पानी की एक-एक बूंद बचाना सीखें रेगिस्तान के बाशिंदों से

मनीषा कुलश्रेष्ठ हिंदी की लोकप्रिय कथाकार हैं। गांव कनेक्शन में उनका यह कॉलम अपनी जड़ों से दोबारा जुड़ने की उनकी कोशिश है। अपने इस कॉलम में वह गांवों की बातें, उत्सवधर्मिता, पर्यावरण, महिलाओं के अधिकार और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा करेंगी।

पानी की एक-एक बूंद बचाना सीखें रेगिस्तान के बाशिंदों से

आपको सबसे पहले मैंने बताया था, मेरा गांव कनेक्शन पुराना है। मेरी कहानियां जिस लोक से उपजती हैं, वह है राजस्थान। मेरा जन्म मरूस्थल यानि जोधपुर में हुआ। बचपन भी वहीं से लगे गांवों में बीता।

मरूस्थल, रेगिस्तान शब्द आते ही हमारे ज़हन में तस्वीर आती है दूर तक फैला रेत का लहरदार सैलाब, आसमान को छूते रेत के ऊंचे-ऊंचे टीले, चिलचिलाती गर्मी, धूल भरी आंधी और ऊंटों का लंबा कारवां। ऐसे गर्म रेगिस्तान में दिन के समय बहुत गर्मी (तापमान 49 डिग्री सेल्सियस तक) होती है और रात को काफी ठंड होती है।

मरुस्थल का मतलब है मृत्यु इलाका- जहां प्यास लोगों, जानवरों और पौधों को मार सकती है। पानी की भंयकर कमी के समय अगर लोग और जानवर यहां से कूच न कर जाएं तो उन्हें मृत्यु का सामना करना पड़ सकता है। अपने भारत के मरुस्थल का नाम 'थार' है। आपने यह नाम जरूर सुना होगा, जो राजस्थान, गुजरात और पंजाब राज्य में फैला हुआ है।

हां, तो जब मैं छोटी बच्ची थी, 1970 की शुरुआत में तब वहां नल वगैरह भी न होते थे। तब वहां गंग नहर नहीं पहुंची थी इसलिए वीरान क्षेत्रों में कोई उपयोगी पेड-पौधे पनप नहीं पाते थे खेती तो दूर की बात। छोटी-छोटी घास या कैक्टस जैसे कंटीले पौधे और झाड़ियां ही अधिक मिलते थे। हां, खेजड़ी के पीले फूलों वाले दरख़्त कहीं कहीं दिख जाते थे। पानी की भीषण क़िल्लत थी। तमाम खारे कुओं में कोई एकाध मीठे पानी का कुआं होता था। कुएं से पानी भरने के लिए एक काकी आया करती थीं। क्योंकि मां तो लड़कियों के सरकारी हाई स्कूल में हेडमिस्ट्रेस थीं। बड़ा सम्मान होता था तब अध्यापकों का।


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मैं तब छोटी सी थी। पानी फैलाने पर एक चपत पड़ा करता था। रेतीला इलाक़ा, खुश्क़। पानी खुला छोड़ दो तो पानी किरकिराने लगे। खाना खुला छोड़ दो तो खाने में रेत। कपड़े मैले नहीं होते रेत से, धूल से होते हैं। सो रोज़मर्रा में स्कूल की वर्दी को केवल पसीने वाली जगहों से धोकर काम चला लिया जाता। पानी बहुत एहतियात से बरता जाता था। बर्तन सूखी राख से मले जाते। पानी की एक बूंद न लगती। हां खाने से पहले उन्हें गीले कपड़े से पोंछ लेते।

