अज्ञान और अंधविश्वास के अंधेरे से निकल कर गांव बढ़ें उजाले की ओर

मनीषा कुलश्रेष्ठ हिंदी की लोकप्रिय कथाकार हैं। गांव कनेक्शन में उनका यह कॉलम अपनी जड़ों से दोबारा जुड़ने की उनकी कोशिश है। अपने इस कॉलम में वह गांवों की बातें, उत्सवधर्मिता, पर्यावरण, महिलाओं के अधिकार और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा करेंगी।

अज्ञान और अंधविश्वास के अंधेरे से निकल कर गांव बढ़ें उजाले की ओर

मैं हमेशा कहती हूं, पुरातन परंपराएं भली थीं, मगर यह दिमाग में बिठाना ज़रूरी है कि वही जो पद्धतियां इंसान को इंसान बनाएं। संतोष और सुकून का जीवन जीना सिखाएं। और जो परिवार, स्त्री, प्रकृति और धरती के हित में हों।

सारी पुरानी परंपराएं तो अब भली नहीं कही जा सकतीं न? भले वे उस समय के लिए अच्छी रही हों, मगर बाद में वो सड़-गल गई हों तो? तो उनको तुरंत छोड़ना अच्छा।

जैसे दहेज यानि स्त्रीधन पहले स्त्री के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए दिया जाता रहा हो, मगर आज वह लड़के वालों के लालच में बदल कर कुरीति बन गया है। पहले कई संतानों का होना अच्छा माना जाता था, क्योंकि युद्ध, महामारियां, बीमारियां होती थीं और बहुत लोग मर जाते थे। पहले खेती-किसानी, व्यापार होता था। जितने हाथ उतनी बरक्कत का जमाना, लोग अपनी जमीन छोड़ बाहर नहीं जाते थे। मगर आज दो से अधिक संतान वाले मूरख, जाहिल माने जाते हैं। दो बच्चे हों, अच्छे खाते-पीते पढ़ते रहें। चाहे वो दो लड़के हों, दो लड़कियां हों कि एक लड़का-लड़की हो। आजकल जमाना बदल गया है, लड़कियां लड़कों की बराबरी पर तो लड़के भी हर तरह का काम करने को राजी। दोनों एक समान। लड़कियां भी पुलिस की नौकरी करने लगी हैं, तो लड़के भी बड़े होटलों में खाना पकाने की शानदार नौकरियां करने लगे हैं, फैशन की दुनिया में नाम कमाने लगे हैं। बच्चों का जहां मन रमे वहां जाने दो, जो पढ़ना चाहें पढ़ने दो।

पुरातन परंपराएं, पद्धतियां भली हैं मगर वही जो इंसान को इंसान बनाएं

पुरानी लीक छोड़ने में जहां भलाई दिखे तो छोड़ दो। कुछ पुरानी बातें अब साइंसदां लोगों ने उलटी साबित कर दी हैं, क्योंकि जब शिक्षा का दायरा बढ़ा तब ही पता चला कि जो हम सोचते थे वो गलत था। पहले हमारी दादियां कहा करती थीं कि मां का पहला दूध संतान के लिए खराब होता है, क्योंकि वह पीला और गाढ़ा होता था। मगर जब डॉक्टरों ने जांच की और दूरबीन से देखा पता है क्या पता चला? यही कि वह तो बहुत सेहतमंद, सौ बीमारियों से बचाने वाला दूध है। हर जच्चा वह दूध बच्चे को जरूर पिलाए। ठीक ऐसे ही किसी के जल जाने पर हम पानी न डाल कर, कपड़ा डालते, सूखा आटा कि फफोले न पड़ें। मगर वो पुरानी बात गलत निकली। ठंडा पानी डालना जरूरी है और फफोले फ़ायदेमंद हैं। क्यों? क्योंकि पानी, फफोले और फफोलों में भरा पानी भीतरी अंगों को ताप से बचाते हैं। फफोलों में भरा पानी त्वचा को इनफ़ेक्शन यानि संक्रमण से।

