आज भी बेहाल है चंपारण सत्याग्रह के महानायक राजकुमार शुक्ल का गाँव

आज भी बेहाल है चंपारण सत्याग्रह के महानायक राजकुमार शुक्ल का गाँवभितिरवा में जारी निर्माण कार्य।

चंपारण सत्याग्रह के महानायक राजकुमार शुक्ल का गांव सतवरिया पश्चिमी चंपारण में आता है। स्वाभाविक तौर पर यह गांव बीते एक सालों से खासा चर्चा में रहा और चंपारण शताब्दी पर देश के तमाम हिस्सों से लोग यहां पहुंचे भी। राजकुमार शुक्ल ही निलहों से मुक्ति के लिए गांधी जी को काफी प्रयासों के बाद चंपारण लाये थे। उन्होंने चंपारण की व्यथा से उस दौर के तमाम राष्ट्रीय नेताओं को अवगत कराने में काफी समय लगाया था। लेकिन चंपारण शताब्दी पर भी शुक्लजी के गांव की किस्मत नहीं बदल पायी है।

सतवरिया जाने वाली मुख्य सड़क बदहाल हालत में है।

वैसे तो मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने चंपारण इलाके को लेकर काफी कुछ दावा किया है लेकिन करीब चार हजार की आबादी वाला शुक्लजी का यह गांव बुनियादी सुविधाओं से भी मोहताज है। सतवरिया गांव में काफी गरीबी और अशिक्षा है और 75 फीसदी से अधिक आबादी गरीबी रेखा के नीचे गुजर बसर कर रही है। कई अफसरों ने यहां दौरा किया और स्वर्गीय राजकुमार शुक्ला के नाती मणिभूषण राय से मिल कर तमाम योजनाओं का खाका तैयार किया लेकिन वे कागजों से बाहर नहीं निकल पायी हैं।

किसान कर्ज की दलदल में फंसे हैं

चंपारण के दूसरे गावों की तरह सतवरिया में अधिकतर लोग खेती बाड़ी पर जिंदा हैं। गन्ना यहां के किसानों की जीवनरेखा है। लेकिन यहां के किसानों को देश में गन्ने का सबसे कम दाम मिलता है। यहां के किसान सारी फसलें न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे बेचने को विवश हैं और यह इलाका कृषि संकट की ओर बढ़ रहा है। खेती बाड़ी पर ही निर्भर स्व.राजकुमार शुक्ला के नाती मणिभूषण राय बताते हैं,“ यहां के किसान भयानक कर्ज की दलदल में फंसे हैं और राज्य सरकार इस तरफ न ध्यान दे रही है न ही खेती को खास प्रोत्साहन है।

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किसानों की स्थिति में नहीं हो रहा सुधार।

सड़क से लेकर पानी और बिजली की ठीक व्यवस्था नहीं है।” बिहार में दलित और महादलित की राजनीति कुछ अधिक चली है। और सामाजिक न्याय का नारा भी काफी बुलंद हुआ है। लेकिन सतवरिया में दलित परिवारों की दयनीय दशा किसी से छिपती नहीं है। 10 गुणे 10 के कमरों में दस सदस्यों तक के परिवार रहते हैं। यहां लगे बिजली के तार इतने जर्जर हैं कि वो गिर रहे हैं और जानवर मर रहे हैं। यहां की दलित बस्ती में न तो सामुदायिक शौचालय है न रहने लायक हालात। हैंडपंप में खराब पानी आता है लिहाजा औरतों को लंबी दूरी से पीने के लिए साफ पानी लाना पड़ता है। सतवरिया की दलित महिला कांति देवी बताती हैं कि बारिश के दिनों में उनके घरों में पानी भर जाता है। दलितों के पास खेती बाड़ी की जमीनें नहीं है और वे कृषि मजदूर है। जहां पर खेती बाड़ी ही डगमगा रही है वहां कृषि मजदूरों की दशा कैसे ठीक रह सकती है?

