किसान आंदोलन स्वतः स्फूर्त अथवा राजनीति से प्रेरित

किसान आंदोलन स्वतः स्फूर्त अथवा राजनीति से प्रेरित

किसान आंदोलित हैं, पहले तमिलनाडु, फिर मध्य प्रदेश और अब उत्तर प्रदेश में किसानों का हरिद्वार से दिल्ली कूच। विपक्ष का कहना है कि मोदीराज में देश में त्राहि-त्राहि मची है और सरकार का सोचना है किसानों को बरगलाया जा रहा है और वही किसान आन्दोलनों की अगुवाई कर रहे हैं और हिंसक बन रहे हैं जो विपक्षी दलों से सम्बद्ध हैं। सच जो भी हो लेकिन हमारे नेता किसान का असली मर्ज या तो जानते नहीं अथवा जानकर अनजान बने हैं। वे किसानों को उसी तरह शान्त करना चाहते हैं जैसे रोते बच्चे को झुनझुना पकड़ाकर शान्त किया जाता है। कुछ देर बाद बच्चा फिर रोएगा।

कभी किसान अपना टमाटर, आलू सड़कों पर फेंकता है, कभी लहसुन, प्याज में लागत तक वसूल नहीं होती।

देखने सुनने में आता है कभी किसान अपना टमाटर तो कभी आलू सड़कों पर फेंकता है, और कभी लहसुन और प्याज में लागत तक वसूल नहीं होती। यह सब इसलिए हो रहा है कि सरकार चाहती है चिप्स, सॉस और अचार केवल अरबपति कम्पनियां ही बनाएं, गांवों में कुटीर उद्योगों में बना माल गुणवत्ता के आधार पर अमान्य हो जाता है लेकिन शोध करके किसानों की कोई मदद नहीं करता। बड़ी कम्पनियों के बिचौलिए मनचाहे दाम पर खरीदते हैं और रोता है किसान। बिचौलियों पर नियंत्रण कर नहीं सकते और खाद्यान्नों का आयात आसान और मुनाफे का सौदा लगता है। खाद्यान्नों का आयात पूर्णतः प्रतिबन्धित होना चाहिए, जो देश में है वो खाओ।

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किसानों को उपज का उचित दाम देने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करने की परंपरा है। सभी सरकारें कहती हैं हमने अधिक समर्थन मूल्य दिया लेकिन सच्चाई यह है कि सबने भीख से ज्यादा कुछ नहीं दिया। कर्मचारियों का महंगाई भत्ते का हिसाब लगाने के लिए किसी साल की कीमतों को आधार मानते हैं और उसके बाद बढ़ती महंगाई के आधार पर भत्ता निर्धारित करते हैं। अब देखिए महंगाई का आलम, 1970 में मजदूरी दो रुपया प्रतिदिन थी आज 200 है यानी 100 गुना की वृद्धि, जबकि गेहूं तब 50 पैसा प्रति किलो था अब 17 रुपया किलो है यानी केवल 34 गुना वृद्धि। इसी प्रकार आप कपड़ा, सीमेंट, बच्चों की फीस, दवाइयां और कर्मचारियों का वेतन जोड़ते चले जाइए और देखिए क्या उसी अनुपात में आपने बढ़ाया है किसान की उपज का समर्थन मूल्य। किसान से बेहतर तो मजदूर है जो 1972 में शाम को तीन किलो गेहूं घर लाता था, अब प्रतिदिन 12 किलो गेहूं घर लाता है।

सरकारें किसानों को बैसाखी पर जिन्दा रखना चाहती हैं, अपने पैरों पर खड़ा नहीं होने देंगी।

