सौंदर्य उत्पाद बाज़ार का नया ट्रेंड है फूड कॉस्मेटिक्स

सौंदर्य उत्पाद बाज़ार का नया ट्रेंड है फूड कॉस्मेटिक्सप्रतीकात्मक तस्वीर।

जिस क्रीम या तेल को आप अपनी त्वचा पर लगाते हैं, वो सीधे- सीधे आपके शरीर के अंदर प्रवेश कर जाते हैं। कई तरह की ऑटोप्सी अध्धयन से जानकारी मिलती है कि खनिज तेल हमारी त्वचा से अवशोषित होकर आंतरिक अंगों तक पहुंच जाते हैं। कई प्रमुख मॉईश्चरायजर ब्रांड्स तो शरीर में ट्युमर तक बना देते हैं, इस तरह की जानकारियां प्रयोगशालाओं में चूहों पर किए गए अध्धयनों से निकल कर आयी हैं। पेट्रोलियम से बने कॉस्मेटिक शरीर के घातक सिद्ध हो रहे हैं और ऐसे में "फ़ूड कॉस्मेटिक्स" यानि खाद्य पदार्थों से बने कॉस्मेटिक्स पर सारे विश्व बाजार की नजरे लगी हुयी हैं।

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शहरों में पढा लिखा तबका नई-नई जानकारियों को एकत्र करने में ज्यादा उत्सक होता है जबकि गाँवों में ज्यादातर कही सुनी बातों पर ही भरोसा किया जाता है। जब से पेट्रोलियम युक्त घातक रासायनिक कॉस्मेटिक्स पर चर्चा होने लगी है, शहरों का एक बड़ा तबका इस तरह के उत्पादों से दर किनार होता जा रहा है। कॉस्मेटिक उत्पादों ने ग्रामीण इलाकों में भी खूब पैर पसार लिया है, जानकारी के अभाव में आज भी खतरनाक रसायनोंयुक्त कई कॉस्मेटिक पदार्थ या उत्पाद बेधड़क ग्रामीण बाज़ारों में बिक रहें हैं।

फोटो इंटरनेट।

उदाहरण के तौर पर "पेराबेन" को ही ले लीजिए, पेराबेन्स अंत: स्त्रावी ग्रन्थियों (एण्डोक्राईन) की क्रियाविधि को प्रभावित करने वाला एक घातक रसायन तो है ही इसके अलावा यह मानव शरीर में पाए जाने वाले होर्मोन "एस्ट्रोजेन" की तरह कार्य करने की क्षमता रखता है। अब जानने लायक बात यह है कि एस्ट्रोजन महिलाओं में प्रजनन क्षमता के विकास के लिए महत्वपूर्ण है लेकिन इसकी संतुलित मात्रा ही विकास में सहायक होती है लेकिन किन्ही वजहों से इसकी सक्रियता ज्यादा हो जाए तो यह जानलेवा भी हो सकती है।

पेराबेन्स ऐसे पेट्रोकेमिकल कम्पाउण्ड हैं जो एस्ट्रोजन की तरह होते हैं और जब इन्हे महिलाएं शरीर पर लगाती हैं तो यह शरीर के भीतर जाकर एस्ट्रोजन की तरह सक्रिय होकर घातक स्वरूप ले लेते हैं। महिलाओं में एस्ट्रोजन हार्मोन का जो सामान्य लेवल होता है उसके 10 लाख गुना ज्यादा लेवल पेराबेन्स का होता है, इसके घातक परिणामों की कल्पना भी करना कठिन है। कैंसर से लेकर कई जानलेवा बीमारियों की वजह यही पेराबेन्स हो सकते हैं।

जब हम पेट्रोकेमिकल्स युक्त कॉस्मेटिक्स को अपनी त्वचा पर लगाते हैं तब ये हमारे लसीका और रक्त परिवहन तंत्र से होते हुए सीधे आंतरिक अंगों और वसाओं के साथ मिल जाते हैं। जब कोई पदार्थ हम सेवन करते हैं तो हमारे शरीर के भीतर यकृत नामक पहरेदार इनकी खोज परख करता है लेकिन त्वचा मार्ग से शरीर में प्रवेश होने वाले इस तरह के रसायनों के लिए किसी तरह के पहरेदार की व्यवस्था शरीर में नहीं है, यानि इस बात से निष्कर्ष निकाल लिया जाना चाहिए कि जिस वस्तु को हम खा नहीं सकते उसे त्वचा पर लगाने से दुष्परिणाम भी हो सकते हैं।

