पाबीबैग के जरिए एक आदिवासी महिला ने दो साल में बना डाली 24 लाख रुपए टर्नओवर वाली कंपनी 

पाबीबैग के जरिए एक आदिवासी महिला ने  दो साल में बना डाली 24 लाख रुपए टर्नओवर वाली कंपनी  चौथी पास पाबिबेन ने महिला कारीगरों को उनकी कला की पहचान दिलाई

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2018 पर हम आपको मिलवाते हैं एक ऐसी महिला कारीगर से, जिसने अपनी विलुप्त हो रही पारंपरिक कला को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक खास पहचान दिलाई है। चौथी पढ़ी गुजरात की पाबिबेन लक्ष्मण रबारी महिला कारीगरों को उनकी पहचान दिलाकर 60 महिलाओं के साथ मिलकर ‘हरी-जरी’ नाम की कढ़ाई से 20 प्रकार से ज्यादा डिजायनों के बैग बनाती हैं। पाबीबेन अपने समुदाय की पहली महिला हैं जिन्होंने कोई कारोबार खड़ा किया है। दो वर्षों में ही इस कारोबार का टर्नओवर 20 लाख रुपए से ज्यादा हो गया है।

पाबिबेन को अपनी पारंपरिक ‘हरी-जरी’ नाम की कढ़ाई करने में महारत हासिल थी। गुजरात की कई संस्थाएं उनसे ये कढ़ाई कराती, बदले में उन्हें मजदूरी दे देतीं। पाबिबेन को एक बात हमेशा परेशान करती थी कि एक कारीगर के तौर पर उन्हें उनकी कला की पहचान नहीं मिल रही थी।

एक कारीगर को उसकी कला की पहचान मिल सके, यह हक दिलाने के लिए पाबिबेन ने लगभग ढाई साल पहले अपने काम की शुरुआत की थी।

पाबिबेन प्रदर्शनी लगाकर सीधे ग्राहकों से जुड़ती हैं।

पहला बैग इन्होंने अपनी शादी में बनाया था, अचानक इनकी शादी देखने आए कुछ विदेशी पर्यटकों को यह उन्होंंने भेंट किए। जिसे उन्होंने पाबीबैग के नाम से प्रसिद्ध कर दिया। इससे इन्हें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी कला को पहचान दिलाने में मदद मिली। इनके बनाए बैग की मांग जर्मनी, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, लंदन कई देशों में है। फिल्म ‘लक बाय चांस’ में भी इनके बनाए बैग का प्रयोग किया गया। सरकार ने पबिबेन को ग्रामीण उद्यमी बनकर औरों को मदद करने की वजह से इन्हें वर्ष 2016 में ‘जानकी देवी बजाज पुरस्कार से सम्मानित किया।

पाबिबेन ने अपने प्रोडक्ट के प्रचार व प्रसार के लिए देश में जहां अलग-अलग शहरों में प्रदर्शनी लगायी वहीं उन्होंने आधुनिक प्रचार माध्यमों का भी सहारा लिया। पाबिबेन विदेशों में ‘पाबिबेन डॉट कॉम’ नाम की वेबसाइट के जरिए अपने उत्पाद बेच रही हैं, जहां इसकी भारी मांग है। आदिवासी डेबरिया रबारी समुदाय में जन्मी पाबिबेन अपने समुदाय के लिए उदाहरण बनी, जो महिलाएं इस कला में पारंगत थी उन्हें चूल्हे-चौके तक ही सीमित नहीं रखा। इन्होंने ऐसी 60 महिलाओं को रोजगार देकर इतना सक्षम बना दिया, जिससे वह अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें।

चूल्हे-चौके तक सीमित रहने वाली महिलाओं को पाबिबेन ने बनाया आत्मनिर्भर

गुजरात के कच्छ जिला मुख्यालय से 33 किलोमीटर दूर भदरोई गांव में रहने वाली पाबिबेन लक्ष्मण रबारी (33 वर्ष) अपने काम का अनुभव साझा करते हुए गांव कनेक्शन संवाददाता को फोन पर बताती हैं, “बचपन से ही ये कढ़ाई वाला काम सबको करते देखा था। हमें हमारे काम का पैसा तो मिलता था पर कभी हमारा नाम नहीं आता था। महीने भर जब काम करते तब कहीं तीन हजार रुपए मिलते थे। हमें हमारी कला की पहचान मिल सके इसलिए मैंने इस काम की शुरुआत की थी।”

वो आगे बताती हैं, “इतना बड़ा कारोबार खड़ा हो जाएगा इसका मुझे भी अंदाजा नहीं था, पर सभी बहनों के सहयोग से यह काम आसानी से आगे बढ़ने लगा। पाबीबैग इतना मशहूर हुआ कि पहली ही बार में मुझे 70 हजार रुपए का ऑर्डर मिला। इससे मुझे खुशी मिली और मेरा आत्मविश्वास बढ़ा, इसके बाद फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।”

