भिंडी की फसल पर किसान ने चलाया ट्रैक्टर, कहा- मंडी भाव 3-7 रुपए किलो, किसान की लागत 10 रुपए, फसल रखकर क्या करेंगे

"लॉकडाउन है बोलकर किसानों का थोक में भाव गिराया जा रहा है। लॉकडाउन है माल कम आ रहा है ये बोलकर शहरों में महंगी सब्जियां बेची जा रही है।" एक किसान ने इन दो लाइनों में सब्जी का रेट बताया। शहर में फल-सब्जियां भले महंगे दामों पर बिक रहे हैं लेकिन पहले कोरोना लॉकडाउन फिर, बेमौसम बारिश से किसानों भारी नुकसान हो रहा है।

Arvind ShuklaArvind Shukla   19 Jun 2021 2:02 PM GMT

हरियाणा में करनाल जिले के बल्ला गांव के किसान संदीप सिंगरोहा ने शनिवार की सुबह अपनी 2 एकड़ की तैयार लहलहाती भिंड़ी की फसल पर ट्रैक्टर चला दिया, हालांकि उनके इस तरह खड़ी फसल जोत देने से उनके गांव के किसानों को कोई हैरानी नहीं हुई क्योंकि हरियाणा में कोरोनाकाल में कई किसानों ने अपनी फसलों पर ट्रैक्टर चलाया है।

"ट्रैक्टर नहीं चलाता तो और क्या करता भाई जी। पानीपत, असंध और करनाल की मंडियों में भिंडी 3-7 रुपए किलो में बिक रही है जबकि तोड़ने और मंडी ले जाने का खर्च ही 10-12 रुपए किलो का आ रहा है। फसल खत्म कर दी है, कोई दूसरी फसल सोचेंगे।" संदीप सिंगरोहा, मायूसी के साथ फोन पर बताते हैं। लेकिन इसके बाद वो गुस्से में भर जाते हैं और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हैं।

"लॉकडाउन में माल ठीक से बाहर नहीं जा पाया। अब लॉकडाउन खुला तो भी कोई असर नहीं है। इस कोरोना, लॉकडाउन का निचले तबको पर बहुत असर पड़ा है। रोज कमाने-खाने वाला इतने इस रेट में भी सब्जी पर खर्च नहीं कर पा रहा है।"

संदीप, दिल्ली से करीब 150 किलोमीटर दूर करनाल जिले के बल्ला गांव में रहते हैं। अप्रैल महीने में उन्होंने 2 एकड़ भिंडी बोई थी, जिसमें नवंबर तक तोड़ाई होनी थी, लेकिन 19 जून को उन्होंने पूरी फसल पर ट्रैक्टर चला दिया। संदीप के मुताबिक उनके पास एक एकड़ में करीब मिर्च भी है, उसका भी भाव नहीं है। भिंडी को दिल्ली की मंडी भी ले गए थे। साथ ही गांवों में लोगों को भी खिलाया लेकिन आखिर में उन्होंने जोतना पड़ा। उनके गांव के कुछ खरबूजा-खीरा, टमाटर किसानों को भी अपने खेत में ट्रैक्टर चलाना पड़ा।

बल्ला गांव के किसान विनोद मान (33 वर्ष) के पास 3 एकड़ खीरा और साढ़े पांच एकड़ में खरबूजा था। मई से लेकर जून तक कई बार हुई बारिश में खरबूजा खेत में ही खराब हो गया जबकि आधे खीरे पर ट्रैक्टर चला दिया है। करनाल जिले में ही मोर माजरा गांव के किसान संदीप कुमार (33 वर्ष) के पास 2 एकड़ जमीन है, और 8 एकड़ जमीन किराए (50 हजार रुपए एकड़) पर लेकर उन्होंने 6 एकड़ में खीरा और 4 एकड़ में खरबूजा बोया था जिसमें करीब 2 लाख की लागत आई थी।

