की मौत की खबर मिलने के बाद परिवार के लोगों के नहीं थम रहे आंसू।

महादेव के छोटे भाई साहेबराम सोरेन बताते हैं, "जब से खबर सुनी है परिवार में सभी बहुत परेशान हैं, उनकी पत्नी मंजू का रो-रो कर बुरा हाल है, मंजू के चार बच्चे भी हैं, अभी तो इतना समय हो गया है, फिर भी हम लोगों को शव नहीं मिला है।"

"हम लोग हर जगह दरख्वास्त लगा रहे हैं कि मगर हमें बताया जाता है कि लॉकडाउन की वजह से अभी कुछ नहीं हो रहा है। कम से कम सरकार को एक मजदूर का शव दिलाने के लिए आगे आना चाहिए, अभी तो कोई मदद करने वाला भी नहीं है," साहेबराम कहते हैं।

झारखंड में प्रवासी मजदूरों की घर वापसी को लेकर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता सिकंदर अली बताते हैं, "झारखंड से कई मजदूर अभी भी विदेशों में फंसे हैं, सरकार उन्हें वापस लाने की कोशिश कर रही है, मगर लॉकडाउन के दौरान विदेशों में फँसे मजदूरों की मौत के मामले सामने आ रहे हैं, इनके परिवार बुरी तरह प्रभावित हुए हैं, सरकार को इनकी मदद करनी चाहिए।"

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