इस गांव के युवाओं ने परंपरागत खेती छोड़ शुरू की लेयर फार्मिंग, हर महीने कमा रहे लाखों

इस गांव में कुछ वर्ष तक धान, गेहूं और गन्ने की खेती होती थी, लेकिन आज इस गांव के युवा परंपरागत खेती छोड़ लेयर फर्मिंग का व्यवसाय कर रहे हैं। युवाओं की आधुनिक सोच और मेहनत से यह गांव पूरे क्षेत्र में आर्थिक रूप से सबसे संपन्न गांवों में गिना जाने लगा है।

Chandrakant MishraChandrakant Mishra   4 Feb 2019 12:45 PM GMT

इस गांव के युवाओं ने परंपरागत खेती छोड़ शुरू की लेयर फार्मिंग, हर महीने कमा रहे लाखों

गोरखपुर। जनपद में पोल्ट्री उद्योग का तेजी से विस्तार हो रहा है। कई युवा परंपरागत खेती छोड़ मुर्गी पालन और लेयर फार्मिंग का कारोबार कर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। वहीं सैकड़ों ग्रमीणों को उनके गांव में रोजगार मिल रहा है। लेयर फार्मिंग और अंडा उत्पादन में गोरखपुर प्रदेश में अग्रणी जिलों में से हैं।

जनपद मेंं सर्वाधिक अंडे का उत्पादन विकास खंड सरदारनगर के गांव जगदीशपुर में हो रहा है। अकेले इस गांव में 28 से ज्यादा फार्म खुल चुके हैं। इस गांव में कुछ वर्ष तक धान, गेहूं और गन्ने की खेती होती थी, लेकिन आज इस गांव के युवा परंपरागत खेती छोड़ लेयर फर्मिंग का व्यवसाय कर रहे हैं। युवाओं की आधुनिक सोच और मेहनत से यह गांव पूरे क्षेत्र में आर्थिक रूप से सबसे संपन्न गांवों में गिना जाने लगा है।

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राजीव कुमार सिंह ने बताया, " वर्ष 2013 में लेयर फार्मिंग की शुरुआत की। सबसे पहले मैंने 8000 क्षमता वाले लेयर फार्मिंग का निर्माण कराया। उसके बाद मैंने प्रदेश सरकार की कुकुट योजना के तहत श्रृण लेकर 25000 क्षमता वाले फार्म को खोल लिया। अब मुझे काफी मुनाफा होने लगा है। इसके साथ ही मैंने अपने फार्म पर करीब एक दर्जन से ज्यादा लोगों को रोजगार भी दिया है, जिससे उनका जीवन स्तर काफी सुधर रहा है।

लेयर फार्मिंग का व्यापार कृषि से ज्यादा मुनाफ वाले सौदा है, क्योंकि अब खेती में लागत ज्यादा और कमाई कम हो गई है, इसलिए मैंने खेती छोड़ इस बिजनेस को शुरू किया।"


सरकार दे रही 40 लाख रुपए का लोन

प्रदेश में कॉमर्शियल लेयर फार्मिंग और ब्रायलर इकाइयों की स्थापना के लिए प्रदेश सरकार 40 लाख रुपए का लोन दे रही है। इसके साथ ही स्टैम्प ड्यूटी से लेकर फ्री में बिजली और मण्डी पर टैक्स छूट भी दे रही है। इस योजना का लाभ उठाकर आम लोग एक या दो इकाई स्थापित कर सकते हैं।

लेकिन इसकी शर्त है कि लेयर इकाई के लिए तीन एकड़ और ब्रायलर के लिए छह एकड़ जमीन होना जरूरी है। एक कामर्शियल लेयार इकाई से सालाना 32 लाख का लाभ कमाया जा सकता है। इस योजना के लिए जो लोन दिया जा रहा है उसे पांच साल में अदा करना होगा।

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कई युवा लेयर फार्म खोलने की जुगत में

इसी गांव के रहने वाले विनीत त्रिपाठी(32वर्ष) एमटेक की पढ़ाई कर चुके हैं और किसी निजी कोचिंग में पढ़ाते हैं। विनीत भी लेयर फार्मिंग का व्यापार करना चाहते हैं। विनीत ने बताया, " मेरे गांव में आज 28 से ज्यादा फार्म खुल चुके हैं और करीब पांच से ज्यादा निर्माणाधीन हैं। अंडे का उत्पादन करने वाले किसान काफी खुशहाल हैं।

मेरे पास पांच एकड़ खेत है, जिसमें मैं धान और गेहूं की खेती करता हूं। लेकिन जितनी लागत लगती है उसके हिसाब से मुझे मुनाफा नहीं हो रहा है। इसलिए मैं भी बहुत जल्द एक लेयर फार्म खोलने की तैयारी में हूं। इसके लिए लोन प्राप्त करने की प्रक्रिया के आवेदन कर दिया है। मेरे गांव के कई लोग लेयर फार्म खोलना चाहते हैं। "


इसी गांव के रहने वाले दया शंकर का भी 10000 हजार अंडों की क्षमता वाला लेयर फर्मिंग है। दया शंकर ने बताया, 10 हजार अंडों की क्षमता वाला लेयर फार्म लगाने में करीब 45 लाख का खर्च आता है। करीब पांच वर्ष में पूरी लागत निकल जाती है।

हम लोग पहले चूजा खरीदते हैं। एक चूजा पांच माह में तैयार हो जाता है। इसके बाद रोज एक अंडा देने लगता है। हम लोगों को एक अंडे का तीन रुपए मिलता है।"

मुर्गी के बीट से बनी खाद भी बेचत हैं

लेयर फार्म से मछलियों को चारा और खेत के लिए मुर्गियों के बीट से बनी जैविक खाद मुनाफे में मिलती है। एक वर्ष में 10000 की क्षमता वाले लेयर फार्म से 100 ट्राली जैविक खाद निकलती है। मुर्गी के बीट से बनी खाद फसलों के लिए काफी फायदेमंद है। आज कल इसकी मांग बहुत ज्यादा है। एक ट्राली खाद 1500 रुपये में बिकती है। इस तरह से लेयर फार्म का व्यापार करने वाले के लिए यह आय का अतिरिक्त श्रोत है।

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फार्म की रखनी पड़ती है साफ-सफाई

मुर्गी फार्म का व्यापार करने वालों को हमेशा सर्तक रहना होता है, क्योंकि मुर्मियों में बहुत तेजी से रोग फैलते हैं। कई बार एक साथ फार्म की सभी मुर्गियां मर जाती हैं। मुर्गी फार्म के मालिक राजीव ने बताया, " अगर फार्म में नमी हो गई तो मुर्गियों में बीमारी का खतरा रहता है, इसलिए समय-समय पर उस ज़मीन पर बलुई मिट्टी, धान की भूसी और लकड़ी का बुरादा डालते रहते हैं।बाड़ों में साफ-सफाई के अलावा समय-समय पर टीकाकरण भी कराते हैं, जिससे अच्छा उत्पादन हो सके।"

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