एमएसपी: दिल के खुश रखने को गालिब ये ख्याल अच्छा है...

एमएसपी: दिल के खुश रखने को गालिब ये ख्याल अच्छा है...फोटो: विनय गुप्ता

किसानों को लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का वादा केंद्र सरकार ने 2014 लोकसभा चुनाव के पहले किया था, मगर क्या एमएसपी मात्र मिल जाने से किसानों के अच्छे दिन आ जाएंगे?

फरवरी 2018 में जारी बजट के दौरान जब इसे जल्द लागू करने की बात वित्त मंत्री ने की तब सरकार की खूब वाहवाही हूई। मगर विशेषज्ञों ने त्वरित टिप्पणी में इसे जुमला करार दे दिया, कारण ये था कि सरकार ने ये स्पष्ट नहीं किया था कि लागत को जोड़ा कैसे जाएगा।

हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ में भी एमएसपी पर बात की और लागत मूल्य को लेकर सफाई दी। 25 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी ने अपने रेडियो कार्यक्रम में कहा, “फसलों की लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय करते समय किसान के श्रम सहित उसके द्वारा किए गए प्रत्येक खर्च को ध्यान में रखा जाएगा।“

प्रधानमंत्री ने आगे कहा, “अगर मैं विस्तार से बताऊं तो एमएसपी के लिए जो लागत जोड़ी जाएगी, उसमें दूसरे श्रमिकों का मेहनताना, अपने मवेशी, मशीन या किराए पर लिए गए मवेशी या मशीन का ख़र्च, बीज का मूल्य, उपयोग की गई हर तरह की खाद का मूल्य, सिंचाई का ख़र्च, राज्य सरकार को दिया गया भूमि राजस्व, लगाई गई पूंजी के ऊपर दिया गया ब्याज़ और अगर ज़मीन पट्टे पर ली है तो उसका किराया शामिल है। इतना ही नहीं, किसान जो खुद मेहनत करता है या उसके परिवार में से कोई कृषि-कार्य में श्रम योगदान करता है, उसका मूल्य भी उत्पादन लागत में जोड़ा जाएगा।”

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विशेषज्ञों ने कहा था कि किसानों को अगर सी2 लागत पर 50 फीसदी एमएसपी मिले तो ही उनके लिए फायदे की बात हो सकती है। ए2 लागत में 50 फीसदी मिलने पर उन्हें लागत का काफी कम मूल्य मिलेगा। ए2 लागत में किसानों के फसल उत्पादन में किए गए सभी तरह के नकदी खर्च शामिल होते हैं। इसमें बीज, खाद, केमिकल, मजदूर लागत, ईंधन लागत, सिंचाई आदि लागतें शामिल होती हैं।

ए2+एफएल लागत में नकदी लागत के साथ ही परिवार के सदस्यों की मेहनत की अनुमानित लागत को भी जोड़ा जाता है। वहीं, सी2 लागत में फसल उत्पादन में आई नकदी और गैर नकदी के साथ ही जमीन पर लगने वाले लीज रेंट और जमीन के अलावा दूसरी कृषि पूंजियों पर लगने वाला ब्याज भी शामिल होता है।

ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी ने एमएसपी के लिए जोड़ी जाने वाली लागत को लेकर स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की, लेकिन सवाल ये है कि एमएसपी इनता जरूरी क्यों है, क्या वास्तव में एमएसपी से किसानों को लाभ मिलता है, या मिल रहा है।

राजस्थान, श्रीगंगानगर के गजसिंहपुर के किसान मनदीप सिंह ‘गाँव कनेक्शन’ से फोन पर बातचीत में बताते हैं, “मैं मंडी में अपनी जौ बेचने गया था। मेरे पास कुल 198.5 कुंतल फसल थी। मैंने दो किस्मों की जौ को 1115 और 1112 की दर से 2,21,071 रुपए की बेची। जबकि न्यूनम समर्थन मूल्य 1140 प्रति कुंतल है। अगर मुझे न्यूनतम समर्थन मूल्य से बेचता तो मुझे 58,814 रुपए का घाटा न होता। मगर हमारे गांव में खरीद केंद्र में हमें इसका लाभ मिलता ही नहीं।”

इस बारे में कृषि नीतियों के जानकार देविंदर शर्मा कहते हैं “मुझे लगता है कि अब समय आ गया है जब हमें मूल्य नीति से आय नीति की ओर बढ़ना चाहिए। 2009-10 और 2011-12 के बीच गेहूं का एमएसपी 125 फीसदी अधिक था, जौ का 110 पर्सेंट ज्यादा था और चने का 105 फीसदी ज्यादा था। इसलिए अब सवाल उठता है कि जब सरकार कहती है कि वह किसानों को अधिक लाभ पहुंचा रही है तो इसमें खास बात क्या है।“

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आगे कहते हैं, “यही काम तो इससे पहले की यूपीए सरकार भी कर रही थी और उसके बारे में उसने कभी बड़े-बड़े दावे भी नहीं किए। मुझे पूरा भरोसा है कि अगर मैं किसानों से पूछूं तो वे खरीद मूल्य में बढ़ोतरी के सरकार के दावे को भी खारिज कर देंगे क्योंकि वह कहीं भी फसल की वास्तविक लागत के आसपास तक नहीं बैठता।”

