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झारखंड: चूल्हा-चौका तक सीमित ये आदिवासी महिलाएं कैसे बनीं अपने गांवों की लीडर ?

Neetu SinghNeetu Singh   4 Oct 2019 11:45 AM GMT

झारखंड: चूल्हा-चौका तक सीमित ये आदिवासी महिलाएं कैसे बनीं अपने गांवों की लीडर ?

पलामू/रांची (झारखंड)। झारखंड के गाँवों में चूल्हे-चौके तक सीमित रहने वाली साधारण महिलाएं आज अपने गांवों में लीडर की भूमिका निभा रही हैं। ये महिलाएं अपने गाँव में चल रहे स्वयं सहायता समूहों की नियमित बैठक करती हैं और वहां की समस्याओं का भी अपने स्तर से ही समाधान भी करती हैं।

रांची के नगड़ी प्रखंड के सपारम गाँव की रहने वाली लीला देवी (28 वर्ष) वर्ष 2014 में ज्योति महिला समिति से जुड़ीं। लीला कहती हैं, "गाँव में 8 समूह हैं, हर समूह की सप्ताह में एक बार बैठक होती है। सभी बैठकों में हमारा पहुंचना जरूरी होता है। किसी समूह में अगर कोई समस्या है तो उसको भी सुलझाते हैं। गाँव की जो गरीब महिलाएं समूह से नहीं जुड़ी हैं उन्हें समूह में जुड़ने के लिए उत्साहित करते हैं।" कभी घर की चहारदीवारी तक सीमित रहने वाली लीला देवी आज अपने गाँव में किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं।

लीला देवी की तरह झारखंड के गांवों में 10,000 से ज्यादा सक्रिय महिलाएं हैं जो अपने-अपने गाँव में बने स्वयं सहायता समूहों की देखरेख करती हैं। हर सक्रिय महिला को ग्राम संगठन से महीने के 1500 रुपए मिलते हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत झारखंड में ग्रामीण विकास विभाग, झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी द्वारा स्वयं सहायता समूहों का गठन किया जा रहा है जिसमें अबतक 21 लाख से ज्यादा परिवार जुड़ चुके हैं। हर गाँव में आबादी के अनुसार समूहों की संख्या होती है। इन समूहों की नियमित बैठक हो और ये सुचारू रूप से संचालित हों ये सुनिश्चित करने के लिए गाँव में एक सक्रिय महिला का चयन किया जाता है।

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लीला देवी आत्मविश्वास के साथ कहती हैं, "सक्रिय महिला बनने के बाद हमारा काम भले ही बढ़ा हो पर ये काम करके हमें खुशी मिलती है। गाँव में जिस गली से निकल जाएं हर कोई जोहार (नमस्ते) करता है। लीला देवी का नाम पूछने से मेरे घर का पता मिल जाएगा। समूह में जुड़कर मुझे मेरे नाम को बड़ी पहचान मिली है।" वो आगे बताती हैं, "समूह से जुड़कर घर से बाहर निकलने को मिला जिससे आसपास की जानकारी रहती है। गाँव के लोगों को कुछ जानना होता है सब मुझे ही खोजते हैं। एक घरेलू महिला को जब उसके गाँव में लोग उसके नाम से जाने इससे बड़ी खुशी हमारे लिए क्या हो सकती है।"

राज्य में स्वयं सहायता समूह को सखी मंडल के नाम से जाना जाता है। महिलाओं का एक ऐसा संगठन जहाँ ये केवल बचत ही नहीं करतीं बल्कि इन्हें खुद की पहचान भी मिलती हैं। इन्हें झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी द्वारा प्रशिक्षित करके लीडर बनने का मौका मिलता है। आज हजारों महिलाएं अलग-अलग जिम्मेदारियां सम्भालकर अपने क्षेत्र की बागडोर संभाल रही हैं। चाहें वो सक्रिय महिला हो या फिर कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन, आजीविका कृषक मित्र हों या फिर पशु सखी। ऐसे कई कैडर हैं जिसमें ग्रामीण महिलाएं लीडर की भूमिका में काम कर रही हैं।

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लीला देवी की तरह ही पलामू जिले के चैनपुर प्रखंड के गुरहा कुरागा खुर्द गाँव की रहने वाली शकुंतला खलको (27 वर्ष) गुलाब आजीविका स्वयं सहायता समूह से वर्ष 2017 में जुड़ीं। ये अपने गाँव की सक्रिय महिला हैं,ये 9 समूहों को देखती हैं जिसमें 92 महिलाएं जुड़ीं हैं। शकुंतला बताती हैं, "एक महीने में एक समूह की चार बैठकें होती हैं हर बैठक में जाना जरूरी होता है। गाँव की हर गरीब महिला समूह से जुड़े ये हमारी जिम्मेदारी रहती है। समूह की हर महिला मीटिंग में जाए, लेनदेन का पूरा लेखा-जोखा हो। मीटिंग में लेनदेन के अलावा जिन विषयों पर चर्चा हुई उसके मीटिंग मिनट्स भी लिखे जाते हैं।"

झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी द्वारा अगर गाँव में कभी कोई कार्यक्रम करना हो या फिर कोई बैठक तो सबसे पहले सक्रिय महिला को ही याद किया जाता है। घर-घर जाकर महिलाओं को खबर करना, बैठक के पूरे इंतजाम की जिम्मेदारी इन सक्रिय महिलाओं की होती है। शकुंतला बताती हैं, "महिलाओं को समूह में जोड़ने के लिए समझाना थोड़ा मुश्किल होता है पर कई बार समझाने पर मान जाती हैं। यहाँ की महिलाएं ज्यादातर खेती करती हैं या फिर जंगल जाती हैं पर अब ये अपना काम रोककर नियमित बैठक में शामिल होती हैं।"

झारखंड में गाँव स्तर पर स्वयं सहायता समूहों के मजबूती की रीढ़ ये सक्रिय महिलाएं हैं। जमीनी स्तर पर ये समूह मजबूत हों इसके लिए ये महिलाएं जीतोड़ मेहनत करती हैं।

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