मिल बंद हो गयी और किसानों की हालत और खराब हो गयी

सतवरिया गांव में शिक्षा की दशा भी अच्छी नहीं है। यहां लड़कियों के लिए एक से सातवीं तक एक स्कूल है, जिसको 1972 में दान की जमीन पर बनाया गया था। आज यह गिरासू हालत में है और बालिकाएं जिंदगी और मौत से जूझ कर पढ़ाई करती हैं। गुहार लगाने के बाद भी प्रशासन ने इसकी मरम्मत नहीं करायी। राजकुमार शुक्ल के परिवार की ओर से उनकी याद में एक डिग्री कालेज खोला गया था जो स्थानीय राजनीति की चपेट में उलझ कर तबाह हो गया। उनके परिजनों ने राजकुमार शुक्ल स्मारक न्यास बनाया है लेकिन परिवार की कमजोर माली हालत के नाते यह न्यास कुछ खास करने की स्थिति नहीं बनी। यह जरूर है कि राजकुमार शुक्ल की 1917 की लिखी ऐतिहासिक डायरी को परिवार ने जरूर सहेज कर रखा है, जिसमें बहुत से अनछुए तथ्य कैथी में लिखे हैं।

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बंद पड़ी नरकटियागंज की चीनी मिल।

लेकिन जो चंपारण भारत में किसान क्रांति और जागरण का प्रतीक बन गया था औज 100 साल बाद फिर से चिंताजनक मोड़ पर खड़ा है। सतवरिया गांव के मुखिया राज किशोर सिंह कहते हैं कि राजकुमार शुक्ल धीरे धीरे वे भुलाए जाते रहे। पहले सतवरिया के पड़ोस की चनपट्टिया चीनी मील चालू थी तो किसानों की स्थिति थोड़ी बेहतर थी। लेकिन मिल बंद हो गयी और किसानों की हालत और खराब हो गयी। चीनी मिल के पास काफी जमीनें हैं, जिनको राजनीतिक लोगों ने हथिया लिया है।

अगर राजकुमार शुक्ल जैसे चंपारण के महानायक के गांव की यह हालत है तो बाकी हिस्सों की तस्वीर का सहज आकलन किया जा सकता है। राजकुमार शुक्ल 23 अगस्त, 1875 को सतवरिया गांव में ही पैदा हुए थे। 20 मई, 1929 को लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हुआ तो उनकी अंतिम यात्रा में डा. राजेंद्र प्रसाद से लेकर तमाम दिग्गज मौजूद थे। आजादी के बाद भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया, लेकिन बिहार सरकार ने चंपारण में उनकी यादों को सहेजने का कोई काम नहीं किया।

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चंपारण स्थित वृंदावन आश्रम।

एटनबरो की ऐतिहासिक फिल्म गांधी में राजकुमार शुक्ल का खास चित्रण है। वे अपने दौर के एक संपन्न किसान थे। लेकिन अंग्रेजों ने उनकी जमीन जब्त कर ली और मुरली भरहवा के मकान को ध्वस्त कर उनको जेल भेज दिया। निलहों के अत्याचारों ने उनको बागी बना दिया और नील के धब्बों को सदा के लिए समाप्त करने का संकल्प लेकर शुक्लजी देश के कई हिस्सों में भटकते रहे। गांधीजी के आने के बाद चंपारण सत्याग्रह सफल रहा और निलहों को भागना पड़ा। लेकिन इस सत्याग्रह के बाद भी शुक्लजी ने किसान जागरण जारी रखा और रोलेट एक्ट और असहयोग आंदोलन में वे सक्रिय रहे। अपनी मौत के पहले शुक्लजी करीब एक पखवारा साबरमती आश्रम में भी रहे। गांधीजी से उनकी यह आखिरी मुलाकात थी।