संदीप बताते हैं, पहले लॉकडाउन था, तो उम्मीद रही कि लॉकडाउन खुलेगा तो शायद रेट मिले और कुछ पैसा मिल जाए लेकिन लॉकडाउन खुलते-खुलते पूरी फसल पककर नष्ट हो गई। कुछ हाथ नहीं आया।"

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किसान विनोद मान के खरबूजे का खेत।

हरियाणा में करनाल पहला जिला नहीं है जहां किसानों ने अपनी सब्जियां और फससें जोती हैं या भारी नुकसान उठाया है। 10 मई को भिवानी जिले में निघाना कलां गांव के राजेश सिंह ने अपना कई ट्राली टमाटर खेत में फेंक दिया और खड़ी फसल रौंद डाली थी। इससे पहले उनके गांव के कई टमाटर और शिमला मिर्च के किसानों ने रेट न मिलने अपने फसलें खुद से खराब कर डाली थीं।

ये लगातार दूसरा साल है जब सब्जी उत्पादक किसानों को कोरोना और लॉकडाउन के चलते घाटा हुआ है। शहरों और कस्बों में उपभोक्ता को सब्जियां महंगे रेट पर मिली हैं लेकिन किसानों को रेट नहीं मिला। हरियाणा में साल 2018 में सरकार ने भावांतर भारपाई योजना की शुरुआत की थी। जिसमें 22 फसलों का मार्केट रेट कम होने पर किसानों को हो रहे घाटे का भुगतान सरकार द्वारा किये जाने का प्रावधान है। संदीप सिंगरोहा कहते हैं, "मैंने भावांतर के लिए अप्रैल में ही भिड़ी का 10 रुपए का रेट लिखवाया था लेकिन मार्केट में मिल रहा है 4-5 रुपए। मैंने कई बार अधिकारियों को फोन किया, एक बार वो आने को बोले लेकिन कोई आया नहीं। न कोई पैसा मिला।" गांव कनेक्शन ने संबंधित उद्यानिकी विभाग में वेबसाइट पर दिए नंबर पर कॉल किया लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। संबंधित अधिकारियों से बात होते ही उनका जवाब खबर में अपडेट किया जाएगा

र्फ हरियाणा ही नहीं उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश महाराष्ट्र में हरी सब्जियों के किसानों को कोरोना लॉकडाउन और बेमौसम की भारी बारिश ने परेशान किया है।

महाराष्ट्र में 20 हजार से ज्यादा सब्जी किसानों के संगठन 'वेजिटेबल ग्रोवर एसोशिएन' के अध्यक्ष श्रीराम गढवे पुणे से गांव कनेक्शन को बताते हैं, "अनलॉक का सब्जी किसानों पर कोई असर नहीं पड़ा। क्योंकि सब्जी का कारोबार जारी थी। समस्या ये है कि सब्जी का उत्पादन इस साल ज्यादा हुआ है और मांग उतनी नहीं है। दूसरी बात ये है कि किसान के खेत का उत्पादन करीब 60 फीसदी तक गिर गया है। इसलिए किसान को बहुत घाटा हो रहा है।"

गढ़वे अपने जिले पुणे में अपने एसोसिशएन के सहयोग से संचालित एक कॉपरेटिव मंडी का गणित बताते हैं।

"पुणे की नारायण गांव कॉपरेटिव मंडी में रोजाना करीब आसपास के करीब 150 गांवों से एक लाख कैरेट (प्रति कैरेट 20 किलो- करीब 1600 मीट्रिक टन) टमाटर आता है। किसान को रेट मिल रहा है 7-8 रुपए किलो का, जबकि टमाटर उगाने का खर्च ही इससे ज्यादा रुपए का होगा। जिसमें किसान की मजदूरी नहीं जुड़ी है।"

मार्केट में रेट कम होने के पीछे श्रीराम गढ़वे मौसम फैक्टर को अहम बताते हैं। "पिछले साल बारिश अच्छी हुई थी तो वाटर लेबल ऊपर आ गया, जब पानी होता है तो किसान ज्यादा फसल उगाते हैं। इस बार भी ठीक बारिश रही है। लेकिन समस्या ये कि हवामान में बड़ा परिवर्तन (जलवायु परिवर्तन) हो रहा है। इस बार फसलों में रोग बहुत लग रहे हैं। जिससे किसान की लागत बढ़ गई और उत्पादन कम हो गया है।"

