महिला दिवस विशेष: डेयरी के माध्यम से 25 सौ से भी अधिक महिलाओं को मिला घर बैठे रोजगार 

Divendra SinghDivendra Singh   8 March 2018 11:21 AM GMT

महिला दिवस विशेष: डेयरी के माध्यम से 25 सौ से भी अधिक महिलाओं को मिला घर बैठे रोजगार महिलाओं को मिल रहा रोज़गार

डेयरी के कारोबार को पुरुषों का काम कहा जाता है, लेकिन प्रतापगढ़ ज़िले की दो हज़ार से भी अधिक महिलाएं इस धारणा को बदलने में लगी हैं। डेयरी के कारोबार से उनकी आर्थिक स्थिति में भी सुधार हो रहा है।

संस्था का दावा है कि यह प्रदेश की पहली महिला फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी है। प्रतापगढ़ जिला मुख्यालय से 35 किमी दूर उत्तर-पूर्व दिशा में पट्टी ब्लॉक के 39 ग्राम पंचायतों में तरुण चेतना और टाटा ट्रस्ट ने मिलकर श्वेत धारा मिल्क प्रोड्यूसर कंपनी की शुरूआत की है। इस मिल्क प्रोड्यूसर कंपनी से पट्टी ब्लॉक महिलाएं जुड़ी हैं।

ये भी पढ़ें- विश्व महिला दिवस विशेष : गोरेपन के पीछे क्यों बौराए हैं हम भारतीय ? 

इन 39 ग्राम पंचायतों में कलेक्शन सेंटर बनाए गए हैं, जहां पर महिलाएं दूध का कलेक्शन करती हैं। बहुता ग्राम पंचायत की शमा खातून (35 वर्ष) के घर पर भी कलेक्शन सेंटर बनाया गया है। शमा बताती हैं, “सुबह-शाम मेरे ग्राम पंचायत की महिलाएं यहां पर दूध लेकर आ जाती हैं, जिसकी जांच करके हम उसे एकत्र कर लेते हैं।”

ये भी पढ़ें- महिला दिवस विशेष : वे महिलाएं, जो मुख्यमंत्री बनीं और राज्य की बागडोर संभाली

दिसम्बर 2017 तक दो हज़ार सात सौ बीस महिलाएं इस कंपनी की सदस्य बन चुकी हैं, कोई भी महिला इस कंपनी की सदस्य बनने के बाद ही अपने क्षेत्र में स्थापित दुध कलेक्शन सेंटर पर दूध दे सकती है। इस क्षेत्र में 12 हजार पांच सौ लीटर दूध प्रतिदिन कलेक्शन किया जाता है। इस समय कंपनी अपने सदस्यों को 35 से 45 रुपए प्रति लीटर दूध का मूल्य दे रही है, जो दूसरी कंपनियों और बाजार मूल्य से काफी अधिक है, जिसका फायदा सीधा महिलाओं को हो रहा है।

उन्होंने बताया कि समिति के सभी पदों पर महिला सदस्य ही हैं। सभी महिलाएं उत्पादित दूध को एक साथ इकट्ठा करके कलेक्शन सेंटर पर दे देती हैं। इससे उन्हें दूध का अच्छा दाम पाने के लिए मशक्कत भी नहीं करनी पड़ती। इस बारे में तरुण चेतना के निदेशक नसीम अंसारी कहते हैं, “हम लोग महिलाओं के लिए कुछ काम करना चाहते थे। इसी सोच के साथ हमने यह काम किया। यही कारण है कि समिति के हर पद पर महिला को ही तैनात किया गया है। इसमें सिर्फ महिलाओं को जोड़ा गया है।

ये भी पढ़ें- पाबीबैग के जरिए एक आदिवासी महिला ने दो साल में बना डाली 24 लाख रुपए टर्नओवर वाली कंपनी 

हर महिला पशुपालक को दूध का रुपया दस दिन बाद उनके बैंक खाते में भेज दिया जाता है।” तरुण चेतना के क्वार्डिनेटर मोहम्मद नसीम कहते हैं, ‘‘पालतू पशुओं का काम महिलाएं ही करती हैं, पर उनको कोई लाभ नहीं मिल पाता था। इस योजना से महिलाओं के बैंक खाते में सीधा रुपया भेजा जाता है।”

ये भी पढ़ें- भारतीय रेल: अब महिला यात्री अकेले कर रही हैं सफर तो मिलेगी बर्थ, कोटा हुआ निर्धारित

श्वेत धारा मिल्क प्रोड्यूसर कंपनी शुरू करने में टाटा ट्रस्ट ने आर्थिक सहायता की है और नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड ने इसमें तकनीकी सहायता की है। वहीं, समिति से जुड़कर अपने परिवार का विकास कर रहीं धौरहरा गाँव की रीना देवी (40 वर्ष) बताती हैं, “मेरे पास दो भैंसें हैं। पहले मैं गाँव में ही दूध बेचती थीं। मगर उसका मुझे सही दाम नहीं मिलता था। हालांकि, अब मुझे 42 रुपए प्रति लीटर की दर से भुगतान मिलता है। पहले मैं 35 रुपए में एक लीटर दूध बेचा करती थी।”

ऐसे होता है काम

महिलाएं 39 केंद्रों पर दूध एकत्र करती हैं। वहां से कंपनी सारा दूध नारंगपुर में बने केंद्र पर भेजता है। इसके बाद दूध मदर डेयरी में भेज दिया जाता है। प्रतिदिन 12 हजार पांच सौ लीटर के करीब के दूध का कारोबार किया जाता है। हर सदस्य को दस दिन का पैसा तीन, तेरह व 23 तारीख को महिलाओं के बैंक खाते में सीधे ट्रांसफर कर दिया जाता है।

ये भी देखिए:

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top