किसानों की दशा ठीक नहीं

निलहों को भगाने के बाद चंपारण भारत में किसान क्रांति और जागरण का प्रतीक भले बन गया रहा हो लेकिन सौ साल बाद यहां के गांवो की स्थिति फिर से चिंताजनक दिख रही है। हालांकि तमाम गांवों की भीतरी सड़कों को छोड़ दें तो आम तौर पर चंपारण में एक से दूसरी जगह को जोड़ने वाली सड़कें अच्छी हो गयी हैं। 100 साल पहले यहां गांधीजी आए तो कहीं हाथी तो कहीं बैलगाड़ी और कहीं दूसरे साधनों से सफर किया था। नील की खेती खत्म होने के बाद नरकटियागंज के आसपास के इलाके में गन्ने की खेती ने जोर पकड़ा जो अभी भी जारी है। नरकटियागंज की चीनी मिल भी अच्छी चल रही है। लेकिन गन्ने का वाजिब दाम न मिलने से इलाके में काफी पहले से एक नारा चल निकला है, निलहे गए तो मिलहे आए।

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मधुबनी स्थित गांधी आश्रम में बेतरतीब पड़े चरखे।

पश्चिमी चंपारण में ही गांधीजी ने भितिहरवा आश्रम स्थापित किया था। यह आज किसी तीर्थ से कम नहीं है। नवंबर 1917 को यहां एक पाठशाला और कुटिया बनाने में गांव वालों के साथ गांधीजी का भी श्रम लगा। चंपारण सत्याग्रह की शताब्दी पर बिहार सरकार ने आश्रम के कायाकल्प का काम किया। लेकिन किसानों की दशा सुधर नहीं पायी। इस इलाके में किसानों की बदहाली की एक वजह बाढ़ और नदी कटाव भी है। 1985 से किसान सरकार के पास गुहार लगा रहे है लेकिन कोई बात नहीं बनी। भितिहरवा आश्रम से लगा श्रीरामपुर गांव और आसपास का इलाका खेती के लिए मशहूर रहा है। जमीन भी उपजाऊ है और नहरें भी हैं। लेकिन बढ़ती लागत और सरकारी समर्थन के अभाव में छोटे किसानों का संकट और बढ़ता जा रहा है।

पश्चिमी चंपारण के प्रगतिशील किसान विजय पांडेय आलू पांडेय के नाम से इस इलाके में मशहूर हैं। इनका गांव बड़निहार नरकटियागंज प्रखंड में भितरहवा के करीब ही पड़ता है। पांडेयजी ने शुगरफ्री आलू उत्पादन की सफलता के साथ पूरे इलाके में खास हैसियत बनायी है। प्रोसेसिंग कंपनियों के साथ तालमेल कर वे अच्छी आमदनी कर लेते हैं। किसानों के बीच वे आलू बीज भी बेचते हें। आम किसान जब आलू डेढ़ रुपए किलो भी नहीं बेच पाता तो इनका आलू 10 रुपए किलो में बिकता है। लेकिन विजय पांडेय की सफलता के पीछे उनका श्रम और प्रगतिशील सोच दोनों है।

उनके पास वैसे तो जो 40 एकड़ भूमि है, वह कभी बंजर हुआ करती थी। इसमें से तीस एकड़ में उन्होंने एग्रो फारेस्ट्री की नर्सरी लगा रखी है। ग्रीन हाउस भी है जहां वे बहुत कुछ करते रहते हैं। उनसे हर साल पांच लाख से अधिक पौधे बिहार और पश्चिम बंगाल सरकार खरीदती है। कृषि विविधीकरण के साथ उन्होंने 60 देसी गाएं भी पाली हुई हैं। गोबर गैस से बिजली मिलती है और मीथेन गैस से उनका ट्रैक्टर और कार तक चलता है। वे यह सारा काम उस हरिनगर इलाके में कर रहे हैं, जहां 90 फीसदी इलाके में गन्ने की खेती करने के बाद भी आम किसान बेहाल हैं।

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राजकुमार शुक्ला की डायरी को परिजनों ने संभाल कर रखा है।

