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हस्तशिल्प सप्ताह : विदेशों में लुभा रहे बनारस में बने लकड़ी के खिलौने

Karan Pal SinghKaran Pal Singh   12 Dec 2017 9:02 PM GMT

हस्तशिल्प सप्ताह : विदेशों में लुभा रहे बनारस में बने लकड़ी के खिलौनेलकड़ी का खिलौना

अखिल भारतीय हस्तशिल्प सप्ताह 8 दिसम्बर से 14 दिसम्बर को पूरे भारत में मनाया जाता है। ये देश के सभी राज्यों में लोगों के बीच हस्तशिल्प के बारे में समाज में जागरुकता, सहयोग और इसके महत्व को बढ़ाने के लिये बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।

लखनऊ। धर्म, संस्कृति, संगीत, साहित्य व कला की नगरी काशी की हर चीज निराली और अद्भुत है। ऐसी ही काष्ठ कला यानी लकड़ी के खिलौने का कारोबार। बनारस में बने लकड़ी के खिलौनों और इंटीरियर उत्पाद विदेशी ग्राहकों को भी लुभा रहे हैं। काष्ठ कला ने दुनिया में बनारस को एक अलग पहचान दी है। जीआई (जियोग्राफिकल इंडीकेशन) टैग मिलने के बाद लकड़ी के कारोबार में 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

वाराणसी के कश्मीरीगंज, खोजवां इलाके लकड़ी के खिलौनों के खास अड्डे हैं। यहां कारीगर बेजान लकड़ी को तराशकर खूबसूरत शक्ल में ढालते हैं, जो देश-विदेश में सजाई जाती हैं। बेजान लकडिय़ों मूर्त रूप देने वाले कारीगर विजय कुमार (58 वर्ष) को यह हुनर अपने पूर्वजों से मिला है। वह तीसरी पीढ़ी से हैं, जो इस हुनर में पारंगत हैं। विजय बताते हैं, "पिछले कुछ सालों से इस व्यवसाय पर संकट के बादल मंडरा रहे थें, लेकिन अब संकट के बादल छट गए हैं। पहले हम कारीगर लकड़ी के बने सामानों को बनारस के ही बाजार में इधर-उधर बेंचते थें, लेकिन अब हम लोगों को लकड़ियों के खिलौने व सामान बनाने का आर्डर मिलता है जो ज्यादातर विदेशों में जाता है।"

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राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त रामेश्वर सिंह कारोबारी बताते हैं, "गरीब-गुरबा आबादी की रोजी-रोटी का सबसे बड़ा जरिया है कुटीर उद्योग, लेकिन इसकी दशा पांच वर्ष पहले तक बेहद खराब रही। कच्चा माल खरीदने को धन के संकट के साथ-साथ बाजार भी बिचौलियों के हवाले होता था। इन्हीं परिस्थितियों से जूझ कर इन कुटीर श्रेणी के उद्योगों से जुड़े लोग पुश्तैनी व परंपरागत काम छोड़ दूसरे काम की ओर पलायन करने को विवश थे। मगर जीआई का तमगा मिलने के बाद उद्योग को पंख लग गए। कारोबार का ग्राफ 30 प्रतिशत बढ़ा है। अब ऑनलाइन माध्यम से विदेशों से हमारे पास मांग आती है जो हम लोगों और इस उद्योग के लिए काफी अच्छा है।"

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इंटरनेट से जुड़कर उद्योग को लगे पंख

संचार क्रांति ने बनारस के डूबते काष्ठ व्यवसाय को आक्सीजन दिया है। बाजार में अपने आस्तित्व के लिए संघर्षरत काष्ठ खिलौना उद्योग को अब नवजीवन मिल गया है। यह संजीवनी कुछ और नहीं बल्कि इंटरनेट ने प्रदान की है। बाजार के लिए तरस रहे बनारस के खिलौनों ने अब इंटरनेट के माध्यम से दुनिया में रंग जमाना शुरू कर दिया है। थोक कारोबारियों के आर्डर पर काम करने वाले इस विद्या से जुड़े कारीगरों की अंगुलियां अब कंप्यूटर बोर्ड पर तेजी से चल रही हैं। इंटरनेट के जरिए अपने उत्पाद को यह दुनिया के सामने प्रदर्शित कर कारोबार को नया आयाम दे रहे हैं।

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खिलौनों के साथ-साथ इंटीरियर उत्पाद भी लुभा रहे ग्राहकों को

बदलते समय के साथ डिजाइन और स्वरूप बदलने से बनारस लकड़ी उत्पादों के व्यवसाय को नई ऊंचाई मिलने लगी है। बनारस में बने लकड़ी के खिलौनों और इंटीरियर उत्पाद विदेशी ग्राहकों को भी लुभा रहे हैं। अब शिल्पियों ने लकड़ी के पारंपरिक खिलौने बनाने की बजाय उनके रंग-रूप में काफी बदलाव किए हैं। अब यह कारोबार खिलौने तक ही सीमित नहीं रहा। लकड़ी से घर की साज-सज्जा के खूबसूरत उत्पाद भी तैयार किए जा रहे हैं। यही कारण है कि अब बनारस में बने लकड़ी के खिलौनों और इंटीरियर उत्पाद विदेशी ग्राहकों को भी अपनी ओर खींच रहे हैं।

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जीआई टैग मिलने से बढ़ा करोबार

काष्ठ कारोबारी प्रकाश चंद्र विश्वकर्मा बताते हैं, "बनारस में बने लकड़ी के खिलौने अमेरिका, जर्मनी और खाड़ी के देशों में खूब पसंद किए रहे हैं। परंपरागत खिलौनों के निर्माण के चलते यह व्यवसाय धीरे-धीरे अपनी पहचान खो रहा था। जीआई पंजीकरण (जियोग्राफिकल इंडीकेशन) होने और शिल्पियों को प्रोत्साहन मिलने से इस व्यवसाय में फिर तेजी आई है।"

भगवान की मूर्तियों, शतरंज की रहती है भारी मांग

प्रकाश चंद्र विश्वकर्मा बताते हैं, "लकड़ी से तैयार मूर्तियां भी खासी पसंद की जा रही हैं। गणेश, शिव, पंचमुखी गणेश, पंचमुखी हनुमान, विश्वकर्मा की आकर्षक मूर्तियां तैयार की जा रही हैं। शतरंज के मोहरें, भगवान बुद्ध की प्रतिमा की भी काफी मांग है। ये मूर्तियां त्योहारों के दौरान पूजन के लिए भी खरीदी जा रही हैं।"

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कश्मीरीगंज प्रमुख केंद्र

बनारस का कश्मीरीगंज लकड़ी के खिलौने बनाने का प्रमुख केंद्र माना जाता है। लकड़ी के खिलौने बनाने वाली खराद की मशीनें नवापुरा, जगतगंज, बड़ागॉव, हरहुआ, लक्सा, दारानगर में भी चलती है। लगभग 2 हजार शिल्पियों द्वारा अत्यंत प्राचीन काल से जंगली लकड़ी ‘‘कोरैया’’ की लकड़ी से विविध प्रकार के खिलौने तैयार किए जाते है। देवी-देवताओं की मूर्तियां, हस्तनिर्मित औजारों, से बनाने की परंपरा है।

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