एक कस्बे कुचामन में जहां मैंने पहली बार कलम और पट्टी पकड़ी, वह मारवाड़ी सेठों का कस्बा था। पैसा था कस्बे में, पानी कम। पहली बार मैंने देखा वहां बरसात के पानी का संरक्षण देसी ढंग से किया जाता था। कई घरों में बीच के आंगन में पक्के टांके (टंकी) होते हैं जिनमें बरसात का पानी इकट्ठा हो जाता है। छत से बहने वाले पानी का निकास ऐसा बनाया जाता है कि पानी टांके में ही गिरे। फिर महीनों तक इस पानी को बहुत बचा-बचा के इस्तेमाल किया जाता है। इस पानी से मनुष्य का काम भी चलता है और जानवरों का भी। जब भी कभी बरसात मेहरबान होती पानी भर कर रख लिया जाता और कठिनाई भरे, सूखे के दिनों में इस्तेमाल होता। क्योंकि मरुस्थल में कई-कई किलोमीटर चल कर पानी लाना होता है। यही वजह है कि वहां पानी हर संभव तरीके से बचाया जाता है। आज भी रेगिस्तानी इलाकों में पानी को बरतने के जो तरीके हैं, वे सीखने लायक हैं।

बरतनों का तो मैंने बताया राख या रेत की रगड़ से से चमाचम माँज कर रख देते हैं। कई जगह लोग चारपाई पर बैठकर नहाते हैं और चारपाई के नीचे रखे एक बरतन में इस पानी को इकट्ठा कर लेते हैं। यह पानी घर साफ करने व जानवरों को पिलाने के काम में आ जाता है।

रेतीले मैदान में यहां-वहां पाए जाने वाले गड्ढों या तालाबों में भी बरसात का पानी इकट्ठा होता है। इन छोटे तालाबों का पानी धीरे-धीरे चारों तरफ रिसता रहता है। यह रिसता हुआ पानी बेकार न चला जाए, इसके लिए लोग तालाब के चारों तरफ 25-30 फीट गहरी कुंइयां या बेरियां खोदते हैं। तालाब से रिसता पानी इन कुंइयों में इकट्ठा होता रहता है। जब महीनों बाद तालाब का पानी खत्म हो जाता है तब भी लोगों को अपनी कुंइयों में पानी मिल जाता है।

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जहां तालाब व गड्ढे नहीं होते हैं, वहां लोग खुद आसपास की ढाल को देखते हुए जमीन खोदकर पक्की कुंइयां और कुंड बनाते हैं ताकि चारों तरफ गिरा बरसात का पानी इनमें इकट्ठा होता जाए। बरसात के पानी को इकट्ठा करके रखने के ये इंतजाम बहुत जरूरी हैं क्योंकि मरुस्थल में भूजल बहुत नीचे मिलता है। कुंओं में बहुत नीचे व बहुत कम पानी मिलता है। कई कुंओं का पानी खारा होता है।

सारे इंतजामों के बावजूद कई गांवों में लोगों को मीलों चल कर पानी लाना पड़ता है। कहीं औरतें मीलों तक सिर पर घड़े उठाए चलती हैं, तो कहीं ऊंट और गधों पर घड़े लाद के लाए जाते हैं।

आजकल रेगिस्तानी इलाकों में ड्रिप इरीगेशन यानि पौधों की जड़ों में संतुलित मात्रा में बूंद-बूंद पानी पहुंचा कर कम पानी में खेती की जा रही है। क्योंकि जब हम पाईप या ट्यूब वैल से पानी देते हैं तो बहुत सा पानी बेकार जाता है।

मैं ऐसे इलाके में जन्मी और बड़ी हुई हूं, यही वजह है कि पानी जब बेकार होते देखती हूं, एक हूक उठती है। हम रेगिस्तानी जीवन से पानी बचाने के तरीक़ों को सीख सकते हैं।

(मनीषा कुलश्रेष्ठ हिंदी की लोकप्रिय कथाकार हैं। इनका जन्म और शिक्षा राजस्थान में हुई। फौजी परिवेश ने इन्हें यायावरी दी और यायावरी ने विशद अनुभव। अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों, सम्मानों, फैलोशिप्स से सम्मानित मनीषा के सात कहानी कहानी संग्रह और चार उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। मनीषा आज कल संस्कृति विभाग की सीनियर फैलो हैं और ' मेघदूत की राह पर' यात्रावृत्तांत लिख रही हैं। उनकी कहानियां और उपन्यास रूसी, डच, अंग्रेज़ी में अनूदित हो चुके हैं।)

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