खेत खलिहान : आमदनी तो तब बढ़ेगी जब छोटे किसानों तक तकनीक पहुंचेगी 

खेत खलिहान : आमदनी तो तब बढ़ेगी जब छोटे किसानों तक तकनीक पहुंचेगी कृषि उन्नति मेला में शिरकत करते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी।

हाल में नई दिल्ली में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान परिसर में आयोजित कृषि उन्नति मेला में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए भारत की राह सशक्त करने में किसानों और कृषि वैज्ञानिकों की अहम भूमिका के साथ कृषि तकनीकों पर खास जोर दिया। उन्होंने कृषि से जुड़ी कई नई-नई तकनीकों को भी देखा और 25 नए कृषि विज्ञान केंद्रों का शुभारंभ भी किया। प्रधानमंत्री ने अब तक स्थापित 700 कृषि विज्ञान केंद्रों को भविष्य़ की खेती के लिए लाइट हाउस करारते हुए यह भी कहा कि ये किसानों तक नई तकनीक और नई जानकारी को पहुंचाएंगे।

प्रधानमंत्री ने खास जोर तकनीक पर दिया और कहा कि नए रास्तों पर चलने के लिए तकनीक ही हमारी मदद करेगी। मेले में जिन किसानों ने नई तकनीकें देखी हैं, वे उसका इस्तेमाल भी करने की कोशिश करेंगे। इस मेले में हजारों लोग आते रहे हैं, लेकिन उससे उनकी जिंदगी में क्या बदलाव आया और किन तकनीकों को ज्यादा पसंद किया जाता है इस पर भी अध्ययन होना चाहिए। इससे भविष्य की तैयारियों में मदद मिलेगी। प्रधानमंत्री ने इस मौके पर बहुत से प्रगतिशील किसानों और खेती बाड़ी में तरक्की करने वाली राज्य सरकारों को सम्मानित भी किया।

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वास्तव में पूसा का यह किसान मेला हरित क्रांति के बाद से आरंभ हुआ और 1972 से विधिवत चल रहा है। उस दौरान इस मेले का उद्देश्य था कि किसानों तक बीजों की नई किस्मों को पहुचाया जाये। शुरू में गेहूं की लाल दाना था, जो किसानों को पसन्द नहीं आता था। किसानों और उपभोक्ताओं के हिसाब से बीजों पर काम हुआ और कृषि वैज्ञानिकों को सफलता मिली तो भी बौनी किस्मों के बीज बहुत कम पसन्द किए जा रहे थे। किसानों के अन्दर संशय था लेकिन किसानों और वैज्ञानिकों के मिलने से ऐसी तमाम बाधाएं दूर होती रहीं। इसमें पूसा का बहुत योगदान रहा। बीज क्रांति का असर भी रहा और आज पूसा के बीज देश भर में लोकप्रिय हैं। गेहूं और बासमती चावल में तो इसका जवाब नहीं है।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान यानि पूसा ने विशेष रूप से गेंहूं की शानदार प्रजातियां विकसित की है। पिछले सालों में एचडी 2967 के नाम से गेहूं की जो प्रजाति विकसित हुई उसका रकबा 80 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया। एक और प्रजाति 3086 में पीला या भूरा रतुआ जैसी कोई बीमारी नहीं लगती और पैदावार बहुत अच्छी हैं। बासमती का निर्यात 33 हजार करोड़ रूपये से अधिक हो गया है, जिसमें पूसा का खास योगदान रहा है। पानी की बचत के साथ जलवायु परिवर्तन से झेलने लायक किस्में भी पूसा में तैयार हो रही हैं।

लेकिन यह अलग तस्वीर है। तकनीक की दुनिया अलग है और अनुसंधान की भी। खुद डॉ. एमएस. स्वामिनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय कृषक आयोग ने माना है कि प्रयोगशाला और खेत के बीच का संयोजन कमजोर है। किफायती दामों पर अच्छी गुणवत्ता के बीजों की आपूर्ति कम है। गुणवत्ता नियंत्रण का अभाव है जिस कारण मिलावटी कीटनाशक दवाएं और जैविक खाद और बीज बिक रहे हैं।

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बेशक किसान मेले बहुत उपयोगी हैं। दशको से चले आ रहे इस किसान मेले को कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने नया नाम दिया कृषि उन्नति मेला। इसका आकार भी विशाल हो गया है। देश के तमाम हिस्सों से किसान यहां पहुंचते हैं। यह दीगर बात है कि अधिकतर संख्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा औऱ पंजाब की ही होती है। कॉरपोरेट्स भी बड़ी संख्या में यहां अपने भारी भरकम मशीनों औऱ औजारों के साथ पहुंचते हैं औऱ मेले को काफी जगह घेर लेते हैं। फिर भी ऐसे किसान मेले, विज्ञान और सरकार तीनों का संगम होते हैं। हालांकि आम किसान की कोई पूछ इन मेलों में नहीं होती है, फिर भी काफी कुछ सीखने को मिलता है।

