थिरकती उंगुलियों में बाल संवारने का हुनर

लखनऊ की सड़कों से जब आप गुजरते होंगे तो कभी न कभी आपकी नजर उन नाइयों पर पड़ी होगी जो सड़क किनारे अपनी छोटी सी दुकान रख कर ग्राहकों के आने का इन्तजार करते हैं। आइए आज हम उस नाई की जि़ंदगी से आपको रूबरू करवाते हैं।

लखनऊ। सड़कों से जब आप गुजरते होंगें तो कभी न कभी आपकी नजर उन नाइयों पर पड़ी होगी जो सड़क किनारे अपनी छोटी सी दुकान रख कर ग्राहकों के आने का इन्तजार करते हैं। आइए आज हम उस नाई की जि़ंदगी से आपको रूबरू करवाते हैं।

एक टूटी सी कुर्सी, जिस पर पड़ी एक तकिया और उस कुर्सी के ठीक सामने पेड़ से लटका शीशा और शीशे के ठीक नीचे मेज पर रखे कई तरह के कंघे और दाढ़ी-बाल काटने का सामान। ये छोटी सी दुकान और सामान हैं लखनऊ में जनेश्वर मिश्र पार्क के किनारे अपनी दुकान लगाकर दाढ़ी और बाल काटने का काम करने वाले नाई कमलेश (40 वर्ष) के, जो कि पिछले 15 वर्षों से यहीं पर दाढ़ी और बाल काटने का काम कर रहे हैं।

कमलेश बताते हैं, "हम सीतापुर के रहने वाले हैं और यहां पर पिछले 15 साल से बाल काटने का काम कर रहे हैं। पहले बाल काटने के काम में और अब बाल काटने के काम में काफी अंतर आ गया है। आज कल लोग जैसे बाल कटवाते हैं, ऐसे बाल कटवाने से पहले डरते थे। पहले लोगों के बाल आज जैसे काट दो तो बोलते थे क्या बिल्ली बना दिए हो, लेकिन आज तो लोग बिल्ली बनने के लिए ही आते हैं।"

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कमलेश बालों की तरह-तरह डिजाइन के बारे में बताते हैं, "आज के हिसाब से हमने खुद को भी बदला है। लोग आते हैं और कहते हैं कि हमारे बाल हनी सिंह, रणवीर सिंह, विराट कोहली और तरह-तरह के हीरों की तरह बाल काटने को बोलते हैं। अब ऐसी डिजाइन के बाल काटने के लिए ऐसी डिजाइन आनी भी चाहिए। जो हमने सीखी है, पहले ऐसे ही आम तरीके के बाल काट लेता था, लेकिन अब उससे काम नहीं चलता है।"

लखनऊ के गोमती नगर में न्यू लॉर्ड्स के नाम से अपनी दुकान चलाने वाले राशिद बताते हैं, "पहले जब लोग बाल कटवाने के लिए आते थे तो बैठ कर अच्छी-अच्छी बाते करते थे, लेकिन आज कल आते हैं कोई फ़ोन में व्यस्त रहता है और कोई कुछ करता रहता है। दुनिया आगे बढ़ने की वजह से काफी दिक्कतें भी आई हैं, जैसे कई मशीनें आ गई हैं अब तो, जिनकी वजह से आदमी दुकान तक आता ही नहीं है। लोग घर बैठे की दाढ़ी-बाल सब बना लेते हैं।"

इनके हाथों में अच्छी कारीगरी

राशिद बताते हैं, "कारीगरी के काम में मुसलमान लोग हमेशा से आगे रहे हैं और आने वाले समय में भी आगे ही रहेंगे। बाल काटने का भी ज्यादातर काम मुस्लिम समुदाय के ही लोग करते हैं क्योंकि उन्हें अच्छी कारीगरी आती है। हम लोगों के वहां लोग सीखने के लिए बाहर भी जाते हैं और अच्छा कम सीखकर आते हैं। कुछ दिन ऐसे भी होते हैं जिनमें लोग कुछ धार्मिक कारणों से लोग बाल कटवाने नहीं आते हैं, उन दिनों में कुछ नुकसान होता है। मंगलवार, गुरुवार और शनिवार को ज्यादातर लोग बाल कटवाने नहीं आते हैं। जबकि रविवार का दिन अच्छा होता है हम लोगों के लिए।"

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