पाबी बैग ग्राहकों की हैं पहली पसंद।

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बिजनेस को पहुंचाने में इस युवा ने किया सहयोग

गांधियन फेलोशिप पीएचडी स्कॉलर स्टूडेंट नीलेश प्रियदर्शी पाबिबेन को पिछले दस वर्षों से जानते थे। नीलेश प्रियदर्शी बताते हैं, “पाबिबेन ने जब मुझसे अपना आइडिया साझा किया तो मुझे खुशी हुई कि ग्रामीण स्तर पर कोई महिला इतना अच्छा सोच पा रही है। पाबिबेन सिर्फ इतना चाहती थी कि जो महिलाएं काम करती हैं उन्हें उनके काम की पहचान मिले। हमने मिलकर ही ‘पाबिबेन डॉट कॉम’ वेबसाइट का नाम रखा।”

वो आगे बताते हैं, “अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में पाबिबेन का सीधेतौर पर परिचय कराया। ये खुद देश के अलग-अलग शहरों में प्रदर्शनी लगाती हैं, शहर के जो बड़े-बड़े शॉप हैं इन्हें एक कॉर्नर मिला है जहां ये अपना स्टॉल लगा सकती हैं। इस वेबसाइट के जरिए इन्हें विदेशों से आर्डर आते हैं। पाबिबेन अपना ज्यादातर काम खुद करती हैं और बाहर के ऑर्डर भी लेती हैं।”

नीलेश प्रियदर्शी पाबिबेन में गांधियन रोल बिजनेस माडल विकसित कर रहे हैं। गांधियन कांसेप्ट का ये उद्देश्य है कि कैसे ग्रामीण स्तर पर लोगों को उद्यमी बनाया जा सके। पाबिबेन इसका एक उदाहरण है।

पाबिबेन को सम्मानित करते कलराज मिश्र व अन्य

पाबिबेन का बचपन दूसरों का पानी भरने में गुजरा

पाबिबेन का बचपन गरीबी की वजह से मुश्किलों भरा गुजरा है। जब पाबिबेन पांच साल की थी तभी इनके पिता का देहांत हो गया। उस समय इनकी छोटी बहन तीन साल की थी और माँ गर्भवती थी। पाबिबेन ने बताया, “मैंने बचपन से ही माँ को मजदूरी करते देखा था, हम तीनों बहनों का खर्च बड़ी मुश्किल से वो पूरा कर पाती थी। चौथी की पढ़ाई के बाद मैं भी माँ के साथ मजदूरी करने लगी, कभी दूसरों के घर पर पानी भरती तो कभी लिपाई करती।”

पाबिबेन ने जब चौथी तक पढ़ाई की थी तब इनके पास पैरों में पहनने के लिए न तो चप्पलें हुआ करती थी और न ही यूनीफ़ॉर्म। पाबिबेन बताती हैं, “उस समय गरीबी का दौर ऐसा था कि हम कई-कई दिनों नहाते नहीं थे सिर्फ दूसरों के यहां पानी भरते रहते थे, क्योंकि हमारे यहां पानी की बहुत समस्या थी। हमारे समाज के पुरुष भेड़-बकरियां चराते और महिलाएं घर पर कढ़ाई करती या फिर दूसरों के घरों में पानी भरती।”

प्रधानमंत्री को अपना बैग भेट करते हुए पाबिबेन।

इनके समुदाय की थी एक खास परम्परा

आदिवासी डेबरिया रबारी समुदाय में एक प्रथा थी कि लड़कियों को शादी के समय दहेज में पैसों की बजाए अपने हाथों से सिलाई-कढ़ाई किए कपड़े ससुराल ले जाने होते थे। इन्हें एक कपड़ा बनाने में महीनें दो महीने का समय लगता था। जिसकी वजह से लड़की को माँ-बाप के घर दहेज़ की तैयारी करने के लिए बहुत दिनों तक रहना पड़ता था, इसलिए बुजुर्गों ने इस ढेबरिया रबारी इंब्रायडरी को वर्ष 1995 में समाप्त करने का फैसला ले लिया। पाबिबेन ने न सिर्फ इस कला को बचाया बल्कि अपने समुदाय की महिलाओं को आत्मनिर्भर भी बनाया।

रबारी जाति भारत के गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, मध्यप्रदेश, नेपाल और पाकिस्तान में रहती हैं, जहां इन्हें अलग-अलग उप जातियों के नाम से जाना जाता है। पशुपालन ही इनका मुख्य व्यवसाय है। भारत में लगभग चार करोड़ से ज्यादा इस समुदाय की जनसंख्या है।

पाबिबेन अब लोगों से बात करने में झिझकती नहीं हैं।

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