ढेर सारी सरकारी योजनाओं के मायाजाल में उलझा किसान, नहीं अपनाना चाहता ई-नाम

Devanshu Mani TiwariDevanshu Mani Tiwari   4 Feb 2018 8:41 AM GMT

ढेर सारी सरकारी योजनाओं के मायाजाल में उलझा किसान, नहीं अपनाना चाहता ई-नामकिसान अभी नहीं जानते हैं ई-नाम सुविधा के बारे में।

लुभावने विज्ञापन, कृषि खरीद केंद्रों पर सही दाम न मिल पाने और ऑनलाइन सब्सिडी के चक्कर में फंस कर, अब ज़्यादातर किसान अपनी उपज को सीधे तौर पर छोटे व्यापारियों को बेचना ही ठीक मानते हैं। ऐसे में इस बार के बजट में देश की ग्रामीण मंडियों को ई-नाम सुविधा से जोड़े जाने की बात किसानों की समझ से परे दिख रही है।

लखनऊ जिले के चांदपुर गाँव में एक एकड़ में आलू की खेती कर रहे किसान राकेश कुमार ( 46 वर्ष ) ने पिछले वर्ष लखनऊ आकर ई-नाम मंडी के प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लिया। ई-नाम सुविधा में कैसे अपनी उपज बेची जा सकती है और इसका फायदा जानकर उन्हें यह समझ आया कि यह सुविधा सिर्फ बड़े किसानों तक ही सीमित है। राकेश बताते हैं,'' ई-नाम सुविधा उन किसानों के लिए अच्छी सुविधा है, जिनके पास इंटरनेट की अच्छी समझ के साथ-साथ व्यापार करने का ज्ञान भी है। गाँव के छोटे किसान गाँव में ही व्यापारी को फसल बेचना ज़्यादा पसंद करते हैं, उन्हें इस सुविधा से क्या लेना देना है।''

गुरूवार को पेश किए गए आम बजट-2018 में वित्त मंत्री अरूण जेटली ने गाँवों के 22 हज़ार हाटों ( छोटे मंडी स्थलों) को आधुनिक कृषि बाज़ार में तब्दील करने का फैसला लिया है। इसके साथ साथ लघु और सीमांत किसानों के लिए ग्रामीण कृषि बाजारों का विकास किए जाने और नए ग्रामीण बाजार ई-नाम बनाने का ऐलान भी किया है। ई-नाम सुविधा में किसानों की आवक को जांच कर उसका लॉट नंबर जारी कर दिया जाता है। यह लॉट नंबर मंडी में लगी डिजिटल स्क्रीन पर डिस्पले किया जाता है। इससे मंडी में मौजूद व्यापारी और खरीददार किसानों का माल खरीदते हैं। किसानों की आवक का मूल्य उसके ग्रेड ( ए,बी या सी ग्रेडिंग) के आधार पर तय होता है, यानी की जितना अच्छा ग्रेड उतनी अच्छी बोली।

गाँवों के किसान खेती के लिए अॉनलाइन प्लेटफार्म की मदद लेने को ज़्यादा सही नहीं मानते हैं। किसानों को गाँव में ई-नाम सुविधा दी जाने को सरकार की एक मज़ाकिया पहल बताते हुए ऑनलाइन कृषि मार्केटिंग कंपनी एग्रो स्टार के व्यापार प्रबंधक उमापति शुक्ल कहते हैं,'' हमारी कंपनी किसानों को कृषि बीज और पेस्टीसाइड उनके घर तक डिलीवर करती है। इसके लिए किसान हमें मिस्ड कॉल करते हैं और हमारे सर्विसमैन उनके घर तक कृषि का सामान देने जाते हैं। हमारे सर्विस एजेंट दिनभर में 100 किसानों से मिलते हैं और उन्हें मिस्ड कॉल करने के लिए बोलते हैं, लेकिन इसके बावजूद मात्र 10 पर्सेंट किसान ही हमें मिस्ड कॉल करते हैं।''

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वो आगे बताते हैं कि अगर किसानों को बिना पैसे खर्च किए एक मिस्ड कॉल करने में भी इतनी दिक्कत होती है, तो सोच लीजिए कि कितने किसान ई-नाम जैसी सुविधा का उपयोग करेंगे।

ई-नाम बाज़ार में किसानों की आवक पर मिलता है तुरंत भुगतान।

हालांकि सरकारी विभाग ई-नाम सुविधा को गाँवों की मंडियों में लाने को सरकार का अच्छा कदम बता रहे हैं। उत्तर प्रदेश मंडी परिषद के निदेशक धीरज कुमार ग्रामीण हाटों में ई-नाम सुविधा का शुरू होना अच्छा प्रयास मानते हैं। वो कहते हैं, '' गाँव की मंडियां, जब ई-नाम से जुड़ेंगी तो किसानों को दूर जाकर बड़ी मंडियों में अपनी फसल नहींं बेचनी पड़ेगी। हम जल्द ही एक पायलेट प्रोजेक्ट शुरू कर रहे हैं, इसमें सबसे पहले इटौंजा में एग्रीकल्चर मार्केट हब प्वाइंट खोला जा रहा है। यहां किसानों को ई-नाम सुविधा का प्रयोग करना और इससे लाभ उठाने के बारे में जानकारी दी जाएगी।''

सरकार ने साल 2016 में देश की प्रमुख मंडियों में ई-नाम सुविधा को शुरू किया था। अभी तक देश में कुल 470 मंडियों को ई-नाम से जोड़ा गया है। इस साल बजट में नए ई-नाम बाज़ार बनाने के लिए 200 करोड़ रुपए की राशि आवंटित करने फैसला किया गया है।

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रायबरेली जिले के हरचंदपुर गाँव के किसान संग्राम सिंह ( 63 वर्ष) ने इस बार पांच एकड़ में बौनी मंसूरी और मोटा चावल धान लगा कर गाँव के पास के ही व्यापारी को बेचा है। उनके गाँव में सरकारी खरीद केंद्र होने के बावजूद उन्होंने धान की फसल को वहां बेचने से अच्छा प्राइवेट व्यापारी को बेच देना ही सही माना जाता है। संग्राम बताते हैं कि गाँव में आज किसान सरकारी लफड़ों में पड़ने से बचते हैं। सरकारी खरीद वाले अनाज लेने में गन्दा धान, गीला धान जैसे कई बहाने बताते हैं। इससे परेशान होकर किसान 40 से 60 रुपए प्रति कुंतल सस्ते में अनाज बेचना ज्यादा सही मानते हैं।''

वो आगे बताते हैं वो चाहे कर्ज़माफी हो या फिर उपज खरीद जैसी सरकारी सुविधाएं किसानों को हर बार धोखा ही मिला है। इसलिए किसान अब कोई भी नई योजना बहुत सोच समझ कर ही चुनते हैं। ई-नाम सुविधा को अभी 90 पर्सेंट से ज़्यादा किसान नहीं जानते हैं, इसलिए इसलिए यह सुविधा भी किसानों के समझ में कम ही आएगी।

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