जीएसटी ने तोड़ी बुनकरों की कमर , गरीबों की दरी पर अमीरों की कार्पेट वाला टैक्स, हड़ताल

जीएसटी ने तोड़ी बुनकरों की कमर ,  गरीबों की दरी पर अमीरों की कार्पेट वाला टैक्स, हड़तालफोटो साभार: HEPCIndia

लखनऊ। जीएसटी का असर छोटे उद्योगों पर दिखाई देने लगा है। कपड़ा और फर्नीचर व्यापारी पहले से ही अलग-अलग जगहों पर हड़ताल पर हैं और अब हैंडलूम दरी बुनकरों और कर्मचारियों ने भी विरोध शुरू कर दिया है। उद्योग से जुड़े लोगों का आरोप है कि सरकार ने गरीबों की दरी पर वही टैक्स लगा दिया है जो बड़े लोगों की कार्पेट पर लगता है। सरकार ने दरी पर 0 फीसदी से बढ़ाकर उसे 12 फीसदी टैक्स स्लैब में रखा है।

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बरेली के व्यापारियों और बुनकरों का कहना है कि जीएसटी में दरी को लग्जरी कार्पेट वाले स्लैब में रखना पूरी तरह अनुचित है। इस वजह से जीएसटी लागू होने के बाद माल की बिक्री नहीं हो रही है। उत्तर प्रदेश हथकरघा दरी बुनकर उद्योग संघ के अध्यक्ष अशोक कुमार अग्रवाल ने बताया, ‘दरी तो लग्जरी आइटम में नहीं आती, गरीबों के इस्तेमाल की चीज है। फिर सरकार ने इस पर 12 फीसदी टैक्स क्यों लगाया? पहले इस पर एक्साइज, राज्य और केंद्र किसी तरह का टैक्स नहीं लगता था। इस वजह से व्यापारी और बुनकर वर्ग हड़ताल पर है और हमारा प्रोडक्शन पूरी तरह ठप है।’ वह आगे बताते हैं कि हम इस मुद्दे पर केंद्रीय राज्य मंत्री संतोष गंगवार को कई बार ज्ञापन दे चुके हैं लेकिन वे हर बार मामले को टाल रहे हैं।

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कारीगर हो रहे बेरोजगार

अशोक कहते हैं, ‘सरकार को अगर टैक्स लगाना ही था तो निकटतम पांच फीसदी कर लगाते। 12 फीसदी महंगे उत्पाद को ग्राहक खरीदने से इंकार कर रहे हैं और व्यापारियों के साथ बुनकरों व उनके परिवार का भी काफी नुकसान हो रहा है।’ हैंडलूम दरी का गढ़ माने जाने वाले बरेली, सीतापुर, आगरा, फतेहपुर सीकरी, कानपुर, हाथरस, गोरखपुर में काम बंद होने से कई कारीगर बेरोजगार हो गए हैं।

एक दरी बनाने में लगते हैं चार से पांच लोग

संघ अध्यक्ष के अनुसार, ‘इस समय बरेली में कम से कम 4000 से 5000 दरी बुनकर हैं। वहीं इनके साथ महिलाएं भी हेल्पिंग कर्मचारी के रूप में काम करती हैं। एक दरी बनाने के लिए पांच कर्मचारी काम करते हैं। इससे उनके परिवार पर बुरा असर पड़ रहा है और सरकार को ये दिखाई नहीं दे रहा है।’

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