भरे हैं ताल तलैया, अघाइ गईं धरती मइया और हम?

भरे हैं ताल तलैया, अघाइ गईं धरती मइया और हम?

मैं अपने गांव गया तो देखा कई साल बाद सभी तालाब पानी से लबालब भरे हैं, मनरेगा में मिट्टी खरोंच कर जो बने थे वे भी भरे हैं। बहुत पहले जब बरसात के दिनों में वाटर टेबल ऊपर उठता था तो कुओं में पानी पास दिखता था, इस साल वैसा ही है। लखनऊ, बाराबंकी और सीतापुर को छूते हुए इलाके में बाढ़ तो नहीं आई और न पुल-बांध टूटे लेकिन किसानों के सिंचाई के लिए प्रकृति ने सतह पर खूब जल संग्रह कर दिया है। गांव के नल जो सांय-सांय हवा देते थे भरपूर पानी दे रहे हैं। किसानों को जागृत किया जाना चाहिए कि जब तक सतह पर पानी उपलब्ध रहे धरती के अन्दर का पानी सिंचाई, औद्योगिक उपयोग आदि में न खर्च किया जाए।

हमें भूजल का उपयोग केवल पीने के लिए करना चाहिए और सिंचाई के लिए भूतलीय जल का।

प्रकृति ने जल संचय का अपना काम कर दिया है अब हमारी जिम्मेदारी है कि संचित जल में से भूतलीय जल को पहले खर्च करें नहीं तो उसका वाष्पीकरण होता रहेगा और तालाब सूख जाएंगे। सरकार और सामाजिक संस्थाओं को जागरूकता लानी चाहिए कि भूजल का उपयोग पेयजल के अलावा तभी करो जब सरफेस वाटर समाप्त हो जाय। वास्तव में भूतलीय जल तो फ्री होना चाहिए लेकिन भूजल के उपयोग पर टैक्स लगना चाहिए तब भूजल उपयोग पर सार्थक अंकुश लगेगा।

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यह समय है कुछ ऐसे उपाय करने का जो दुबारा पेयजल संकट आने से हमें बचाए। पहला उपाय होना चाहिए ब्लॉक स्तर पर प्रधानों की गोष्ठियां करके उन्हें तालाबों के किनारे सब तरफ पेड़ लगाने का, तालाबों में सिंघाड़ा जैसी फसलें उगाने और कमल खिलाने का जिससे वाष्पीकरण नियंत्रित होगा। अब तालाबों, सड़कों और नदियों के किनारे गड्ढे खोदना आसान होगा, उनमें भरने के लिए उपजाऊ मिट्टी उपलब्ध है और लगाए गए पौधों की सिंचाई के लिए पानी तो है इसलिए वृक्षारोपण के कामों में मनरेगा का भी उपयोग हो सकता है। हमारी सरकार भूल जाती है कि प्रधान समाजसेवी हैं, न शासक और न नौकर। उनके शपथ पत्र में जलसंचय और जल उपयोग जैसी बातें सम्मिलित रहनी चाहिए।

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इस साल की अतिवृष्टि कहीं अभिशाप तो कहीं वरदान बनकर आई है। इसके लिए जलवायु परिवर्तन कहां तक जिम्मेदार है यह कहने के लिए अभी जल्दी है लेकिन यह हर साल नहीं होगी यह तो कहा जा सकता है। जो भी हो प्रत्येक गांव में पहले ही "पानी पंचायत" की स्थापना हो जानी चाहिए थी जो अतिवृष्टि और अनावृष्टि दोनों ही परिस्थितियों में जिम्मेदारी निभाएगी। यह काम वर्तमान पंचायतों में उपसमिति बनाकर भी हो सकता है। हमारे देश में कुछ स्थानों पर पानी पंचायत के रूप में थोड़ा नियंत्रण है परन्तु उसे कानूनी रूप देने की आवश्यकता है।

जल की उपलब्धता तो हो चुकी और संचय भी हो गया लेकिन उसके उपयोग का विषय अभी भी महत्वपूर्ण है। जल उपयोग के लिए जलनीति बनाने की आवश्यकता है। अमेरिका जैसे देशों में जल संसाधन नियंत्रण बोर्ड (वॉटर रिसोर्स कन्ट्रोल बोर्ड) और जल अधिकार विभाग (वॉटर राइट्स डिवीजन) बने हैं जिन मे जिला परिषद, कृषक मंडल, उद्योगपति और स्वयंसेवी संस्थाओं का प्रतिनिधित्व रहता है। मोटे तौर पर धरती के अन्दर का मीठा पानी पीने के लिए सुरक्षित रखना चाहिए और धरातल पर मौजूद नदियों, झीलों और तालाबों का पानी सिंचाई, बागबानी, मछलीपालन, पशु-उपयोग और उद्योगों के उपयोग में लाना चाहिए अन्यथा जल संकट एक बार फिर से हमारा दरवाजा खटखटाएगा।

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