जब गाँव की महिलाएं बनी लीडर तो घर-घर पहुंचने लगी सरकारी योजनाएं

रोजगार के अवसर पैदा करने हों या फिर लोगों के सामने एक मिसाल बनना हो. झारखंड की ये महिलाएं एक मील का पत्थर साबित हो रही हैं। जिनके नक्शेकदम पर अब देश के दूसरे राज्य भी हैं।

Neetu SinghNeetu Singh   21 Aug 2019 5:45 AM GMT

जब गाँव की महिलाएं बनी लीडर तो घर-घर पहुंचने लगी सरकारी योजनाएं

रांची (झारखंड)। पिछले कुछ वर्षों में ग्रामीण झारखंड की जो आबोहवा बदली-बदली नजर आ रही है, उसका श्रेय यहाँ की महिलाओं को जाता है। ये सुदूर और दुर्गम गाँव की वो महिलाएं हैं जिन्होंने गरीबी से लड़कर, घर की चौखट को लांघकर, न सिर्फ खुद को बदला बल्कि आज दूसरों की जिंदगियां संवारने में लगी हुई हैं।

झारखंड के नक्सल प्रभावित जिला पश्चिमी सिंहभूम की आशा तिग्गा आज सामुदायिक पत्रकार बनकर अपने क्षेत्र की बदलाव की वो कहानियाँ लिख रही हैं जो अबतक अनकही थीं। आशा (28 वर्ष) आत्मविश्वास के साथ कहती हैं, "हमारे पास कोई बड़ी डिग्री नहीं है जिससे हम कभी पत्रकार बन पाते। लेकिन सखी मंडल से जुड़ने के बाद हमें पत्रकारिता की ट्रेनिंग दी गयी। यहाँ हमने खबर लिखना सीखा। अब तो हमारी लिखी बहुत कहानियाँ छप चुकी हैं।" ये बदलाव की वो कहानियाँ हैं जो देश की हजारों महिलाओं के लिए उदाहरण हो सकती हैं।

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ग्रामीण महिलाएं पत्रकारिता का प्रशिक्षण लेकर बन गईं सामुदायिक पत्रकार

आशा तिग्गा खुश होकर आत्मविश्वास से कहती हैं, "अब तो हम अपने मोबाइल से फोटो भी खींच लेते हैं और वीडियो भी बना लेते हैं। जब अखवारों में और वेबसाइट पर अपनी लिखी खबर देखते हैं तो बहुत खुशी मिलती है।" आशा तिग्गा की लिखी खबरें और वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर जब पब्लिश होते हैं तो इनका हौसला बढ़ता है। इनकी तरह आज दर्जनों महिलाएं सामुदायिक पत्रकार बनकर अपने-अपने क्षेत्र की आवाज़ बन रही हैं। आशा तिग्गा की तरह सैकड़ों साधारण ग्रामीण महिलाओं के हुनर को पहचानकर उसे तराशने का काम राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ने किया है।

झारखंड के सुदूर गांवों की महिलाएं अपनी मेहनत और लगन से रोज नए-नए करिश्में कर रही थीं, वो नए रोजगार अपना रही थीं, खेतों में मुनाफे की फसल काट रही थीं, वो तमाम लोगों की प्रेरणा थीं, लेकिन टीवी और अख़बारों में इन्हें जगह नहीं मिल रही थीं। जेएसएलपीएस ने गांव की पढ़ी लिखी युवतिओं और महिलाओं को सामुदायिक पत्रकार बना दिया। देश के प्रतिष्ठित मीडिया घरानों के साझा उपक्रम के तहत ख़बर लिखने से लेकर वीडियो बनाने की ट्रेनिंग दिलाई गई। ये वो आम सी महिलाएं-युवतियां अपने आसपास के गांवों में बदलाव की आवाज बन रही हैं। उनकी लिखी ख़बरें राष्ट्रीय अख़बारों में छपती और उनके बनाए वीडियो सोशल मीडिया में चलते हैं।

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बीसीआरपी (वीडियो कम्युनिटी रीसोसर्स पर्सन) कैमरे से शूट करती हैं वीडियो

सामुदायिक पत्रकार एक ऐसा कैडर जो सखी मंडल की बदलाव की वो कहानियाँ लिखता है जिससे देश की लाखों महिलाएं प्रेरणा ले सकती हैं। सामुदायिक पत्रकार की तरह ही एक कैडर है बीसीआरपी (वीडियो कम्युनिटी रीसोसर्स पर्सन). जो कैमरे से गाँव-गाँव जाकर वीडियो शूट करती हैं. ये स्टोरी वोर्डिंग से लेकर एक वीडियो स्टोरी में कितने शॉट्स चाहिए इन्हें पूरी जानकारी होती है। ये कैडर पूरी सूझ-बूझ के साथ अब कैमरे को अच्छे से न केवल हैंडल करती हैं बल्कि एक वीडियो को बनाने की पूरी समझ भी रखती हैं।