सन 2009 में जर्नल ऑफ इन्वेस्टिगेटिव डर्मेटोलोजी में एक रोचक शोध पत्र प्रस्तुत किया गया जिसमें बाज़ार के बड़े बड़े ब्राण्ड्स के कॉस्मेटिक्स को UVB से उपचारित चूहों पर लगाकर इनमें ट्युमर बनने की समयावधि पर परिणाम प्रकाशित किए गए। डर्माबेस, डर्मोवेन, यूसेरिन और वेनिक्रीम जैसे बड़े-बड़े यूरोपियन ब्रांड्स के कॉस्मेटिक्स चूहों में ट्युमर की संख्या और ट्युमर बनने को क्रम में इजाफा करते दिखायी दिये। लोग अक्सर सोचते हैं कि स्थानिय उत्पाद या कम प्रचलित ब्रांड्स ही सेहत से खिलवाड़ कर सकते हैं लेकिन सोच गलत है।

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कई बड़े ब्रांड्स के उत्पाद भी सुरक्षा के नाम पर खरे नहीं उतरे हैं, ये 2009 की रिपोर्ट देखकर भी अंदाजा लगाया जा सकता है। एक सेमीनार में मेरी इसी बात का पुरजोर विरोध हुआ, वहां मुझसे पूछा गया कि मनुष्य कोई चूहा थोड़े है, मनुष्यों की प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा है, इस तरह के रसायनों से मनुष्य जाति को कोई खतरा नहीं है। मैनें सिर्फ एक ही बात में बहस खतम कर दी कि "क्या हमें हजारों करोड़ रूपये खर्च करके अब ये पता करना है कि पेराबेन जैसे रसायनों के क्या घातक परिणाम मनुष्यों में दिखायी देंगे, वो भी पूरे पचास साल बाद?" क्या हम चूहों पर किए गए अध्धयन और उससे निकले परिणामों से जरा भी नहीं डर रहे? यदि इसके बावजूद भी कोर्पोरेट्स का दबाव और लोगों में अज्ञानता का भाव होगा तो प्रोड्क्ट हर घर में दिखायी देगा।"

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पेट्रोकेमिकल्स के घातक परिणामों को लेकर एक और शोध की गयी थी जिसमें यह देखा गया कि पेराबेन जैसे घातक रसायन आखिर कर क्या सकते हैं? इस शोध में ऑटोप्सी रिपोर्ट तैयार की गयी, इसमें बताया गया कि पेट्रोकेमिकलयुक्त पदार्थों को त्वचा पर लगाने वाले कुल व्यक्तियों में यकृत में 48%, स्पलीन (तिल्ली) में 46% "लाईपोग्रेनुलोमा" के लक्षण दिखायी दिये, कुल मिलाकर इस पूरी शोध में 465 ऑटोप्सी रिपोर्ट्स पर अध्धयन हुआ था। लाईपोग्रेनुलोमा कोशिकाओं और ऊतकों में विदेशी रसायनों और तैलिय पदार्थों के जमावड़ा होने के बाद बनी संरचना है जो आगे चलकर घातक कैंसर में भी तब्दील हो सकती है।

इतनी गहरायी से इस मुद्दे को इस लेख में लेने का तात्पर्य ये नहीं कि आप सब को डरा दिया जाए बल्कि उद्देश्य यह है कि हम ये समझ पाएं कि हम क्यों कृत्रिम रसायनों की तरफ दौड़ लगाएं जबकि हमें प्रकृति ने ही सारे संसाधन उपलब्ध करा रखे हैं, हम क्यों बाज़ार का रूख करने को बेताब हैं? आज हम पेट्रोकेमिकलयुक्त उत्पादों के समुंदर में खुद को डुबो चुके हैं और आहिस्ता-आहिस्ता शरीर को जहरीला बनाए जा रहे हैं। पेट्रोलियम के नाम से खौफ खाना जरूरी है क्योकिं ये हर जगह, हर तरफ है। कार पेट्रोलियम से चल रही, सब्जियों और फलों पर पेट्रोलियम पदार्थों से कोटिंग करके चमक लायी जा रही है, कीटनाशकों से लेकर खाद तक सारे एग्रीकेमिकल्स का उदगम पेट्रोकेमिकल्स से ही हुआ है।

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इन सब के बावजूद हम काफी हद तक अपने आप को सुरक्षित करने की कवायद कर सकते हैं। कम से कम कॉस्मेटिक्स की बात आए तो पेट्रोकेमिकलयुक्त ब्राण्ड्स को अलग फेंककर स्वदेशी ज्ञान पर भरोसा किया जा सकता है। चलिए आज नारियल और नारियल के तेल की ही बात करें और जानें कि इसकी मदद से किस तरह हम पेट्रोकेमिकल्सयुक्त कॉस्मेटिक्स को दूर रख सकते हैं या उनके दुष्प्रभावों से बच सकते हैं।