हमारी खेती में तकनीक का प्रयोग काफी इलाको में हो रहा है। भारत विश्व में ट्रैक्टर का सबसे बड़ा बाजार बनता जा रहा है। लेकिन ट्रैक्टर के कुल उपयोग के लिहाज से यह आठवें नंबर पर है। सालाना करीब सात आठ लाख ट्रैक्टर बिक रहे हैं। बीते तीन दशकों में खेती में खासा यंत्रीकरण हुआ। लेकिन उपकरणों की मांग और पूर्ति के बीच अंतर है। पंजाब और हरियाणा में व्यापक यंत्रीकरण का लाभ हुआ है लेकिन इससे किसानों की खेती की लागत बढ़ी है।

अब सरकार ने सीमांत और छोटे किसानों को उनकी हैसियत लेने लायक यंत्र देने की जरूरत भी महसूसी है और इसके तहत 2014-15 में कृषि यंत्रीकरण उप मिशन शुरू किया गया। लेकिन यह सीमित पहुंच वाला है। इस मद में 2014-15 में 195 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया था जो 2017-18 में बढ़ कर 804 करोड़ कर दिया गया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने अपनी तमाम परियोजनाओं के माध्यम से 150 विभिन्न प्रौद्योगिकियां विकसित की हैं जो कम लागत की हैं और छोटे औऱ मझोले किसानों लायक हैं। लेकिन जमीन तक उनकी सीमित पहुंच है।

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इस तस्वीर के बीच हाल में संसद की कृषि संबंधी स्थायी समिति ने किसानों की आय 2022 तक दोगुनी करने की मंशा को सराहा है। लेकिन कहा है कि इस रणनीति में ये देखना भी जरूरी है कि हमारे 85 फीसदी किसान छोटे और मझोले हैं जिनके पास सीमित निवेश की ताकत औऱ नाममात्र की जमीन है। इस नाते इस तरफ खास ध्यान देने की जरूरत है कि वे किस तरह से कम निवेश में अधिक लाभ हासिल कर सकें।

समिति ने टिप्पणी की है कि खेती को और लाभकारी बनाने को छोटे किसानों की हैसियत लायक उपकरण और औजार बनें। क्योंकि छोटी लागत की मशीनें आम किसानों की अधिक आय बढ़ाने में सबसे मददगार होंगी। यह भी देखना जरूरी है कि देश में खेती की जमीनें लगातार घटती जा रही है। प्रति व्यक्ति जमीन का रकबा पांच दशक में 2.63 हेक्टेयर से घट कर 0.8 हेक्टेयर पर आ गया है। इसमें 67 फीसदी सीमांत किसानों के पास एक हेक्टेयर से भी कम जमीन है। आबादी के हिसाब से खाद्य पदाथों का उत्पादन नही बढ़ रहा है।

नकदी फसलों का रकबा बढ़ रहा है और खाद्य पदार्थों की पैदावार में कमी आ रही है। खेती में श्रम लागत 40 फीसदी से अधिक हो गयी है और छोटी जोत के किसानों के लिए लाभप्रद छोटी मशीनों और पशुबल के उपकरणों पर ध्यान कम है। अमेरिका में 5-10 हजार एकड़ के फार्म हैं इस नाते वहां बड़ी मशीनरी लगती है। ऐसी मशीनें हमारे यहां बेकार है क्योंकि हमारे खेतों का आकार बहुत छोटा है।

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कृषि संकट के इस दौर में छोटे किसानों की मुक्ति का रास्ता किसी को नहीं सूझ रहा है। वैसे भी तमाम योजनाओं का लाभ उन तक पहुंच नहीं पाता। टेक्नालाजी की पहुंच से भी वे दूर हैं। लेकिन तमाम प्रगतिशील किसानों को तकनीकी ज्ञान का फायदा मिला है। इसकी मदद से वे आगे बढ़े हैं। लेकिन ये वे किसान हैं जिनके पास ठीक ठाक जमीनें हैं औऱ निवेश भी। छोटे किसानों को भी तकनीक मदद दे सकती है लेकिन उनको संगठित करने की दिशा में बहुत सीमित काम हो रहा है।