कहा जाता है महिलाओं में प्रबंधन का गुण जन्मजात होता है। हजारों लोगों ने अपने अनुभवों में कहा है कि आम महिलाएं भी बेहतर संरक्षक और सलाहकार होती हैं। ग्रामीण विकास विभाग एवं झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (जेएसएलपीएस) ने महिलाओं की इन्हीं खूबियों को पहचान कर उन्हें गरीबी से लड़कर सक्षम बनाने का हथियार बनाया। झारखंड की बड़ी ग्रामीण आबादी आज सखी मंडल से जुड़ी है।

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जेएसएलपीएस ने सखी मंडल से जुड़ी महिलाओं को बचत करने का गुण तो सिखाया ही साथ ही उनमें शामिल प्रतिभाशाली महिलाओं को प्रशिक्षित कर महिलाओं के विभिन्न कैडर (लीडर) भी बनाये। ताकि वो अपना काम बिना किसी बाहरी मदद के कर सकें और दूसरों से करवा सकें। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत इन विभिन्न कैडर को प्रशिक्षित किया गया है जिसमें पशु सखी, रानी मिस्त्री, बैंक सखी, बैंकिंग करेस्पांडेंट एजेंट, सोलर दीदी, आजीविका कृषक मित्र, सेतु दीदी, टैबलेट दीदी, सामुदायिक पत्रकार, बीसीआरपी (वीडियो कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन) आदि शामिल हैं।

झारखंड के ये विभिन्न कैडर लगभग हर क्षेत्र में काम कर रहे हैं, लोगों की आजीविका बढ़ाने से लेकर सेहतमंद बनाने तक में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। रोजगार के अवसर पैदा करने हों या फिर लोगों के सामने एक मिसाल बनना हो. झारखंड की ये महिलाएं एक मील का पत्थर साबित हो रही हैं..जिसके नक्शेकदम पर अब देश के दूसरे राज्य भी हैं।

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ये हैं झारखंड की पशु सखियाँ जो छोटे पशुओं का करती हैं इलाज


छोटे पशुओं का इलाज करती पशु सखियाँ

इन सभी कैडर की अपनी अलग-अलग तरह की जिम्मेदारियां होती हैं। ये अपने समुदाय में लीडर के तौर पर देखी जाती हैं। सरकारी योजनायें सुदूर गाँव के हर घर में पहुंचें इसकी जिम्मेदारी ये कैडर बखूबी निभाती हैं।

राज्य में छोटे किसानों का सहारा बनी पशु सखी पलामू जिले की शकुंतला खलको (27 वर्ष) बताती हैं, "हमारे यहाँ छोटे पशुओं को देखने कोई डॉ नहीं आता था। पहले बकरियां बीमार होती थी और कई बार इलाज न मिलने के कारण मर भी जाती थी लेकिन जबसे हम पशु सखी बने हैं तबसे बकरियों के बीमार पड़ते ही उन्हें तुरंत दवा दे देते हैं।"

वो आगे कहती हैं, "अब गाँव में छोटे पशुओं की इलाज के लिए भटकना नहीं पड़ता है। वक़्त जरूरत पड़ने पर पशु सखी काम आती हैं। हम लोगों की फीस भी बहुत कम होती है और गाँव में जब जितने समय जरूरत हो हम इलाज के लिए पहुंच जाते हैं।"

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झारखंड उन राज्यों में शामिल हैं, जहां हर घर में बकरी और मुर्गियों जैसे छोटे पशु पाए जाते हैं। बकरियां यहां के लोगों के लिए एटीएम यानि एनी टाइम मनी हैं। लेकिन ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की कमी के चलते हर साल हजारों बकरियां मर जाती थीं। जेएसएलपीएस की प्रशिक्षित पशु नर्सों यानी पशु सखियों ने लोगों को पशुओं के रखरखाव और समय-समय पर पशु पालकों के घर-घर जाकर बकरियों का इलाज करती हैं। उचित देखरेख और समय से टीकाकरण के चलते बकरियों और मुर्गियों की मौतें रुकी, जिससे लाखों लोगों की आमदनी बढ़ी है।

सुदूर गाँव में इन महिलाओं की बदौलत पहुंची बैकिंग सेवाएं

जिस तरह से झारखंड में पशु सखियाँ घर-घर जाकर पैरावेटनरी सुविधाएँ पहुंचा रही हैं वैसे ही महिलाओं का एक कैडर बिजनेस कॉरेस्पोंडेंट एजेंट के तौर पर झारखंड के सुदूर और दुर्गम ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाएँ पहुंचाई जा रही हैं। अब यहाँ के ग्रामीणों को बैंकों से पैसे निकालने के लिए कई किलोमीटर न तो पैदल चलना पड़ता है और न ही घंटो लाइन लगाकर खड़ा होना पड़ता है। क्योंकि एटीएम दीदी घर-घर जाकर माइक्रो एटीएम पोर्टेबल मशीन के जरिये इनके पैसे की जमा निकासी कर देती है।

