गोरखपुर का एक गाँव, जहाँ हर घर में इंसेफ़्लाइटिस ने जान ली है

Deepanshu MishraDeepanshu Mishra   14 Aug 2017 10:20 AM GMT

गोरखपुर का एक गाँव, जहाँ हर घर में इंसेफ़्लाइटिस ने जान ली हैगोरखपुर के गाँव मानबेला में कुछ घरों में बने हैं कच्चे शौचालय। 

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

मानबेला (गोरखपुर)। पच्चीस हजार की आबादी वाला एक गाँव ज्यादातर घरों में कोई न कोई इन्सेफ्लाइटिस से पीड़ित ही रहा है। दु:ख की बात ये भी है जिसे एक बार यह बीमारी हुई, वह बचा नहीं।गोरखपुर शहर से मात्र आठ किमी दूर मानबेला खास गाँव में रहने वाले शमसेर अली (24 वर्ष) बताते हैं, “गाँव में लगभग हर घर में यह बीमारी फैली है। ये बीमारी जिसे भी हुई है, वो बचा नहीं।” इसका मुख्य कारण गाँव में गंदगी का होना है।

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पूरे गाँव में मात्र 10 प्रतिशत घरों में शौचालय बने हैं। बाकी लोग खुले में शौच जाते हैं। इंसेफ्लाइटिस के उन्मूलन की लड़ाई लड़ रहे डॉ. आरएन सिंह कहते हैं, “जब तक गाँवों का समग्र विकास नहीं होगा, इंसेफ्लाइटिस विकराल बना रहेगा।” वह आगे कहते हैं, “इसके लिए जरूरी है मेडिकल की सुविधाओं को बढ़ाने के साथ ही जनजागरुकता का अभियान चलाया जाए।”

मानबेला गाँव में रहने वाली महिला शदरू निशां ने बताया, “हमारे पोते शहनवाज (6 वर्ष) को आज से तीन साल पहले ये बीमारी हुई थी, शहनवाज को तेज बुखार आया था, उसके बाद उसे निजी क्लीनिक में दिखाया। उन्होंने शहनवाज को मेडिकल कॉलेज ले जाने की बात कही और उसका इलाज़ 19 दिन चला और उसके बाद उसकी मौत हो गई।”बीआरडी मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. देवराज यादव ने बताया, “जेई काफी तेजी से फ़ैल रही थी, लेकिन अब वैक्सीन का प्रयोग होने के कारण इसमें काफी कमी पाई गई है।”

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लगभग छह वर्ष पहले दिमागी बुखार से अपनी बच्ची को खोने वाली आमिना ख़ातून (35 वर्ष) बताती हैं, “मेरी बच्ची उस समय मात्र ढाई साल की ही थी। उस समय हम अपने मायके देवरिया में थीं। एक दिन मेरी बच्ची को तेज़ बुखार आया। हमने वहां पर एक डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने कहा इन्हें मेडिकल कॉलेज ले जाओ। हम अपनी बच्ची को लेकर मेडिकल कॉलेज आ गए, जहां पर उसका इलाज 5 दिन चला और बाद में उसकी मौत हो गई।”

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