श्रीराम गढ़वे के मुताबिक टमाटर में इस बार प्लास्टिक रोग (टमाटर प्लास्टिक जैसा कड़क) लग रहा है। दूसरा खीरे की पत्तियां बहुत जल्दी-जल्दी टेढ़ी हो रही हैं साथ ही फल आने पर तुरंत वो मर जा रहा है।

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने 10 मई के बयान के अनुसार बागवानी में किए जा रहे सरकारी हस्तक्षेप और योजनाओं के चलते बागवानी का रकबा और उत्पादन तेजी से बढ़ा है। मंत्रालय के मुताबिक वर्ष 2019-20 के दौरान देश में 25.66 मिलियन हेक्टेयर भूमि पर बागवानी क्षेत्र का अब तक का सर्वाधिक 320.77 मिलियन टन उत्पादन हुआ था, जो वर्ष 2020-21 के पहले अग्रिम अनुमान के अनुसार देश में 27.17 लाख हेक्टेयर भूमि पर बागवानी क्षेत्र का कुल उत्पादन 326.58 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है।

सब्जियों के साथ-साथ फल किसानों का भी भारी नुकसान हुआ है। गांव कनेक्शन ने उत्तर प्रदेश से लेकर मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र तक के किसानों की खबरों को प्रमुखता से दिखाया कि कैसे उनकी तरबूज और खीरे की फसल माटी मोल हुई है तो महाराष्ट्र आम के किसानों को नुकसान हुआ है।

यहां तक की पिछले साल जो अदरक 50 से 20 रुपए किलो थोक में बिक रही थी, वो अदरक इस बार किसान जून महीने में 5-7 रुपए किलो (खेत से थोक में) बेचने के मजबूर हुए हैं।

महाराष्ट्र में ही उस्मानाबाद की उमरगा तालुका के बेलम गांव में राजेंद्र कारभारी (40वर्ष) ने अपने 7 साथियों के साथ मिलकर 4000 पेड़ (पेरु) के लगाए थे। उन्होंने ये पेड़ दो साल पहले पश्चिम बंगाल से मंगाए थे, जिनकी कुल लागत 4.5 लाख आई थी। इस बार बाग में फल आए थे लेकिन इसी दौरान कोरोना लॉकडाउन लग गया और ज्यादातर फल पककर बाग में ही गिर गए।

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मराठवाड़ा में उस्मानाबाद जिले के किसान राजेंद्र कारभारी की अमरुद की बाग। फोटो- अशोक पवार

राजेंद्र कारभारी के परिचित किसान अशोक पवार फोन पर बताते हैं, "करीब 70 क्विंटल फल थे। अगर बिकते तो 5 लाख रुपए आ जाते। लेकिन फसल बाग में रह गई ज्यादातर फल पककर टपक गए।। बाहर भेजने का मौका ही नहीं मिला। ये अच्छा हुआ कि महाराष्ट्र की पंजाब राव देशमुख फलबाग योजना के तहत इन किसानों को पहले साल करीब 3 लाख रुपए की सहायता मिल गई थी वर्ना ये इतना घाटा नहीं उठा पते।"

महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में सब्जी का हाल पूछने पर अशोक कहते हैं, "लॉकडाउन तो खुला है लेकिन कई बड़े शहरों में केस बढ़े हैं। ये टाइम सब्जियों के महंगी होने का है क्योंकि बारिश होने पर कुछ सब्जियां खराब हो जाती है, मार्केट कम पहुंच पाती है तो बची सब्जियों का रेट अच्छा मिलता है। लेकिन इस बार अलग ही सीन चल रहा है। लॉकडाउन है बोलकर किसानों का भाव गिराया गया और लॉकडउन में मॉल कम मिल रहा है ये बोलकर शहरों में सब्जियां अच्छे रेट पर बेची जा रही हैं।"

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