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ये हैं लातेहार जिले की सुनीता देवी

लातेहार जिले के महुवाटाढ प्रखंड के लोध गाँव की रहने वाली सुनीता बेक (29 वर्ष) जिस गाँव में रहती हैं वहां से बैंक की दूरी 15 किलोमीटर है जहाँ आने जाने में दो घंटे लगता है। सुनीता सखी मंडल से जुड़ने के बाद आज ये अपने गाँव में बिजनेस कॉरेस्पोंडेंट एजेंट हैं। ये लातेहार का वो सुदूर गाँव हैं जहाँ आज भी मुश्किलों भरा जीवन है लेकिन सुखद तस्वीर ये है कि यहाँ घर-घर बैकिंग सेवाएं पहुंच गयी हैं।

सुनीता बताती हैं, "जबसे हमारे यहाँ पोर्टेबल मशीन से पैसे निकलने लगे हैं गाँव के लोगों को बहुत आराम हो गया है। अब कई किलोमीटर न तो उन्हें जाना पड़ता और न ही उनका दिन बर्बाद होता। ऐसे में लोग अपनी मजदूरी कर लेते हैं और वक़्त जरूरत पड़ने पर आसानी से पैसे निकाल लेते हैं।"

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सुदूर गाँव में पोर्टेबल मशीन से पैसे निकालती एटीएम दीदी

इतना ही नहीं जिन महिलाओं को बैंक जाने में झिझक होती है। पढ़े-लिखे न होने के चलते फार्म भरने में दिक्कत होती थी, इनकी मदद के लिए बैंक शाखाओं में बैंक सखी बैठाई गई हैं। जिस प्रकार एटीएम दीदी गाँव-गाँव जाकर ग्रामीणों को बैकिंग सेवायें पहुंचा रहीं उसी तरह एक कैडर बैंक सखी के रूप में काम करता है। ये बैंक में बैठकर सखी मंडल की महिलाओं का न केवल फॉर्म भरने में मदद करती हैं बल्कि उन्हें बैंक से लोन दिलाने में भी मदद करती हैं।

पलामू जिले की बैंक सखी अनीता देवी (27 वर्ष) बैंक में आने वाली महिलाओं के विथड्राल फार्म भर रहीं थी उन्होंने बताया, "ये लोग लिखपढ़ नहीं पाती हैं पहले बैंक में इन्हें दूसरे लोगों से फार्म भरवाने में मदद लेनी पड़ती थी लेकिन अब हम खुद ही इनका खाता खुलवा देते हैं। पैसे निकलवा देते हैं और समूह से लोन भी पास करवा देते हैं।"

गाँव-गाँव स्वास्थ्य सेवायें पहुंचाती सेतु दीदी

घर-घर जाकर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाती सेतु दीदी

ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को घर-घर पहुँचाने में सेतु दीदी एक महत्वपूर्ण कैडर है। ये गाँव-गाँव जाकर पीको प्रोजेक्टर के द्वारा स्वास्थ्य सम्बन्धी वीडियो महिलाओं को दिखाती हैं। ये वो वीडियो होते हैं जो आसपास की महिलाओं द्वारा ही बनाये जाते हैं जिससे ये सीधे जुड़ाव रख पाती हैं।

गर्भवती महिला अपनी और बच्चे की देखरेख कैसे करे इनका खान-पान कैसा हो जैसी तमाम जानकारी इस वीडियो से दी जाती है। सेतु दीदी की वजह से अब यहाँ की महिलाओं का खान-पान पहले से बेहतर हुआ है ये अपनी सेहत का ख्याल रखने लगी हैं।

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पीको प्रोजेक्टर से वीडियो दिखाती नीलम देवी

रांची जिले के अनगढ़ा प्रखंड में रहने वाली नीलम देवी (25 वर्ष) सेतु दीदी का काम करती हैं। एक आंगनबाड़ी सेंटर पर कुछ गर्भवती महिलाओं को पीको प्रोजेक्टर से उन्हें समझाने की कोशिश कर रही थी कि गर्भवती महिलाओं को अपना खानपान कैसे रखना चाहिए।

नीलम कहती हैं, "वीडियो देखकर इन्हें जल्दी समझ आ जाता है कि इन्हें पानी देखरेख कैसे करनी है। अब ये अपनी थाली में तीन कलर का ध्यान रखती हैं जिसे तिरंगा थाली कहते हैं।"