सरकारों को चिन्ता किसान की कम शहरी आबादी की अधिक है। अरहर दाल महंगी हुई तो किसान ने अरहर बोई लेकिन इसी बीच सरकार ने उसका आयात कर लिया और किसान फिर घाटे में रह़ गया और मूर्ख बन गया। क्या किसान को सुखी करने के लिए आयात किया था आपने? तमाम दालें उपलब्ध हैं चना, मसूर, मटर, मूंग, उड़द, भट, गोहद और ना जाने कितने प्रकार की दालें हैं जिनका प्रयोग करने से उन दालों का भी उचित मूल्य मिल सकता था किसान का भला हो सकता था। लेकिन नहीं अरहर ही चाहिए, विदेशी मुद्रा घटती है तो घटे, रुपए की कीमत रसातल में जाती है तो जाए, किसान का लाभ न होने पाए। किसानों को अपना मुरीद बनाने की होड़ लगी है खैरात बांटकर। सरकारें उन्हें बैसाखी पर जिन्दा रखना चाहती हैं, अपने पैरों पर खड़ा नहीं होने देंगी।

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किसान अब नहीं कहता उत्तम खेती मध्यम बान, निपट चाकरी भीख समान। किसान के बच्चे नौकरी ढूंढते हैं खेती को अछूत मानते हैं। हमें खेती को फिर से पुराना सम्मान दिलाना होगा, मगर कैसे? किसान कब तक अपनी इच्छाओं को मारता रहेगा। बदलती दुनिया में किसान भी अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाना चाहता है, अच्छे कपड़े पहनाना और अच्छा भोजन खिलाना चाहता है, परन्तु उसके पास नियमित और भरोसे की आमदनी नहीं है। किसान का जीवन अनिश्चय के भंवर में फंसा है कभी मौसम, कभी सरकारी नीतियां तो कभी बाजार भाव। और सरकार है कि खैरात का दर्दनिवारक देकर समझती है मर्ज ठीक हो गया।

किसानों को आर्थिक संकट से निकालने और स्वावलम्बी बनाने का एक ही उपाय है कि गांवों में स्थायी रोजगार के अवसर मुहैया कराए जाएं। ऐसे उद्योग लगाए जाएं जहां किसानों द्वारा उगाई गई चीजों का कच्चे माल की तरह प्रयोग हो और किसानों को उन उद्योगों में काम मिले। उनका भला ना तो मनरेगा से होगा और ना ही मिड डे मील या खाद्य सुरक्षा से, खैरात और ऋण माफी से तो कतई नहीं। किसान को चाहिए आर्थिक स्वावलंबन और स्वाभिमानी जीवन जो गांधी के ग्राम स्वराज से मिलेगा, शहरों का सेवक बनाकर नहीं।

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यदि हमारी सरकारें किसानों के लिए स्थायी आमदनी की व्यवस्था नहीं कर सकतीं तो किसान की पुरानी पद्धतियों पर शोध करके उन्हें समयानुकूल बनाया जाए, कैश क्रॉप उगाने के लिए अवसर प्रदान किए जाएं और खाद्यान्नों के भावों के उतार-चढ़ाव पर कड़ा अंकुश लगे। किसान गन्ने से गुड़ बनाता और स्थानीय बाजार में बेचता था परन्तु गुड़ की गुणवत्ता सुधारने के बजाय उसे अपना गन्ना चीनी मिलों को बेचने के लिए प्रेरित किया गया जहां समय पर पैसा नहीं मिलता। गन्ना के अलावा अन्य नगदी फसलें हैं मेंथा, मूंगफली, तिलहन, सब्जियां और फल जिनके लिए नई-नई मंडियो में बैठे आढ़तिए, बिचौलिए, विदेशी कम्पनियों के बिग बाजार लूट रहे हैं। किसान के उत्पादों के लिए चाहिए स्थानीय स्तर पर कुटीर उद्योग जो उसे समय पर और उचित मूल्य दे सकें, जिसमें अनिश्चितता न हो। अन्यथा आन्दोलन होते रहेंगे चाहे स्वतः स्फूर्त या प्रेरित।

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