आर्थिक सर्वेक्षण 2018: महिला व बाल कुपोषण भारत के लिए अभी भी चुनौती

Shrinkhala PandeyShrinkhala Pandey   30 Jan 2018 7:14 PM GMT

आर्थिक सर्वेक्षण 2018: महिला व बाल कुपोषण भारत के लिए अभी भी चुनौतीभारत के लिए कुपोषण गंभीर समस्या।

केन्‍द्रीय वित्‍त एवं कॉरपोरेट मामलों के मंत्री अरुण जेटली ने संसद में आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 प्रस्‍तुत किया और इसमें उन्होंने बताया कि भारत के लिए बाल व मातृ कुपोषण आज भी एक बड़ी चुनौती है।

सवाल ये उठता है कि जिस देश में कुपोषण को दूर करने के लिए तमाम तरह की योजनाएं, आंगनबाड़ी, मिड डे मील, पीडीएस जैसी योजनाओं के बाद भी कुपोषण देश के लिए बड़ा मुद्दा बना हुआ है।

बाजार शोध एवं सलाह कंपनी ईवाई के साथ मिलकर तैयार एक शोधपत्र में संगठन ने भी ये बात कही है। इसमें कहा गया है कि दुनिया के 50 प्रतिशत कुपोषित बच्चे भारत में हैं। साथ ही परिवार में महिलाओं और लड़कियों को सबसे अंत में खाना दिया जाता है जिससे उनके पोषण पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।

अगर बात करें महिलाओं की तो पूरे घर की जिम्मेदारी उठाने वाली ये महिलाएं खुद कितनी कमजोर हैं इसका उदाहरण वैश्विक पोषण रिपोर्ट 2017 देती है। इसके अनुसार 51 फीसदी महिलाएं एनीमिक हैं, इसके पीछे के कई कारण हैं।

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महिलाओं के हित में काम करने वाली दिल्ली स्थित गैर सरकारी संस्था केयर के सदस्य रुपा शर्मा बताती हैं, “हमारे देश में लैंगिक असमानताओं के चलते आज भी लड़की व लड़के के खाने में अंतर किया जाता है खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में या गरीब परिवारों में। जहां बेटे को दूध, दही खाने को मिलता है कई जगह बेटियों के लिए ये जरूरी नहीं समझा जाता।”

महिलाएं घर के पुरुष सदस्यों को तो सब्जी, दाल सब परोस देती हैं लेकिन खुद जो बचता है वही खाती हैं जबकि महिलाओं को पुरुषों से ज्यादा पोषण की जरूरत होती है। महिलाओं को पुरूषों की अपेक्षा ज्यादा कैलोरी की जरूरत होती है। इस बारे में स्वास्थ्य एवं पोषण सलाहकार डॉ सुरभि जैन बताती हैं, “एक घरेलू महिला को दिन भर में 2100 कैलोरी की जरूरत होती है वहीं खेती या मजदूरी करने वाली महिला को 2400 कैलोरी की जरूरत होती है। महिलाओं को पूरे पोषण के लिए भोजन में दाल, चावल, रोटी और हरी सब्जी दोनों समय लेना चाहिए। फल और दूध को आहार में शामिल करना चाहिए। खाने में प्रोटीन की मात्रा ज्यादा होनी चाहिए।”

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 (एनएफएचएस -4) के आंकड़ों पर किए गए विश्लेषण के अनुसार, 6 से 23 महीने की आयु के 10 भारतीय शिशुओं में से केवल 1 को पर्याप्त आहार मिलता है। नतीजा यह है कि पांच साल से कम उम्र के 35.7 फीसदी बच्चों का वजन सामान्य से कम है। वहीं यूनिसेफ के अनुसार, पहले वर्ष में स्तनपान पांच साल से कम उम्र के बच्चों में करीब करीब पांचवे हिस्से (1/5) की मौतों को रोक सकती हैं।

बच्चों को नहीं मिल पाता पर्याप्त पोषण

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महिला व बच्चों के स्वास्थ्य पर काम करने वाली गैर सरकारी संस्था प्रयत्न के समन्वयक प्रवेश वर्मा बताते हैं, हमारे यहां अलग अलग धर्म से जुड़े लोग रहते हैं जो मांस, मछली का सेवन नहीं करते हैं इन खाद्य पदार्थों में ज्यादा प्रोटीन पाया जाता है। ये भी एक कारण है महिलाओं व बच्चों में पोषण की कमी है।

दूसरा जब महिला स्वयं कुपोषित है तो स्वस्थ बच्चे को जन्म भी नहीं दे पाएगी। मातृमृत्यु का भी सबसे बड़ा कारण एनीमिया है। जब मां स्वस्थ होगी तो स्वस्थ बच्चे का जन्म होगा। इसके अलावा अशिक्षा भी एक कारण है। पिछड़े क्षेत्र में रहने वाले कुछ माता-पिता जानकारी न होने की वजह से बच्चे को पोषक आहार नहीं खिला पाते हैं और उनका बच्चा कुपोषण का शिकार हो जाते हैं।

कुछ माएं ऐसी होती है, जिन्हें इतनी जानकारी नहीं होती कि वह अपने बच्चे को खाने में क्या दें। इसलिए जानकारी के अभाव में, वह बच्चों को उनकी पसंद का आहार देती रहती हैं। स्वादानुसार तो ऐसे आहार अच्छे होते हैं, लेकिन सेहत पर इनका कोई फायदा नहीं होता।

मोटापा भी बन रही परेशानी

भारत की आधी से ज्यादा महिलाएं प्रजनन की आयु में खून की कमी का शिकार हैं, वहीं 22 फीसदी वयस्क महिलाएं मोटापे का शिकार हैं। रिपोर्ट में 140 देशों के आंकड़ों का संकलन गत वर्ष मई माह में किया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार ने समस्या को पहचान लिया है कि महिलाओं में खून की कमी और कुपोषण बड़ी समस्या है लेकिन भारत ने इस समस्या से निपटने के लिए कदम नहीं उठाए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रजनन की उम्र में महिलाएं इसकी सबसे अधिक शिकार होती है, यही नहीं मोटापे और मधुमेह की समस्या भी लगातार बढ़ी है।

मोटे अनाज पोषक तत्वों से भरपूर

गेहूं, चावल के अलावा कई ऐसे मोटे अनाज हैं जिनमें भरपूर मात्रा में पोषक तत्व होते हैं जो कुपोषण को दूर करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। इस बारे में लखनऊ की पोषाहार विशेषज्ञ डॉ सुरभि जैन बताती हैं, “मोटे अनाज जैसे रागी में भरपूर कैल्शियम होता है जई में फाइबर व कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है। ज्वार में भी आयरन, कैल्शियम पाया जाता है इसलिए इन अनाजों को आहार में शामिल करके कुपोषण से बचा जा सकता है।”

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