चंपारण उपजाऊ मिट्टी के बावजूद तमाम कारणो से संकट के दौर से गुजर रहा है। विजय पांडेय मानते हैं कि छोटे किसानों के पास तकनीक का हस्तांतरण नहीं हुआ और बैंक उनको मदद देने में उदासीन हैं। कृषि अनुसंधान तंत्र बैलगाड़ी की रफ्तार से चल रहा है। किसानों को वाजिब दाम नही मिलता जबकि बिचौलिए भरपूर फायदा उठा रहे हैं। न एमएसपी पर ढंग की खरीद है न बाजार हस्तक्षेप योजना। सारे किसान बाजार के भरोसे है, महंगे पर सामान खरीदना और अपना उत्पाद सस्ते में बेचना किसानो की नियति हो गयी है। किसान के पास खेती करने की मजबूरी है, लेकिन नयी पीढ़ी को खेती से लगाव नहीं दिख रहा है।

आजादी के बाद चंपारण की तस्वीर बदली लेकिन भूमि सुधार नहीं हो पाया। हालांकि अभी भी पश्चिमी चंपारण को ग्रीनरी आफ बिहार कहा जाता है और यहां तीन फसलें होती हैं। बिहार की सबसे ज्यादा चीनी मिलें यहीं हैं। लेकिन हल बैल से खेती कर रहे छोटे किसान हों या ट्रैक्टर और आधुनिक उपकरणों से लैस बड़े किसान सभी परेशान हैं। जलवायु परिवर्तन का असर भी यहां दिखने लगा है। हालांकि कृषि अनुसंधान प्रयासों से गेहूं की उत्पादकता 31 कुंतल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गयी है जबकि धान 27 कुंतल तक। गन्ना तो 600 से 700 कुंतल तक पैदा हो रहा है और कुछ किसान तो एक हजार कुंतल तक पैदा करते हैं। फिर भी कृषि अर्थव्यवस्था हिचकोले खा रही है तो इसकी वजह यही है कि खेती की लागत बढ़ रही है और किसान की आमदनी घट रही है।

राजकुमार शुक्ला के परिवार के सदस्य।

चंपारण को गांधीजी कभी नहीं भूले और ग्रामीण विकास में उनकी कोशिशें जारी रही। गांधीजी की आखिरी चंपारण यात्रा 1939 में हुई और उसी दौरान स्वतंत्रता सेनानी प्रजापति मिश्र की कोशिशों से 103 बीघा जमीन पर वृंदावन आश्रम और बुनियादी स्कूल स्थापित किया। यहीं गांधी सेवा संघ का पांचवां अधिवेशन मई, 1939 के दौरान चला था। गांधीजी के साथ सरदार पटेल, खान अब्दुल गफ्फार खान और डा. राजेंद्र प्रसाद जैसी तमाम हस्तियां यहां आठ दिनों तक मंथन करती रहीं। खुला। इसी आश्रम से सटा और भूदान की जमीन पर बसा डेढ़ हजार की आबादी वाला गांव आज संकट में है। पहले ग्रामोद्योगों से जीवन चल जाता था लेकिन अब आजीविका को लाले पड़ गए हैं। काफी युवा पलायन कर गए हैं।

चंद्रहिया गांव

महात्मा गांधी 16 अप्रैल 1917 को चंपारण के जिस चंद्रहिया गांव पहुंचे थे, इसे कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने गोद लिया है। फिर भी इसकी तस्वीर बहुत अच्छी नहीं दिखती। यहीं गांधीजी को चंपारण से चले जाने का सरकारी आदेश मिला था। छह हजार की आबादी वाले इसी गांव से पिछले साल मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने मोतिहारी तक आठ किमी लंबी पदयात्रा निकाली। उसी दौरान गांव की सड़क भी बनी। राधा मोहन सिंह के प्रयास से यहां कई योजनाएं आकार ले रही हैं। तमाम कृषि वैज्ञानिक भी गांव का जायजा ले रहे हैं। चंद्रहिया के गांधी स्मारक की शक्ल भी बदल गयी है। लेकिन 25 फीसदी दलित घोर गरीबी में दिन बिता रही हैं। यह अलग बात है कि शराबबंदी ने गांव पर अच्छा असर डाला है।

