मकर संक्रांति खास है, वनवासियों के लिए

चाहे पेड़-पौधे हों या ब्रम्हाण्ड, इसके हर एक अंग को किसी ना किसी तरह अपनी आस्थाओं से जोड़कर वनवासियों ने प्रकृति को सदैव अपने-अपने तरीकों से अपनाया है, माना है

Deepak AcharyaDeepak Acharya   8 Jan 2019 7:17 AM GMT

मकर संक्रांति खास है, वनवासियों के लिए

भारतीय वनांचलों में रह रहे आदिवासियों की सदियों पुरानी परंपराओं और सामाजिक कार्यक्रमों में त्यौहारों का बेहद महत्व माना जाता है। वनवासियों ने प्रकृति को हमेशा से देवतुल्य माना है। चाहे पेड़-पौधे हों या ब्रम्हाण्ड, इसके हर एक अंग को किसी ना किसी तरह अपनी आस्थाओं से जोड़कर वनवासियों ने प्रकृति को सदैव अपने-अपने तरीकों से अपनाया है, माना है।

मकर संक्रांति का त्यौहार जहां सारे हिन्दुस्तान में अपनी-अपनी तरह से मनाया जाता है, वहीं दूरस्थ वनों और ग्रामीण इलाकों में भी इसकी अपनी महत्ता है। जहां एक ओर भारत में इसे सूर्य देव के आराध्य से जोड़कर देखा जाता है वहीं डांग जैसे सुदूर इलाकों में इस त्यौहार को मानसिक सुख शांति, फसल कटाई और स्वास्थ्य बेहतरी की दृष्टि से अति उत्तम माना जाता है। मकर संक्रांति का वनवासी जीवनशैली में आध्यात्मिक और धर्मिक के साथ-साथ सेहत दुरुस्ती की दृष्टि से भी महत्व है।

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साभार: इंटरनेट

दक्षिण गुजरात में एक जिला है "डाँग", जहाँ शत प्रतिशत वनवासी आबादी बसी हुई है और यहाँ आमजनों के बीच मकर संक्रांति को लेकर जितनी जानकारी है शायद ही देश के किसी अन्य हिस्से में इस विषय को लेकर इतनी जानकारी एक साथ एक जगह पर इतने सारे लोगों को हो। मकर संक्रांति की बात की जाए तो वनवासी बेहद उत्साहित नजर आते हैं।

बुजुर्ग वनवासियों के अनुसार इसी दिन से सूर्य का उत्तर दिशा में प्रवेश होता है और इस दौरान सूर्य की किरणें तेजवान होने लगती हैं और सूर्य प्रकाश पृथ्वी पर समस्त जीवों को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। ज्यों-ज्यों सूर्य प्रवेश उत्तर दिशा की ओर अग्रसर होता जाता है वैसे-वैसे हमारे जीवन में भी सकारात्मकता के भाव आते जाते हैं, सूर्य की इस अवस्था को उत्तरायण के नाम से भी जाना जाता है।

डाँग जिले के सबसे बुजुर्ग हर्बल जानकार और वैद्य स्व. जानू काका अक्सर कहा करते थे कि मकर संक्रांति हर मनुष्य के लिए बेहद महत्व का त्यौहार है। इनके अनुसार दक्षिणायन के पूर्ण होने के बाद अगले पंद्रह दिनों में ज्यों-ज्यों सूर्य उत्तर दिशा की ओर अग्रसर होता जाता है त्यों-त्यों मानव शरीर और मानव के इर्द गिर्द घटनाओं में सकारात्मकता आते जाती है और इस दौर में यदि नए व्यवसाय या कार्य की शुरुआत हो तो इन्हें सफलता मिलना लगभग तय होता है।

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डाँग में कुकना, गामित, भीखा, वरली और कुनबी वनवासी अपनी पारंपरिक जीवन शैली में उत्तरायण को विशेष तौर से आज भी अपनाए हुए हैं। इन वनवासियों के लिए आज भी अपनी सामाजिक परंपरा अति-महत्वपूर्ण है। जहाँ आम रूप से मकर संक्रांति नयी ऋतु के आगमन का संदेश है वहीं वनवासियों के लिए यह समय पिछली ऋतु में बोयी फसलों की कटाई से जोड़कर देखा जाता है।

वनवासियों की मान्यता के अनुसार यह काल अन्धकार से उजाले की तरफ जाने की तरह होता है, सूर्य की रौशनी ज्यादा समय तक धरती पर पड़ती है, रातें अपेक्षाकृत छोटी हो जाती है। नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर इंगित करने वाले इस त्यौहार पर गाँव के बुजुर्ग धरती माँ, पर्वत और प्रकृति की पूजा कर पिछ्ली फसल के लिए धन्यवाद देते हैं और फसल कटाई का कार्य शुरु करते हैं।

मकर संक्रांति के समय वनवासियों का यह विशेष प्रकृति प्रेम एक मिसाल की तरह है। गाँव के सबसे ज्यादा सम्माननिय व्यक्ति को इस पूजा अर्चना का दायित्व दिया जाता है। डाँग- गुजरात में देव-स्वरूप माने जाने वाले जड़ी-बूटियों के जानकार जिन्हें भगत कहा जाता है, वे इस कार्य का संपादन करते हैं।