मान लीजिये कि सरकार अपने वादे के अनुसार एमएसपी दे भी देती है तो क्या हो जाएगा? सरकार अभी की तय एमएसपी पर तो किसानों से फसल खरीद नहीं पा रही है। संतुलित और एकीकृत मूल्य संरचना तैयार करने के उद्देश्य से कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की स्थापना की गई थी। इसे 23 फसलों की मूल्य नीति (एमएसपी) पर सलाह देनी है, जिनमें सात अनाज वाली फसलें (धान, गेंहू, ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी और जौ) पांच दलहन फसलें (चना, अरहर, मूंग, उड़द और मसूर), सात तिलहन (मूंगफली, सूरजमुखी बीज, सोयाबीन, रेपसीड – सरसों, कुकुम, नाइजर, बीज और मसूर), गिरी (सूखा नारियल), कच्चा जूट और गन्ना है।

बिहार के गया जिले के किसान प्रेम नारायण सिंह फोन पर बताते हैं, “किसानों को सही समय पर एमएसपी नहीं मिलता, क्योंकि सरकार सही समय पर खरीदारी नहीं करती। किसानों को मजबूर होकर एमएसपी से कम कीमत पर अपनी उपज को बेचनी पड़ती है। ऐसे में ज्यादातर किसानों को एमएसपी का लाभ मिल ही नहीं पाता। तो सबसे पहले ये जरूरी है कि सरकार हर किसानों को एमएसपी का लाभ देना सुनिश्चित करे।”

आम किसान यूनियन, मध्य प्रदेश के केदार सिरोही कहते हैं, “यह भी याद रखा जाना चाहिए कि देश के केवल 6 फीसदी किसानों को ही उनकी फसल पर एमएसपी मिल पाता है। बाकी किसानों की फसल बिचौलियों, साहूकरों और दूसरे दलालों के पास जाती है। वित्त मंत्री ने यह भी साफ नहीं किया है कि 94 फीसदी किसानों को एमएसपी दिलवाने के लिए क्या इंतजाम किए जाएंगे। उनकी खरीद को सरकारी खरीद केंद्रों में पहुंचाना कैसे सुनिश्चित होगा, यह सबसे बड़ा सवाल है।”

मध्य प्रदेश में इस साल पिछले साल के 32.52 लाख हेक्टेयर के मुकाबले चने का रकबा 35.9 लाख हेक्टेयर है। खबरों के मुताबिक, चने की कीमतें 3600 रुपए प्रति कुंतल के आसपास चल रही हैं, जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य 4400 रुपए प्रति कुंतल है। मध्य प्रदेश में एमएसपी से नीचे बाजार भाव होने की सूरत में सरकार ने किसानों को भाव का अंतर यानी भावांतर की भरपाई करने का वादा किया है।

फसल वर्ष 2017-18 में उत्पादित रबी फसलों के लिए सरकार ने जो एमएसपी तय की है, उसके अनुसार चना का एमएसपी 4400 रुपए प्रति कुंतल है, जिसमें 150 रुपए बोनस भी शामिल है। मतलब तय एमएसपी के हिसाब से किसानों को प्रति कुंतल 8 रुपए का नुकसान हो रहा है। मध्य प्रदेश सरकार ने अब चना को भावांतर योजना से बाहर करा दिया है।

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रीवा, मध्य प्रदेश के किसान बजरंगी सिंह कहते हैं, “हमें तो एमएसपी के बारे में पता भी नहीं चलता। मंडी में मैंने तो 3700 रुपए प्रति कुंतल में चना बेच दिया। बाद में पता चला कि ये तो सरकार की तय कीमत से कम है, लेकिन मंडी में तो इसी तरह खरीद हो रही है।”

यवतमाल, महाराष्ट्र के पांढरकाडा के किसान अरुण कुलकर्णी बताते हैं, “हमारे पास 40 कुंतल अरहर पड़ी है। इसे बेचने के लिए एक महीने पहले नाफेड में ऑनलाइन निवेदन किया था, पर नाफेड खरीदी ही नहीं कर रही है। ऐसे में 40 रुपये से भी कम कीमत पर व्यापारियों को दाल बेच रहे हैं, अब अगले साल अरहर की खेती करने का मन नहीं है।“

अखिल भारतीय किसान महासंघ के राष्ट्रीय समन्वयक डॉ. राजाराम त्रिपाठी कहते हैं, “केंद्र सरकार ने किसानों से खरीद के लिए अरहर का समर्थन मूल्य 54.50 रुपए किलो और चना का 44 रुपए तय कर रखा है, लेकिन खुले बाजार में व्यापारी किसानों से अरहर 40 रुपए और चना 30 रुपए में खरीद रहे हैं, जो न्यूनतम कीमत से काफी नीचे हैं। किसान अरहर और चना कम कीमत में बेचने के लिए मजबूर हैं, क्योंकि अगली फसल के लिए उसे पैसा चाहिए और दूसरी बात कि अनाज रखने के लिए उसके पास जगह नहीं हैं।”

पिछले दिनों नई दिल्ली में आयोजित मक्का सम्मेलन में केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा था, “कुछ फसलों पर कृषि लागत का डेढ़ गुना मूल्य दिया जा रहा है, लेकिन कुछ फसलों को यह मूल्य नहीं मिल रहा है। फसलों का मूल्य न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे आता है तो व्यापक पैमाने पर सरकारी स्तर पर उसकी खरीद की जाएगी। इससे राजकोष पर बोझ बढ़ेगा, लेकिन लोगों को यह समझना चाहिए कि इस पर पहला अधिकार किसानों और मजदूरों का है।”

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