चंपारण सत्याग्रह की शताब्दी के आरंभ में ही मोतिहारी चीनी मिल यूनियन के महामंत्री नरेश कुमार श्रीवास्तव और संयुक्त मंत्री सूरज बैठा के आत्मदाह ने सबको सन्न कर दिया। इस मिल से 25 हजार गन्ना किसान और 650 मजदूरों का भाग्य जुड़ा रहा है। इस मिल पर किसानों का 17 करोड़ 41 लाख और मजदूरों का 43 करोड़ रुपए बकाया है। इस चीनी मिल के दायरे वाले किसानों को अब अपना गन्ना 65 किमी से 100 किमी दूरी पर ले जाना पड़ता है। परिवहन लागत बढ़ी है, जबकि गन्ने का दाम किसानो को यूपी से भी कम मिलता है।

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चंपारण स्थित स्मारक।

पूर्वी चंपारण में बड़हरवा लखनसेन गांव में गांधीजी ने सौ साल पहले भारत का अपना पहला बुनियादी विद्यालय खोला था। उसके परिसर में गांधी प्रतिमा औऱ शिलालेख के अलावा काफी टूटे फूटे सामान उस दौर की याद दिलाते हैं। इस गांव को गांधी सर्किट से जोड़ा गया है। यहां की अशिक्षा और गंदगी से द्रवित होकर गांधीजी ने इस गांव को खास बनाने की कोशिश की। मुंबई के इंजीनियर बबन गोखले, उनकी पत्नी और गांधीजी के बेटे देवदास गांधी यहां शिक्षक बने। चंपारण सत्याग्रह शताब्दी के मौके पर 26 लाख खर्च कर स्कूल को नयी शक्ल दी गयी। लेकिन गांधीजी जिस शिक्षा प्रणाली को जमीन पर उतारना चाहते थे वो अब गायब है। स्कूल में एक हजार बच्चों पर छह शिक्षक है।

बड़हरवा लखनसेन गांव पंचायत की आबादी आठ हजार है और 95 फीसदी लोग खेती पर निर्भर हैं। गांव का भव्य पंचायत सचिवालय भवन और अस्पताल बेकार पड़ा है। क्योंकि बनने के बाद कुरसी मेज या फर्नीचर नहीं जुट पाया और तभी से यहां ताला बंद हैं। गांव को पर्यटक स्थल बनाने के इरादे से गेस्ट हाउस भी ताले में बंद है। कुछ उत्साही ग्रामीणों ने गांधी स्मारक सह ग्राम विकास समिति बना कर जो पहल की उससे साफ- सफाई दिखती है।

गांधीजी के प्रयासों से स्थापित हुआ मधुबनी खादी ग्रामोद्योग भी बुरी दशा से गुजर रहा है। कभी इस इलाके में 10 हजार महिलाओं के चरखों की गूंज सुनाई पड़ती थी और काफी ग्रामीणों को रोजगार मिला था। लेकिन आज इसके विशाल परिसर में सन्नाटा पसरा है। इमारतों पर झाड़ झंखाड़ उग आए हैं। गांधीजी यहां 17 जनवरी 1918 को आए। लेकिन खादी औऱ ग्रामोद्योग का जाल उनके प्रिय मथुरा दास पुरुषोत्तम ने 1934 के भूकंप के बाद फैलाया।

यहां 200 बुनकर काम करते थे और कोल्हू से लेकर तमाम गतिविधियां चलती थीं। पर 1981 के बाद धीरे धीरे यह तबाह होता रहा। मधुबनी खादी आश्रम के पास अभी भी 17 एकड़ जमीन है। यहां की बेजोड़ मूंगा खादी कभी दूर दूर तक मशहूर थी। स्कूल से लेकर आश्रम में गौशाला तक चलती थी। ये कभी पूर्वी चंपारण का गौरव था। इसका सारा आधार मौजूद है, बस पूंजी की दरकार है। कई बार मधुबनी आश्रम की रौनक लौटाने का दावा हुआ। लेकिन चंपारण शताब्दी पर भी सब कुछ बेहाल है।

