मछली पालन से पहले जरूरी है पढ़िन, मांगूर, गिरई जैसी मांसाहारी मछलियों की सफाई 

Karan Pal SinghKaran Pal Singh   27 Nov 2017 8:02 AM GMT

मछली पालन से पहले जरूरी है पढ़िन, मांगूर, गिरई जैसी मांसाहारी मछलियों की सफाई तीकात्मक फोटो साभार इंटर

देश में मछली पालन उद्योग कभी मछुआरों तक ही सीमित था, किन्तु आज यह सफल और प्रतिष्ठित लघु उद्योग के रूप में स्थापित हो रहा है। नई-नई तकनीकों ने इस क्षेत्र में क्रांति ला दी है। मछली पालन रोजगार के अवसर तो पैदा करता ही है, खाद्य पूर्ति में वृद्धि के साथ-साथ विदेशी मुद्रा अर्जित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

आज भारत मत्स्य उत्पादक देश के रूप में उभर रहा है। एक समय था, जब मछलियों को तालाब, नदी या सागर के भरोसे रखा जाता था, परंतु बदलते वैज्ञानिक परिवेश में इसके लिए कृत्रिम जलाशय बनाए जा रहे हैं, जहां वे सारी सुविधाएं उपलब्ध होती हैं, जो प्राकृतिक रूप में नदी, तालाब और सागर में होती हैं। आइए जानते हैं मत्सय पालन बारे में कि कैसे मछली पालन की शुरुआत की जाती है।

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सर्वप्रथम तालाबों, पोखरों में अवांछनीय मछलियों को हटाएं

पुराने तालाबों में बहुत से अनावश्यक जन्तु जैसे कछुआ, मेंढक, केकड़े और मछलियां जैसे सिंधरी, पुठिया, चेलवा आदि एवं भक्षक मछलियां उदाहरणार्थ पढ़िन, टैंगन, सौल, गिरई, सिंघी, मांगुर आदि पायी जाती हैं जो कि तालाब में उपलब्ध भोज्य पदार्थों को अपने भोजन के रूप में ग्रहण करती हैं। मांसाहारी मछलियां कार्प मछलियों के बच्चों को खा जाती है जिससे मत्स्य पालन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अत: इनकी सफाई नितान्त आवश्यक है।

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महुए की खली से तालाबों की करें सफाई

अवांछनीय मछलियों का निष्कासन बार-बार जाल चलाकर या पानी निकाल कर अथवा महुए की खली के प्रयोग द्वारा किया जा सकता है। महुए की खली का प्रयोग एक हेक्टेयर क्षेत्रफल के एक मीटर पानी की गहराई वाले तालाब में 25 कुंटल की दर से किया जाना चाहिए। इसके परिणाम स्वरूप 6 से 8 घंटों में सारी मछलियां मर कर ऊपर आ जाती हैं जिन्हें जाल चलाकर एकत्र करके बाजार में बेचा जा सकता है। महुए की खली का प्रयोग तालाब के लिए दोहरा प्रभाव डालता है। विष के अलावा 15-20 दिन बाद यह खाद का भी कार्य करती है जिससे मछली के प्राकृतिक भोजन का उत्पादन होता है।

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ऐसे करें मत्स्य पालन की शुरुआत

जो किसान मछली पालन शुरू करना चाहते हैं उनके लिए मई और जून उपयुक्त समय है। तालाब की तैयारी कर सकते हैं। यदि पहली बार मछली पालन शुरू कर रहे हैं तो सरकार द्वारा अनुदान की भी व्यवस्था है। मत्स्य विभाग के प्रंबध निदेशक डॉ नरुल हक बताते हैं, "बरसात शुरू होने से पहले जो किसान अपने तालाब में सुधार कराना चाहे करा सकता है और जो मछली पालन शुरू करना चाहे वो तालाब खुदवा लें, क्योंकि जुलाई में मछली के बीजों को किसान तालाब में डाल सकता है, जिससे उसे अच्छा उत्पादन मिल सकेगा। अगर बीज जुलाई के बाद खरीदेगा तो मंहगा भी मिलेगा और दाम भी सही नहीं मिलेगा।"

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डॉ नरुल हक आगे बताते हैं, "बरसात में मछलियों की प्रजनन क्षमता बढ़ जाती है। जुलाई से हैचरियों में किसानों को अच्छे बीज भी मिल जाते हैं। यदि कोई मछली पालन शुरू करना चाहता है तो वह आधा हेक्टेयर से शुरुआत कर सकता है। इडियन मेजर कार्प (रोहू, कतला, नैन) के बीज डाल सकते हैं।" मत्स्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में नौ हैचरी क्रियाशील है। इसके अलावा 40 विभागीय मत्स्य क्षेत्र है जहां से किसानों को अच्छे बीज उपलब्ध हो सकते हैं। प्रदेश में 227 प्राइवेट हैचारियां भी हैं जहां से बीज मिलते हैं।

सात लाख रुपए प्रति हेक्टेयर मिलता है अनुदान

नए तालाब के निर्माण के लिए सरकार द्वारा अनुदान की भी व्यवस्था है। नए तालाब के लिए सात लाख रुपए प्रति हेक्टेयर का अनुदान मिलता है। वहीं तालाब का सुधार कार्य कराने के लिए तीन लाख रुपए का अनुदान मिलता है। इसमें 75 प्रतिशत भारत और राज्य सरकार द्वारा दिया जाता है और शेष 25 प्रतिशत किसान को खुद वहन करना होता है।

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तालाब तैयार करते समय ध्यान रखें

मछली पालन करने में सबसे महत्वपूर्ण है तालाब। तालाब का चयन करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। पानी का स्त्रोत तालाब के समीप हो, ताकि जरूरत पड़ने पर उसे भरा जा सके। उसमें अनावश्यक चीजें जैसे मेंढ़क, केकड़े आदि न हों। जलीय पौधों से रहित दोमट मिट्टी वाले तालाब का चयन करना चाहिए। तालाब ऐसा होना चाहिए, जिसमें कम से कम 5-6 फुट तक पानी भरा रहे। यदि तालाब में जलीय खरपतवार या पौधे हों तो उन्हें उखाड़ देना चाहिए। ये जलीय पौधे तालाब की मिट्टी और पानी में उपलब्ध भोजन तथा पोषक तत्वों को कम कर देते हैं।

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उत्तर प्रदेश मत्स्य विभाग निरन्तर प्रयत्नशील

मछली एक उच्च कोटि का खाद्य पदार्थ है। इसके उत्पादन में वृद्धि किये जाने हेतु उत्तर प्रदेश मत्स्य विभाग निरन्तर प्रयत्नशील है। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में विभिन्न प्रकार के तालाब, पोखरें और जल प्रणालियां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं जिनमें वैज्ञानिक रूप से मत्स्य पालन अपना कर मत्स्य उत्पादन में वृद्धि करके लोगों को पोषक और संतुलित आहार उपलब्ध कराया जा सकता है।

दुनिया में मछलियों की पाई जाती हैं 20 हजार प्रजातियां

विश्व में लगभग 20,000 प्रजातियां व भारत वर्ष में 2200 प्रजातियां पाये जाने की जानकारी हैं। गंगा नदी प्रणाली जो कि भारत की सबसे बड़ी नदी प्रणाली है, में लगभग 375 मत्स्य प्रजातियां उपलब्ध हैं। वैज्ञानिकों द्वारा उत्तर प्रदेश व बिहार में 111 मत्स्य प्रजातियों की उपलब्धता बतायी गयी है।

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