हापुड़ के एक प्रगतिशील किसान मलूक सिंह का मानना है कि जब तक किसानों को नई तकनीक नहीं दी जायेगी, उनकी हालत में कोई सुधार नहीं होने वाला है। आज तकनीकें हों या मशीनें या कृषि यंत्र सभी महंगे हैं। इसे ध्यान में रख कर किसानों का समूह बने या सहकारिता का मॉडल दोनों मददगार हो सकते हैं। छोटे किसान ही आज भी हमारी खेती की रीढ़ हैं औऱ उनकी संख्या 11.71 करोड़ से अधिक है। उनके ही कंधों पर हमारी खाद्य सुरक्षा टिकी है लेकिन यह भी सच है कि वे ही सबसे दयनीय दशा में हैं। लेकिन उनकी अलाभप्रद छोटी जोतों को लाभकारी कैसे बनाया जाये, इस पर काम नहीं हो पाया है।

मिट्टी की सेहत की ही बात करें तो आम तौर पर छह पोषक तत्वों की कमी उऩमें पायी जाती है। इसकी सहीं जानकारी अगर किसान को मिल जाये तो वह अपनी खेती को सुधार सकता है। पूसा के वैज्ञानिकों ने स्वाइल टेस्ट मीटर बनाया है जिसकी लागत तीस हजार रुपए है। छोटा किसान तो इसे भी नहीं खरीद सकता लेकिन एक गांव के लिए यह मशीन काम की हो सकती है। यह मिट्टी का परीक्षण भी करती है और उपचार भी बताती है। इसे 12वीं पास लड़का भी चला सकता है। अगर इसे कंप्यूटर से जोड़ दिया है लिहाजा तत्काल रिपोर्ट भी मिल सकती है। ऐसी मशीनों की जरूरत है लेकिन इसके लिए पंचायत स्तर पर सरकारी तंत्र को मजबूत किया जाना चाहिए।

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वैसे तो हमारे नीति निर्माता कृषि क्षेत्र को लेकर लंबे चौड़े दावे करते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि चीन के मुकाबले हमारी प्रमुख फसलों की उपज लगभग आधी है। हमारी मक्का, और दालों की उत्पादकता पाकिस्तान बंगलादेश, नेपाल और म्यांमार से भी कम है। कम जमीन में वे ज्यादा उत्पादन कर रहे हैं। धान की बात करें तो भारत की उत्पादकता 3264 किग्रा है जबकि चीन की 6548 किग्रा प्रति हेक्टेयर। इसी तरह गेहूं में भारत की उत्पादकता 3264 किग्रा है जबकि चीन की 4748 किग्रा प्रति हेक्टेयर। वहीं मक्का में भारत 1958 किग्रा पर है तो चीन 5459 किग्रा प्रति हेक्टेयर पर और दलहन में भारत 0694 किग्रा पर है जबकि चीन 1567 किग्रा पर।

हमारे देश में कुल बुवाई का 60 फीसदी इलाका आज भी बारिश के भरोसे है। फिर भी यह क्षेत्र अनाज में 40 फीसदी योगदान देता है। इसी क्षेत्र में करीब 88 फीसदी मोटा अनाज, 87.5 फीसदी दलहन, 48 फीसदी चावल, और 67 फीसदी कपास उगाया जाता है। लेकिन नयी तकनीकों का लाभ यहां किसानों को सबसे कम मिलता है। सरकार मदद करेगी तभी इनकी खेती की लागत घट सकती है।

आज हम संचार क्रांति के युग में जी रहे हैं। अधिकतर गांवों तक मोबाइल फोन और इंटरनेट पहुंच गए हैं। फिर भी किसान तकनीक में पीछे हैं। इसके लिए ठोस नीति ही नहीं बन सकी है। हिमालयी राज्यों में एक के बाद एक प्राकृतिक आपदाओं ने किसानों को पलायन के लिए मजबूर कर दिया है। उत्तराखंड से लेकर कश्मीर तक यह साफ दिखता है। गांवों में खेती का जिम्मा खास तौर पर महिला किसानों के हाथ है।

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बेशक देश में किसानों के लिए न तो तकनीक की कमी हैं, न ही तकनीकों के विस्तार के लिए संस्थाओं की। भारत सरकार ने 700 विज्ञान केंद्र बनाए हैं और राज्यों में कृषि विस्तार का अलग से तंत्र है। कृषि विज्ञान केंद्रों में गृह विज्ञान से लेकर पशुपालन विभाग तक सब कुछ है। लेकिन बहुत से केंद्रों में बुनियादी सुविधाओं और संसाधनों का अभाव है। इस तस्वीर के आलोक में यह जरूरी है कि राज्य सरकारें छोटे किसानों की हैसियत और जेब के आलोक में नयी रणनीतियां तैयार करें तभी तकनीकें छोटे किसानों तक पहुंच सकेंगी।

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