अब जंगल से लकड़ियां बीनने नहीं, हर दिन स्कूल जाते हैं बच्चे

Chandrakant MishraChandrakant Mishra   5 Oct 2018 7:43 AM GMT

श्रावस्ती। पूर्व माध्यमिक विद्यालय रनियापुर के प्रधानाध्यापक और सहायक अध्यापक उन शिक्षकों के लिए नजीर हैं, जो प्राथमिक शिक्षा की बदहाली के लिए व्यवस्था को दोष देते हैं। यहां पर तैनात अध्यापकों की मेहनत से आदिवासी बाहुल्य इस गांव के बच्चे शिक्षा के महत्व को समझने लगे हैं। वे अपना भविष्य बनना चाहते हैं, कोई इंजीनियर बनना चाहता है तो कोई डॉक्टर बनकर देश की सेवा करना चाहता है।

श्रावस्ती जिले के विकासखंड सिरसिया का गाँव रनियापुर आदिवासी बाहुल्य है। यहां पर थारू जनजाति के लोग रहते हैं। जंगलों के बीच बसा यह गांव प्रदेश के सबसे पिछड़े गाँवों में से एक है। गाँव के ज्यादातर लोग अशिक्षित हैं, लेकिन उनके बच्चे अब शिक्षित हो रहे हैं।

ये भी पढ़ें : इस गांव के बच्चों ने खेतों में काम छोड़ पकड़ी स्कूल की राह


पूर्व माध्यमिक विद्यालय रनियापुर के प्रधानाध्यापक राम करतार बताते हैं, "आदिवासी बाहुल्य इस गाँव के बच्चे बेहद प्रतिभावान हैं। उनमें सीखने की ललक है। बच्चों में प्रतिभा के बावजूद उनके माता-पिता पहले स्कूल नहीं भेजते थे। ये बात मेरे और विद्यालय के लिए काफी चिंताजनक थी। मैंने गाँव वालों को शिक्षा के महत्व को बताया। मेरे इस काम में एसएमसी सदस्यों और प्रधान ने भी काफी सहयोग किया। अब स्कूल में 114 बच्चे पंजीकृत हैं।"

वहीं स्कूल में नियुक्त सहायक अध्यापक जनार्दन यादव ने बताया, "हम जब यहां आए तो ज्यादातर बच्चे गणित, विज्ञान और अंग्रेजी से परिचित नहीं थे। हमने उन्हें इन विषयों को पढ़ाने के लिए काफी मेहनत की। अब बच्चों की इन विषयों में खासी दिलचस्पी रहती है।"

ये भी पढ़ें : पढ़ाई संग खेलकूद में भी अव्वल हैं इस स्कूल के बच्चे

सामान्य ज्ञान बढ़ाने में रहता है जोर

विद्यालय में कक्षा छह से आठ तक की पढ़ाई होती है। प्रतिदिन सुबह स्कूल में प्रार्थना के साथ व्यायाम और योग कराया जाता है। छात्रों को समाज में आदर्श विद्यार्थियों के रूप में स्थापित करने के लिए शिक्षा के साथ संस्कारों का पाठ भी पढ़ाया जाता है। अंग्रेजी और गणित पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इसके साथ-साथ परिवार, समाज, देश सेवा की बातें उनके जेहन तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है। सामान्य ज्ञान के लिए देश-दुनिया की जानकारी दी जाती है। महापुरुषों और देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंडल, जिला, तहसील, ब्लॉक की जानकारी दी जाती है। यही कारण है कि बच्चों का सामान्य ज्ञान अन्य स्कूलों के छात्रों से बेहतर है।

गाँव के ज्यादातर लोग हैं अशिक्षित


इस विद्यालय की तस्वीर बदलने में गांव के युवा प्रधान राम जी की अहम भूमिका रही। राम जी 12वीं पास हैं इसलिए उन्हें शिक्षा का महत्व पता है। राम जी ने बताया, 'बच्चों के माता-पिता अशिक्षित थे। उन्हें समझाया गया। उन्हें सरकार से मिलने वाली तमाम योजनाओं के बारे में बताया गया। तब जाकर लोग बच्चों को स्कूल भेजने लगे। मैं चाहता हूं कि आदिवासियों के प्रति लोगों का जो नजरिया बदले। हमारे गांव के बच्चे अब पढ़ने लगे हैं। वे हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी और गणित भी पढ़ते हैं।'

ये भी पढ़ें : टीचर कम हैं तो क्या हुआ… पढ़ाई न रुकेगी

स्कूल भेजने की जगह ले जाते थे जंगल

एसएमसी अध्यक्ष नंदूराम ने बताया, "हमारा गाँव जंगलों से घिरा है। यहां के लोग सुबह जंगलों में लकड़ी बीनने चले जाते हैं। लकड़ी लाने के लिए वे अपने बच्चों को भी साथ ले जाते थे। इससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती थी। कई बच्चे पढ़ना भी चाहते थे, लेकिन उनके अभिभावक उन्हें स्कूल नहीं भेजते थे। मैं ऐसे लोगों के पास जाता और उन्हें पढ़ाई का महत्व बताता। उनसे कहता कि, अगर अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजोगे तो आपका बच्चा जंगलों से लकड़ी ही बीनता रह जाएगा। उसके जीवन में कुछ अच्छा नहीं हो पाएगा। लोगों को मेरी बात धीरे-धीरे समझ में आने लगी। अब गांव का हर बच्चा स्कूल जाता है।"

डॉक्टर-इंजीनियर बनना है चाहत

शिक्षा की अहमियत यहां लोगों और बच्चों को समझ में आने लगी है। गांव के बच्चों में से कोई डाक्टर तो कोई इंजीनियर बनना चाहता है। सातवीं में पढ़ने वाले अरविंद ने बताया, "मैं बड़ा होकर डॉक्टर बनना चाहता हूं, क्योंकि हमारे क्षेत्र में अस्पताल बहुत कम हैं। मैं चाहता हूं कि गांव के लोगों को इलाज के लिए शहर न जाना पड़े।"

ये भी पढ़ें : युवा अध्यापकों के आने से प्राथमिक विद्यालयों पर बढ़ रहा है लोगों का विश्वास

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Share it
Top