जैविक खेती का हुनर सिखाती आजीविका कृषक मित्र

झारखंड में महिलाएं खेती का आधार हैं। लेकिन ज्यादातर महिलाएं परंपरागत खेती या फिर मजदूरी करती थीं। इन महिलाओं को आधुनिक तरीकों से खेती करने, खेती से लाभ कमाने और हजारों किसानों को प्रशिक्षित करने वाले कैडर का नाम है आजीविका कृषक मित्र…महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना के अंतर्गत ये महिलाएं खुद तो जैविक खेती करती ही हैं साथ ही दूसरी महिलाओं को जैविक खेती करने के लिए प्रेरित भी करती हैं, इतना ही नहीं उन्हें जैविक खाद बनाने से लेकर कीटनाशक दवाइयां बनाने का हुनर सिखाती हैं।

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ये हैं आजीविका कृषक मित्र जो सिखाती हैं जैविक खेती का हुनर

आजीविका कृषक मित्रों की बदौलत आज प्रदेश की साढ़े तीन लाख से ज्यादा महिला किसान मुनाफे की फसल काट रही हैं। जैविक खेती के गुण बताती रांची के सिल्ली ब्लॉक की प्रभा देवी (50 साल बताती हैं, "हम अगर जहर वाला खाएंगे तो बीमार तो हम ही पड़ेंगे। इसलिए हम सब दीदी लोगों को एक ही सीख देते हैं कि जो भी खाद और दवा डालो वो सब घर पर ही बनाओ।" वो आगे कहती हैं, "हमारे गाँव में ज्यादातर महिलाएं जैविक तरीके से खेती करती हैं वो शुद्ध खाती भी हैं और बेचती भी।"

समूह का लेखा-जोखा ऑनलाइन करती टैबलेट दीदी

सखी मंडल का पूरा लेखा-जोखा ऑनलाइन करती टैबलेट दीदी

आजीविका कृषक मित्र की तरह ही एक कैडर है टैबलेट दीदी का...जो सखी मंडल का पूरा लेखा-जोखा टैबलेट में ऑनलाइन करता है। समूह के लेखा-जोखा के लिए ये महिलाएं कोई अकाउंटेंट नहीं रखती बल्कि सारा काम टैबलेट दीदी ही पूरा करती हैं। हर गाँव में एक टैबलेट दीदी होती है जितना भी सरकार द्वारा सखी मंडल को पैसा मिलता है या फिर जो सखी मंडल की बचत होती है इसकी पूरी जिम्मेदारी यही संभालती हैं। यानि इस कैडर के माध्यम से सखी मंडल का पूरा डेटा डिजिटलीकरण हो गया है।

इसके आलावा ये कैडर कृषि आधरित वीडियो, मोटीवेशनल वीडियो भी दिखाती हैं, इन्हें फ्री में डेटा मिलता है जिससे ये देश दुनिया की खबरों से सरोकार रख पाती हैं और सखी मंडल की महिलाओं को भी जागरूक करती हैं।

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ये हैं झारखंड की रानी मिस्त्री जिन्होंने शौचालय का निर्माण किया

स्वच्छ भारत अभियान की सारथी बनी रानी मिस्त्री

बोकारो जिले की रहने वाली सुनीता देवी जो कि रानी मिस्त्री हैं वो बताती हैं, "शुरुआत में पुरुषों को हमारा रानी मिस्त्री बनना अच्छा नहीं लगा। लेकिन जब हम अच्छे से शौचालय बनाने लगे तो वो भी हमारी तारीफ करने लगे। जब लोग रानी मिस्त्री बुलाते हैं तो सुनकर अच्छा लगता है। हमारे कम से अब हमारी पहचान हो गयी है।"

झारखंड राज्य तय टारगेट से एक साल पहले ही खुले से शौच मुक्त हो गया है। इसका श्रेय जाता है यहाँ की रानी मिस्त्री को। स्वच्छ भारत अभियान और प्रधानमंत्री आवास योजना में झारखंड ने जो तेजी दिखाई उसका बड़ा श्रेय रानी मिस्त्री कैडर को जाता है। जिन्होंने पुरुषों की तरह नींव के लिए न केवल गड्डे खोदे बल्कि उसी रफ्तार से ईंट पर ईंट रखकर निर्माण कार्य भी किए। इस रानी मिस्त्रियों की बदौलत जहाँ एक तरफ निर्माण की योजना परवान चढ़ी वहीं दूसरी तरफ हजारों ग्रामीण महिलाओ को रोजगार मिला।

अब इन्हें न तो हर दिन जंगल से लकड़ी बीनने जाना पड़ता और न ही दिहाड़ी मजदूरी तलाशनी पड़ती। इस कैडर ने अपने एक हुनर से सुदूर गाँव में शौचालय निर्माण करके देश में एक अनूठी मिसाल पेश की है।

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