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चलिए अब चर्चा मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले की पातालकोट घाटी वनवासियों की भी कर ली जाए। पातालकोट एक अलग दुनिया है, विकसित समाज की मुख्यधारा से कोसों दूर ये आदिवासी आज भी प्रकृति को अपना सबसे बड़ा देव मानते है। ध्ररातल से 3000 फीट की गहरायी में गोंड और भारिया जनजाति के वनवासी इस घाटी में वास करते हैं। गौत्र, गृह- नक्षत्रों के बारे में इनकी समझ दुनिया से अलग है, जड़ी-बूटियों का भी इनकी जीवनशैली में एक महत्वपूर्ण स्थान है।

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मकर संक्रांति को ये आदिवासी अपने नजरिये से बड़ा ही महत्वपूर्ण मानते हैं। जानकारों के अनुसार इस त्यौहार का सीधा सम्बन्ध प्रकृति, ऋतु परिवर्तन और कृषि से है जो कि जीवन का आधार हैं। मकर संक्रांति से एक दिन पहले शाम होते ही पातालकोट के हर्बल जानकार (जिन्हें भुमका कहा जाता है) अपने घर- आंगन के चारों तरफ़ गौ-मूत्र का छिड़काव कर परिवेश शुद्धि की प्रक्रिया करते हैं और फिर घर में रखी सारी वनौषधियों को घर के छ्ज्जे पर, खुले आसमान में अगले 8 दिनों के लिए रख देते हैं, इनका मानना है कि शीत ऋतु की विदाई के साथ बसंत ऋतु के आगमन यानी उत्तरायण काल में सूर्य की किरणें रोगहारक होती हैं और ज्यों-ज्यों सूर्य की चमक तेज़ होती जाती है, इसकी किरणों में रोगों को हर लेने की क्षमता होती जाती है, इन किरणों का असर त्वचा के रोग को भी ठीक कर सकता है।

इन आदिवासियों के अनुसार अपनी किरणों से सूर्य इन जड़ी-बूटियों में अमृत का संचार कर देता है और ये जड़ी बूटियां फिर रोगोपचार के लिए उपयोग में लायी जाती है। देर रात ये आदिवासी अपने आंगन में अलाव जलाकर नाच गाना भी करते है और वाद्य-यंत्र जैसे ढोल, टिमकी, शहनाई, टिमगा आदि बजाए जाते हैं और मकर संक्रांति के सूर्योदय का इंतज़ार करते हैं। वनवासी कुटकी से बने व्यंजन तैयार करते हैं जिनमें कुटकी की पट्टियां, लड्डू, पापड़ आदि मुख्य होते हैं।

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इसके अलावा इस दौरान तिल, मक्का, चावल, उड़द की दाल एवं गुड़ खाना बेहद इस दौरान हितकर माना जाता है। कुटकी, तिल, मक्का और गुड़ पौष्टिक होने के साथ ही साथ शरीर को गर्म रखने वाले भी होते हैं। वनवासियों से प्राप्त एक जानकारी के अनुसार शीतकाल सूक्ष्मजीवों के संक्रमण का काल होता है और बसन्त के आते-आते इनमें कमी तो आ जाती है लेकिन मकर संक्रांति के दौरान इन पदार्थों के सेवन से शरीर को आंतरिक गरमाहट मिलती है जो सूक्ष्मजीवों को जड़ से उखाड़ फेंकने में सक्षम होते है।

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घाटी के वनवासी मानते हैं कि इस दिन से ही शीत ऋतु की विदाई हो जाती है और बसन्त का आगमन हो जाता है और बसन्त स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए सबसे उत्तम काल माना जाता है। इस दिन घाटी के तमाम लोग झरनों और पोखरों में जाकर सूर्यदेव की उपासना के साथ स्नान करते हैं और बहते हुए जल में तिल का तर्पण कर प्रकृति का धन्यवाद करते हैं। इनका मानना है कि मकर संक्रांति से सूर्य की गति तिल–तिल बढ़ती है, इसीलिए इस दिन तिल के तर्पण और भोग का विशेष महत्व है।

त्यौहारों को परंपराओं से जोड़कर देखना, समझना और इसकी महत्ता को समझना मुझे हमेशा से रोमांचित करता रहा है। चाहे डांग में डूंगर देव यानी पहाड़ों की पूजा की बात हो, पातालकोट में सारी रात अलाव जलाकर नाचना, सूर्योदय का इंतज़ार करना, पोखरों और झरनों में तिल का तर्पण और इससे जुड़ी मान्यताओं को जानकर कई बार मैं खुद सोच में पड़ जाता हूँ कि तथाकथित आधुनिक या मॉडर्न समाज में बच्चों और नयी पीढ़ी को तीज- तयौहारों के असल महत्व के बारे में सीख क्यों नहीं दी जाती? मदर्स डे, फादर्स डे और वेलेंटाइन डे पर खुशी जाहिर करने वाली जमात क्या कभी मकर संक्रांति जैसे त्यौहारों के असल महत्व को समझ पाएगी, सन्देह है। ग्रामीण इलाकों और वनवासियों के प्रकृति प्रेम को क्या कभी हम समझ पाएंगे?

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