झारखंड की ये महिलाएं गाँव-गाँव जाकर महिला किसानों को सिखा रहीं उन्नत खेती के गुण

उन्नत खेती करके किसान कैसे अपनी आमदनी बढ़ा सकता है ये बात झारखंड की ये सफल महिला किसान गाँव-गाँव जाकर दूसरी महिला किसानों को सिखा रही हैं।

Neetu SinghNeetu Singh   28 Jun 2019 5:28 AM GMT

झारखंड की ये महिलाएं गाँव-गाँव जाकर महिला किसानों को सिखा रहीं उन्नत खेती के गुण

रामगढ़ (झारखंड)। खेती का अनुभव रखने वाली ये ग्रामीण महिलाएं गाँव-गाँव जाकर महिलाओं को उन्नत खेती के गुण सिखा रही हैं। ये फसल की बुवाई से लेकर बाजार में बेचने में इन्हें सक्षम बना रही हैं। इन सफल महिला किसानों के अनुभव से प्रभावित हजारों महिलाएं खेती करने की शुरुआत कर चुकी हैं।

ये सामूहिक रूप से मिलकर खेती करें इसके लिए इन्हें जोहार परियोजना के अंतर्गत बनने वाले उत्पादक समूह से जोड़ा जा रहा है। ये उत्पादक समूह अनुभवी महिला किसान दूसरे गाँव में जाकर सखी मंडल की महिलाओं को अपनी कहानियाँ बताकर उत्पादक समूह में जुड़कर उन्नत खेती करने के लिए प्रेरित करती हैं।

गाँव-गाँव जाकर उत्पादक समूह बनाने वाली इस प्रक्रिया को पीजी (प्रोड्यूसर ग्रुप) ड्राइव और इन महिलाओं को कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन के नाम से जाना जाता है। तीन चार महिलाएं दूसरे गांवों में पांच दिन रहकर उत्पादक समूह बनाती हैं और उन्नत खेती के गुण सिखाती हैं। जब ये एक गाँव में उत्पादक समूह बना लेती हैं तब वहीं से ये दूसरे गाँव की तरफ रुख कर लेती हैं। इस ड्राइव की विशेषता यह है कि आसपास की सशक्त महिलाएं ही दूसरे गाँव जाकर अपनी खुद की कहानियाँ उत्पादक समूह बनाने के दौरान दूसरी महिलाओं के साथ साझा करती हैं जिससे दूसरी महिलाएं प्रभावित होकर आसानी से उत्पादक समूह से जुड़ जाती हैं।




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जब रामगढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर गोला प्रखंड के सुतरी गाँव पहुंचे तो हमने महिलाओं के एक समूह को इकट्ठा बैठे देखा जहाँ तीन महिलाएं बैनर पकड़कर कुछ समझा रहीं थीं। पूंछने पर पता चला ये तीनों महिलाएं पास के गाँव की ही रहने वाली हैं और इस गाँव में उत्पादक समूह बनाने के लिए आयी हैं। प्रशिक्षण दे रही गोला प्रखंड के बरियातू गाँव की गीता देवी (30 वर्ष) ने बताया, "इन दीदियों को हम अपनी आपबीती बताते हैं। सखी मंडल से जुड़ने के बाद हमारे घर के हालात कैसे बदले ये सुनकर दीदी लोग भी सोचने लगती हैं कि हम भी ऐसे ही अपनी जिन्दगी बदल सकते हैं। जब उनकी सहमति होती है तभी उन्हें उत्पादक समूह में जोड़ते हैं। पांच दिन में उत्पादक समूह के बारे में पूरी जानकारी देकर हम दूसरे गाँव उत्पादक समूह बनाने के लिए चले जाते हैं।"

गीता वर्ष 2013 में माता लक्ष्मी महिला मंडल से जुड़ी और 2016 में ये आजीविका कृषक मित्र के लिए चुनी गईं। इनकी मेहनत और लगन को देखते हुए इन्हें झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी द्वारा प्रशिक्षण दिया गया। अब ये इतनी सशक्त और सक्षम हो गयी हैं कि गाँव-गाँव जाकर दूसरी महिलाओं को प्रशिक्षित कर सकती हैं। गीता सखी मंडल में जुड़ने से पहले एक साधारण महिला थीं जो मेहनत मजदूरी करके अपने परिवार का भरण पोषण करती थीं लेकिन आज न केवल उनकी आजीविका सशक्त हुई है बल्कि उनकी अपनी एक अलग पहचान है। वो अपने खुद के गाँव में तो किसानों को प्रशिक्षण देती ही हैं साथ ही दूसरे गाँव में भी दूसरी महिलाओं को प्रशिक्षण देती हैं। गीता के साथ इस गाँव में सुषमा भारती और सुनीता देवी भी आयी हैं। इन दोनों की कहानी भी गीता से मिलती जुलती ही है।




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कोराम्बो गाँव की सुनीता देवी (32 वर्ष) दूसरे गाँव में उत्पादक समूह की प्रक्रिया के बारे में बताती हैं, "हम लोग जिस भी गाँव में जाते हैं वहां पांच दिन उस गाँव की किसी दीदी के घर में या पंचायत भवन में रुकते हैं और खाना बनाने से लेकर सोने तक के बिस्तर सब लेकर जाते हैं। सुबह से लेकर शाम तक पांच दिन लगातार इन महिलाओं के बीच जाकर पहले इन्हें जोड़ने के लिए कहते हैं फिर पूरा प्रशिक्षण देते हैं।" वो आगे बताती हैं, "जब हम किसी ड्राइव में निकलते हैं तो वो 30-35 दिन की होती है जिसमें छह-सात उत्पादक समूह बनाने होते हैं। हमें एक दिन का पांच सौ रूपये मिलता है। इससे हमारी आमदनी भी बढ़ती है और जानकारी भी। समूह की दीदी जब हमारी कहानी सुनती हैं तो वो खुद के भी हालात बदलना चाहती हैं।"

राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत बने सखी मंडलों की ये खूबी है कि किसी भी ट्रेनिंग के लिए प्रशिक्षक कहीं बाहर से न लाये जाए बल्कि सखी मंडल से जुड़ी महिलाओं में ही ये स्किल विकसित की जाये जिससे वो खुद प्रशिक्षण देने में सक्षम हो सकें। झारखंड स्टेट लाइवलीहुड में ऐसी हजारों की संख्या में महिलाएं हैं जो गाँव-गाँव जाकर दूसरी महिलाओं को आज प्रशिक्षित कर रहीं हैं।

हेटगढ़ा गाँव की सुषमा भारती (27 वर्ष) बताती हैं, "जब उत्पादक में जुड़ने के लिए महिलाएं राजी हो जाती हैं तब उन्हें उन्नत खेती, मत्स्य पालन, लघुवनोपज, बकरी पालन, सूकर पालन और मुर्गी पालन के बारे में विस्तार से बताया जाता है। क्षेत्र के हिसाब से महिलाएं इन विषयों में से जिस विषय पर अपनी ज्यादा रूचि दिखाती हैं उस पर उन्हें ज्यादा जानकारी दी जाती है और वही करने के लिए कहा भी जाता है।" वो आगे बताती हैं, "क्षेत्र के हिसाब से ट्रेनिंग के विषय भी चुन लिए जाते हैं। जैसे किसी क्षेत्र में पानी की वजह से खेती नहीं हो सकती तो वहां पशुपालन पर जोर दिया जाता है। जिन क्षेत्रों में जिंगल होते हैं वहां वनोपज को बढ़ावा देने के लिए ट्रेनिंग दी जाती हैं।"

ये महिलाएं पांच दिन में उत्पादक समूह से जुड़ी महिलाओं को इतना प्रशिक्षित कर देती हैं जिससे ये सामूहिक रूप से बाजार से बीज लाने से लेकर अपनी फसल बाजार तक पहुँचाने में सक्षम हो जाती हैं। प्रशिक्षण ले रही सुतरी गाँव की चांदनी ग्राम संगठन की अध्यक्ष नीरुबाला देवी (28 वर्ष) ने बताया, "इन दीदियों की बात पर गाँव की दीदियों को ज्यादा भरोसा होता है क्योंकि ये आसपास गाँव की होती हैं और ये हमारी ही भाषा में हमें सबकुछ सिखाती हैं। इनके सामने गाँव की दीदी अपनी बात आसानी से रख पाती हैं।" वो आगे कहती हैं, "सखी मंडल से तो हम लोग बहुत पहले से जुड़े हैं। खेती और पशुपालन भी अपने हिसाब से कर ही रहे हैं लेकिन अब उत्पादक समूह में जुड़ने के बाद सामूहिक खेती पहली बार करेंगे।"



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प्रशिक्षण के पांच दिनों का ऐसा रहता है शेड्यूल..

जब कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन उस गाँव में जाती हैं जहाँ उत्पादक समूह बनने होते हैं तो उस गाँव की सक्रिय दीदी पहले से ही गाँव में एक सूचना कर देती हैं। इनके गाँव में पहुंचने के बाद ये पहले दिन खुद पूरे गाँव में घूमती हैं और लोगों के बारे में जानने की कोशिश करती हैं। दिनभर घूमने के बाद शाम में एक आमसभा रखती हैं। ये आमसभा गाँव के लोगों की सहूलियत के हिसाब से रखी जाती है।

इसी आमसभा में उत्पादक समूह में जुड़ने वाली महिलाओं की लिस्ट उनकी मर्जी से बना ली जाती है। दूसरे दिन प्रशिक्षण शुरू हो जाता है और सबसे पहले उन्हें उत्पादक समूह के फायदे बताये जाते हैं। तीसरे दिन भी प्रशिक्षण चलता है ये प्रशिक्षण उस ग्रुप को ध्यान में रखकर दिया जाता है जिस विषय में उनकी रूचि होती है उसी पर चर्चा होती है। जैसे अगर ग्रुप खेती करने में रूचि रखता है तो उन्हें उन्नत किस्मों के बारे में बताया जाता है। वैज्ञानिक तौर-तरीके से वो कैसे खेती करें इस पर जोर दिया जाता है। चौथे दिन उस समूह से पदों का चुनाव होता है किसे कौन सी जिम्मेदारी सम्भालनी है। प्रशिक्षण के आख़िरी दिन प्रति सदस्य उत्पादक समूह में जुड़ने के लिए 100 रुपए सदस्यता शुल्क और 1000 रूपये हिस्सा धन के रूप में लिए जाते हैं। यानि जब आप 1100 रुपए जमा कर देंगे तभी उत्पादक समूह का सदस्य बन सकते हैं।

पांच दिन के प्रशिक्षण के बाद महिलाओं का ये ड्राइव दूसरे गाँव के लिए रवाना हो जाता है। यही प्रक्रिया हर उत्पादक समूह बनने में लागू होती है। अबतक 2100 से ज्यादा उत्पादक समूह इन हजारों महिलाओं के सहयोग से बन चुके हैं।


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