आयुष्मान भारत योजना की राह में रोड़े कम नहीं हैं

आयुष्मान भारत योजना की राह में रोड़े कम नहीं हैं

प्रधानमंत्री मोदी ने आयुष्मान भारत योजना का शुभारंभ किया है परन्तु इसकी सफलता की चाभी दूसरों के हाथ में है। पहले रोड़े का संकेत मनीषियों ने यह कह कर किया है ''वैद्यराजः यमराजश्च सहोदरः" यानी डॉक्टर और यमराज सगे भाई हैं। रोड़े और भी हैं फिर भी आयुष्मान होने की इच्छा हमारे देश में युगों से की जाती रही है ''जीवेम् शरदः शतम्'' अर्थात 100 शरद ऋतुओं तक जीवित रहें। इसी तरह जब कोई बुजुर्ग बच्चों को आशीर्वाद देता है तो कहता है ''आयुष्मान भव'' और इसी को हिन्दी में कहते हैं ''जीते रहो''। लेकिन आशीर्वाद देने भर से कोई शतायु नहीं बन जाएगा और न सरकार द्वारा आयुष्मान योजना घोषित करने से ही बनेगा।

संतुलित शाकाहारी आहार से भी आयुष्मान भारत बनने में मदद मिलेगी।

आयुष्मान भारत, मैगी नूडल्स, पिज्जा, मैकरोनी, ब्रेड और बर्गर खाकर भी नहीं बनेगा। पश्चिमी देशों में लोग यह सब चीजें खाते जरूर हैं लेकिन साथ में अंडा, मांस, मछली, दूध, मक्खन और फल तथा सब्जियां भी खूब खाते हैं। ऐसा भी नहीं किे मांसाहारी जीवन ही लंबी आयु देता है। सन्तुलित शाकाहारी भोजन भी दीर्घायु बना सकता है लेकिन जंक फूड तो कतई नहीं। आजादी के बाद हमारे देश की जीवन शैली में भारी बदलाव आया है और यह देश बन गया है मधुमेह की राजधानी, उच्च रक्तचाप का शिकार, यौन रोगों से ग्रसित और अब ''आलस की राजधानी''। क्या आयुष्मान योजना हमें इन सब से निजात दिला पाएगी?

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हमारे देश में औसत आयु पुराने समय में जो भी रही हो आज लगभग 68 वर्ष है। यह औसत आजादी के समय बहुत कम था, अब काफी सुधार हुआ है। पर आज भी अफ्रीकी देशों में 50 और 60 के बीच में औसत है। इसके विपरीत हांगकांग और जापान में यह औसत 84 के करीब है तथा अन्य विकसित देशों में भी 80 से अधिक है। यह औसत आयु निर्भर है हमारे शरीर का निर्माण करने वाली कोशिकाओं की आयु पर, जो पूर्व निर्धारित है। लेकिन ये कोशिकाएं रोगग्रसित हो जाने पर अकाल मौत का शिकार होती हैं और उन्हीं के साथ मरता है इंसान। बीमारी, बालमृत्यु, दुर्घटना आदि के कारण मनुष्य की अकाल मृत्यु होती है और देश के नागरिकों की औसत आयु घट जाती है।

डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ की हड़तालें आयुष्मान भारत की राह में बड़ी बाधाएं हैं।

आयुष्मान योजना का शुभारम्भ तो हो गया लेकिन इसे नेता लोग सफल नहीं बना पाएंगे। योजना की सफलता निर्भर करेगी अस्पतालों, डॉक्टरों, नर्सों, पैरामेडिकल स्टाफ और दवाई विक्रेताओं पर। डॉक्टर को भगवान के बाद दूसरा स्थान दिया जाता है और वे हिप्पोक्रेट के नाम पर शपथ भी लेते हैं मरीजों की रक्षा करने की। डॉक्टरों से इलाज कराने, या फिर बच्चे पैदा कराने वाले डॉक्टरों और नर्सों के पास महिलाएं बड़ी उम्मीद से आती हैं। उन्हें भर्ती किया जाता है और डॉक्टर तथा नर्सें हड़ताल पर चले जाते हैं तब उनमें से अनेक मरीज या जच्चा-बच्चा मर जाते हैं। आयुष्मान भारत योजना को कामयाब बनाना है तो डॉक्टरों की हड़ताल पर कड़ाई से प्रतिबंध लगाना चाहिए।

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आयुष्मान भारत योजना सामयिक और महत्वपूर्ण है लेकिन इसे सफल बनाने के लिए हमारी जीवन शैली संतुलित आहार, योगाभ्यास, आयुर्विज्ञान और अस्पतालों की बड़ी भूमिका रहेगी। इस योजना की नाकामी डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ की हड़तालों, दवाइयों की उपलब्धता और उनकी गुणवत्ता जैसे कारकों पर निर्भर करेगी।

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