शुष्क त्वचा यानि ड्राय स्किन के लिए नारियल किसी भी खनिज तेल से बेहतर है। सन २००४ में एक शोध किया गया जिसमें खनिज तेल और नारियल तेल के बीच एक तुलनात्मक अध्धयन करके जानकारी दी गयी कि नारियल तेल शुष्क त्वचा को नर्म और मुलायम बनाने के लिए किसी भी खनिज तेल से बेहतर है। "डर्माटायटिस" नामक विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित इस रपट में नारियल तेल के क्लिनिकल गुणों को बेजा सराहा गया। इस शोध रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि नारियल का तेल सिर के बालों के झड़ने के क्रम को रोकने में बेहद मददगार होता है। नारियल का तेल खोपड़ी में किसी भी तरह के फफूंदों के संक्रमण से बचाता है।

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आधुनिक विज्ञान के एक अति प्रचलित और मान्य जर्नल "मायकोसेस" में प्रकाशित एक शोध रपट में हिन्दुस्तान में आम तौर पर उपयोग में लाए जाने वाले तेलों पर एक अध्धयन किया गया और पाया गया कि नारियल का तेल कई तरह के फफूंदों का सर पर संक्रमण रोकता है, इसके अलावा नारियल तेल लगाने वालों के सिर में जूं होने की संभावनाएं भी कम होती है। सन २०१० में "यूरोपियन जर्नल ऑफ पेडियाट्रिक्स" की एक शोध रपट पर गौर करें तो जानकारी मिलती है कि नारियल तेल के साथ अनसफल (स्टार एनिस) मिलाकर बच्चों के बालों में लगाएं तो जूं मर जाते हैं और सिर की त्वचा, बालों या आंतरिक कोशिकाओं पर किसी तरह का नुकसान नही होता है।

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नारियल के तेल में नींबू का रस मिलाकर सिर में मालिश करने से रूसी से छुटकारा मिलता है और बाल स्वस्थ और लंबे होते हैं। माना जाता है कि लगातार नारियल का तेल लगाते रहने से बालों के झड़ने का सिलसिला भी थम जाता है और गंजापन जैसी समस्याओं के लिए भी नारियल तेल बेहद कारगर साबित हुआ है। नारियल तेल में जैतून का तेल मिलाकर खाज खुजली होने पर त्वचा पर लगाया जाए तो यह जबरदस्त एंटीमायक्रोबियल की तरह कार्य करता है और अतिशीघ्र समस्या से निजात दिलाता है। नारियल के तेल में एंटी एजिंग गुण भी होते हैं, यानी नारियल का तेल लगाने से त्वचा पर असमय झुर्रियां नहीं आती हैं, त्वचा में निखार आता जाता है। यह एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होता है और त्वचा से विषैले पदार्थों को दूर करने में सहायक है।

नारियल का तेल बालों के लिए भी बढ़िया होता है। इसके अलावा 2 चम्मच नारियल का तेल ले लिया जाए और इसमें एक चम्मच शहद और १ चम्मच संतरे का रस भी लेकर मिला लें और इसे रुखी, फटी हुई त्वचा पर लगाएं। जब यह सूख जाए तो कुनकुने पानी से इसे साफ करके पुन: नारियल तेल लेपित कर दिया जाए, जल्द आराम मिल जाता है। नारियल के कई पारंपरिक नुस्खे अक्सर हम सब ने अपने परिवार के बुजुर्गों से सुने नहीं होंगे लेकिन कई तरह के नखरे मारते हुए हम इसे नकार जाते हैं, उम्मीद है इस लेख में जिक्र में आए गुणों को जानकार आप सभी नारियल के तेल की पैरवी करने लगेंगे।

हमारे इर्दगिर्द ही अनेक पेड़-पौधे और उनके फल इत्यादि उपलब्ध हैं जिनका उपयोग कर हम अपने स्वास्थय को बेहतर बना सकते हैं। अब वो दौर आ चुका है जब कृत्रिम रसायनयुक्त दवाओं के प्रतिकूल प्रभावों को लोग समझने लगे हैं और अपने तमाम रोगों के बेहतर इलाज के लिए प्राकृतिक उत्पादों की तरफ रुझान दिखाने लगे हैं। हिन्दुस्तानी पारंपरिक ज्ञान सदियों पुराना ऐसा खजाना है जिसे अब तक हमने सही तरह से अपनाया नहीं हैं। आदिवासी अंचलों में आज भी लोग अपने परिवेश में पाए जाने वाले पौधों से अपने रोगों का निदान करते है। अब वक्त आ गया है जब हम पुन: अपने पारंपरिक ज्ञान की ओर रूख करें और इसे पूरे दम खम से प्रमाणित कर प्रचारित और प्रसारित भी करें।

(लेखक गाँव कनेक्शन के कंसल्टिंग एडिटर हैं और हर्बल जानकार व वैज्ञानिक भी।)

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