भूखी-प्यासी छुट्टा गाएं वोट चबाएंगी, तुम देखते रहियो

देश में गोशालाओं की भारी कमी है और उनके प्रबंधन में निर्बाध भ्रष्टाचार हैं, पशु चिकित्सा भगवान भरोसे तो गाय का जयकारा बोलने से क्या होगा।

भूखी-प्यासी छुट्टा गाएं वोट चबाएंगी, तुम देखते रहियो

किसान अभी तक नीलगायों से परेशान था सभी सरकारों ने उन्हे पवित्र गाय ही माना था लेकिन अब सचमुच की गायें हजारों की संख्या में नई व्यथा लेकर किसान की फसल खाए जा रही हैं। देसी गाएं उतना दूध भी नहीं देतीं जितने का चारा खाएंगी, चरागाह हैं नहीं, खेतों की फसल कटाई मशीनों से होती है, घर में चारा है नहीं तो क्या करे किसान। वह गायों और बछिया-बछड़ों को अंधेरे में कुछ किलोमीटर की दूरी पर ले जाकर छोड़ आता है वहां के लोग भी यही करते हैं। किसानों की व्यथा का समाधान यह है कि गायों के खरीदने-बेचने पर लगे प्रतिबंध संबंधी आदेश, जिस पर मद्रास उच्च न्यायालय ने रोक लगाई और उच्चतम न्यायालय ने उस रोक को बरकरार रक्खा है, सरकारें या तो अदालती आदेश को मानें अथवा गायों को अभयारण्य में ले जाकर छोड़ आएं।


गांवों की ही तरह शहरों में सड़कों पर गायों के झुंड आराम से बैठे रहते हैं और वाहनों की आवाजाही से तनिक भी विचलित नहीं होते। वाहन चालकों के लिए समस्या बनते हैं और दुर्घटना का कारण भी। सड़क पर वाहनों के लिए बाधा है तो बूढ़े लोगों और महिलाओं के लिए बने फुटपाथ और साइकिल ट्रैक पर या तो गाएं बैठी रहती हैं या गोबर के छोत पड़े रहते हैं।

माननीय उच्च न्यायालय ने शहरों में डेयरी न चलाने का आदेश पारित कर रखा है फिर भी शहर में डेयरी चल रही हैं। जो लखनऊ कभी "सिटी ऑफ पार्क्स" कहा जाता था अब "सिटी ऑफ गोबर ऐंड गारबेज" बन गया है, दूसरे शहरों की हालत भिन्न नहीं है। शहरी गायों की समस्या नगर निगम की देन है और हाईवे तथा खेतों में गायों के लिए सरकार जिम्मेदार है लेकिन जिम्मेदारी बटवारे की रेखा कहां है?

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इस बात में सन्देह नहीं कि भारतीय समाज में गाय किसानों को मां की तरह पालती थी, उसके बछड़े बैल बनकर सेवा करते थे लेकिन अब उसके दूध की कद्र नहीं, बछडों का काम नहीं, चारा और चरागाह बचे नहीं, गोबर और गोमूत्र जरूर देती है प्लास्टिक और कागज खाकर और नाली का पानी पीकर। बुंदेलखंड जैसी जगहों पर किसान के लिए छुट्टा गोवंश उसी तरह हो गया है जैसे नीलगाय और बन्दर। काश गोरक्षक किसान के दर्द और गायों की भूख प्यास को समझते और गायों के लिए अनाथाश्रम बनवाते। गोपालन को आकर्षक बनाने के लिए न तो सरकार ने और न गोरक्षकों ने कुछ किया है, गोवंश भूखा प्यासा मरने के लिए स्वच्छंद है। ऐसी आजादी तो मानव को भी नहीं चाहिए क्योंकि, "वुभुक्षितः किम् न करोति पापम"।

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कहते तो हैं कि गाय के दूध में आयोडीन की मात्रा अधिक होती है और वह आसानी से पचता है फिर भी हम भैंस का ही दूध ढूंढते हैं इसलिए गाय का दूध सस्ता बिकता है, डेयरी पर भी। मशीनीकरण के कारण खेतों की जुताई और सामान की ढुलाई में बैलों का उपयोग नहीं रहा। किसान गोवंश को मार भी नहीं सकता और पालने की क्षमता भी नहीं, बस एक खेत से दूसरे खेत में भगा सकता है, पर यह कब तक चलेगा।

गायों के प्रति सम्मान शुद्ध रूप से आर्थिक था न कि भावात्मक, अहिंसात्मक अथवा दार्शनिक। यदि अहिंसा की बात होती तो बकरा, भेड़, मछली, मुर्गा आदि के प्रति भी वही लगाव होता जो गाय के प्रति रहा है। आज की तारीख में यदि दरवाजे पर देशी गाय और दुधारू भैंस बंधी है तो पशुपालक स्वाभाविक रूप से पौष्टिक आहार भैंस को खिलाते हैं। शहरी लोगों और नेताओं का गोमाता का जयकारा लगाने में कुछ खर्चा नहीं होता। गोशालाओं की भारी कमी है और उनके प्रबंधन में निर्बाध भ्रष्टाचार हैं, पशु चिकित्सा भगवान भरोसे तो गाय का जयकारा बोलने से क्या होगा। नेशनल डेयरी डेवलपमेन्ट बोर्ड द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में पाया गया है कि गायों की आबादी घट रही है, जबकि भैंसों की आबादी बढ़ रही है। क्या यही चाहते हैं गोरक्षक जिससे मांसाहारियों का भी काम चलेगा और गोभक्तों को सुकून मिलेगा?

तथाकथित गोभक्तों औार गोरक्षकों द्वारा मॉबलिंचिंग करके सरकार को बदनाम किया जाता है, जबकि उनके दरवाजे पर एक गाय बंधी नहीं मिलेगी। किसी गांव में जाकर किसान से पूछिए वह गाय क्यों नहीं पालता। पिछले दो दशकों में कामकाजी पशुओं की आबादी करीब एक तिहाई घट गई है। लकड़ी से हल बनाने वाले बढ़ई और हल की नसी यानी लोहे का नुकीला फार पीटने वाले लोहार बेरोजगार हो गए हैं। आवश्यकता है गोवंश को भारतीय जीवन में प्रासंगिक बनाने की, गायों के जीवनयापन की व्यवस्था की अथवा गोवंश बचाने का हल्ला बन्द करने की।

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