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मधुबनी स्थित गांधी आश्रम।

चंपारण पर हमेशा देश की निगाह रही। पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उस दौर के तमाम दस्तावेजों को संकलित और संरक्षित कराया। 1950 में डाक्टर राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में एक कमेटी ने बहुत अहम सुझाव दिए। कमेटी ने जमीनों की लूट और बंदरबांट में ताकतवर लोगों, चीनी मिलों औऱ राजनेता के शामिल होने को उजागर किया। लेकिन आज भी पश्चिमी चंपारण में साढे आठ हजार और पूर्वी चंपारण में ढाई हजार से अधिक परिवार बेघर हैं। फूस की झोपड़ी और नाम के मकान वाले तो बड़ी तादाद में हैं। भूमि सुधार आधे अधूरे मन से हुआ। भले यहां से रोजगार को पलायन जारी है लेकिन अधिकारियों के लिए चंपारण अभयारण्य सा है। ऐसा रुतबा दूसरे जिलों में नहीं।

राज्य सरकार ने चंपारण सत्याग्रह से जुड़ी 15 जगहों को सहेजने का प्रयास जरूर किया है। इनको गांधी सर्किट से जोड़ा जा रहा है। लेकिन उस दौर की तमाम धरोहरें नष्ट हो रही हैं,उनको सहेजने की कोशिश नहीं की गयी। इसमें बेतिया की हजारीमल धर्मशाला सबसे खस्ताहाल है, जहां गांधीजी दो महीने रहे थे। 1892 में सेठ हजारीमल झुनझुनवाला ने इसे बनवाया था। मोतिहारी के पास पिपरा नील कोठी के ध्वंश आज भी कायम हैं जो चंपारण में फैली 70 नील कोठियों में एक थी।

एक दौर तक नील अंग्रेजों के लिए चाय से अधिक फायदेमंद थी। ईस्ट इंडिया कंपनी तो शुरुआत से ही इसके कारोबार में लग गयी थी। बाद में बंगाल में जमींदारियां खरीद कर नील की खेती शुरू करायी गयी। ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति के चलते नील की खेती को और विस्तार मिला। पहले बंगाल फिर बिहार नील की खेती का प्रमुख क्षेत्र बना। बंगाल में नील किसानों के शोषण पर दीनबंधु मित्रा ने 1860 में ‘नील दर्पण’ नाटक लिख जिससे काफी हलचल पैदा हुई।

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वृंदावन स्थित आश्रम की बदहाली बयां करती तस्वीर।

बात लंदन तक पहुंची जिस कारण बंगाल में नील किसानों का शोषण रुक गया लेकिन इसका विस्तार चंपारण में हो गया। चंपारण की जमीन नील के लिए काफी माकूल थी और उच्च स्तरीय नील पैदा होती थी। इस कारण 1892 तक चंपारण में करीब 96 हजार एकड़ भूमि पर नील की खेती होने लगी। हालांकि चंपारण में नील की खेती पर कारोबारी उतार- चढ़ाव और कृत्रिम नील के इजाद का असर भी पड़ा। लेकिन इससे किसानों का शोषण पहले से अधिक बढ़ गया।

गांधीजी जब 15 अप्रैल 1917 को मोतिहारी पहुंचे तो उनको व्यापक समर्थन मिला। दो माह में ही अपने साथियो के साथ गांधीजी ने 2900 गांवों के करीब 13 हजार किसानों से सीधा संवाद कायम कर लिया था। गांधीजी यहां की बोली बानी से वाकिफ नहीं थे न नील की खेती की बारीकियों को जानते थे, फिर भी यहां की जमीनी हकीकत समझने में उनको देर नहीं लगी। उन्होंने यहां के किसानों को नया रास्‍ता दिखाने के लिए भीषण गर्मी में पूरे इलाके की धूल फांकी। इस नाते दो महीनों में ही चमत्कार दिखने लगा। सरकार का ध्यान शताब्दी पर है लेकिन उन किसानों पर नहीं जिन्होने मोहन दास करमचंद गांधी को महात्मा गांधी बनाया।

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