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ऐसे ही बहुत से रिवाज, अंधविश्वास नुक़सानदायक हैं। परदा करना, करवाना। बीमारी में भी व्रत-उपवास करना। भाई होने पर बहन की पीठ पर गुड़ की भेली फोड़ना। रजस्वला महिला/लड़की से छुआछूत। गरीबी में भी उधार लेकर पूरे गांव का मृत्युभोज। शादी में उधार का दिखावा। बच्चों को भूखा छोड़ शिवलिंग पर दूध चढ़ाना, शिव जी तो पानी में दो बूंद दूध मिला कर चढ़ाने से भी प्रसन्न होते हैं। दूध के नालियों में सड़ने से भगवान अप्रसन्न होंगे। क्योंकि वह दूध गाय रूपी कामधेनु के बछड़े के हिस्से का है। आप अपने बच्चों, गरीब के बच्चों को पिला सकते हो मगर फैलाना तो पाप है।

सबसे बुरी परंपरा है बीमारी, परेशानी में तंत्र-मंत्र, झाड़-फूंक। आज भी गांवों में सांप काटने पर ओझा के पास ले जाते हैं। सांप के काटते ही, काटे वाली जगह के आगे कस कर सुतली, कपड़ा बांधों कि जहर आगे न फैले और डॉक्टर के पास ले जाओ तेज रफ्तार साधन से। बच्चे के जन्म में जच्चा को या तो अनुभवी, जानकार, मिडवाइफ़ के पास ही ले जाएं। ज़रा ज्यादा तकलीफ हो डॉक्टर के पास ले जाओ। गांव की बिना ट्रेन्ड दाइयों के पास नहीं। झाड़ फूंक डॉक्टर का काम नहीं करते।

एक और पुरातन सड़ी-गली परंपरा है, गांवों में विधवा या बांझ स्त्री को अपशकुनी मानना। विधवा होना तो नियति की बात है, बांझ होना शारीरिक बनावट में कमी की। कई बार बांझ स्त्री के पति में भी कमी होती है। ऐसे में उन स्त्रियों को अपशकुनी क्यों मानना? कई जगह तो कुछ औरतों को डायन भी करार कर देते हैं। और उसे पत्थर मारना, गालियां देना, बांध कर पीटना आम है। यह गुनाह है, कानून की नज़रों में भी और ईश्वर को मानते हो तो वह भी इसे गुनाह मानता है। ऐसी धारणाओं से बचना होगा हम सबको।

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हम को समय में आगे बढ़ना है न, तभी गांव मजबूत बनेंगे। न कि टोनों-टोटकों वाले पुराने समय में लौटना है। आजकल व्हाट्सऐप पर भी अच्छी बातों के साथ अंधविश्वास भी फैल रहा है। बहुत ऊलजलूल बातें भी आती हैं। कई बार दूसरे धर्म को लेकर अशांति फैलाने वाली, उकसाने वाली बातें। अपने धर्म को महान और दूसरे धर्म के लोगों से नफरत फैलाने वाली। उन पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।

धर्म हमारे मन के भीतर, पूजाघर के भीतर की बात है। बाहर सब मनुष्य हैं। इसी धरती के बेटे।

सब अपने धर्म को बेहतर मानें तो अपने घर के भीतर मानें। बाहर एक ही धर्म हो, भाईचारे का।

तो सड़ी-गली हर चीज, रिवाज, अंधविश्वास, जो नया हो या पुराना, इंसानियत, पेड़, बच्चों, औरतों, जानवरों, धरती के हक़ में न हो उसे त्याग दो। दूर कर दो अज्ञान, अंधविश्वास के अंधेरे।

तमसो मा ज्योतिर्गमय अर्थात अंधेरे से उजाले की ओर चलें !

गांव की हरी-भरी पगडंडियां हमें बेहतर इंसान बनाने की तरफ ले चलें। लोग मिसाल दें कि फलां गांव भाईचारे और शांति की मिसाल है। क्यों न वह गांव आपका हो!!

(मनीषा कुलश्रेष्ठ हिंदी की लोकप्रिय कथाकार हैं। इनका जन्म और शिक्षा राजस्थान में हुई। फौजी परिवेश ने इन्हें यायावरी दी और यायावरी ने विशद अनुभव। अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों, सम्मानों, फैलोशिप्स से सम्मानित मनीषा के सात कहानी कहानी संग्रह और चार उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। मनीषा आज कल संस्कृति विभाग की सीनियर फैलो हैं और ' मेघदूत की राह पर' यात्रावृत्तांत लिख रही हैं। उनकी कहानियां और उपन्यास रूसी, डच, अंग्रेज़ी में अनूदित हो चुके हैं।)

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