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सेना की मदद से सशक्त होते कश्मीरी किसान

Arvind Kumar SinghArvind Kumar Singh   18 Dec 2017 2:33 PM GMT

सेना की मदद से सशक्त होते कश्मीरी किसानसेना की मदद से सशक्त होते कश्मीरी किसान

अरविंद कुमार सिंह

जय जवान-जय किसान का नारा लाल बहादुर शास्त्री ने देश के कठिन दौर में दिया था। इसी को आगे विस्तार दिया अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने प्रधानमंत्री काल में और जय विज्ञान भी आगे जोड़ दिया। लेकिन इस नारे को जमीन पर उतारने का काम भारतीय सेना कर रही है।

हालांकि नारे महज नारे नहीं होते वे अभियान का हिस्सा होते हैं और इसी के तहत हमारे किसानों ने रिकार्ड उत्पादन कर खाद्य मामलों में हमें आत्मनिर्भर बनाया। लेकिन आतंकवाद से जूझ रहे जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में अभी भी तस्वीर अलग है और वहां खाद्य आत्मनिर्भरता अभी भी एक सपना ही है। हालांकि यहां की 80 फीसदी आबादी खेती बाड़ी पर ही निर्भर है, लेकिन तमाम कारणों से किसान बेहाल हैं। उत्पादकता बहुत सीमित हैं और छोटे तथा मझोले किसानों की दशा तो सबसे दयनीय है।

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लेकिन पहली बार भारतीय सेना ने इन किसानों की तरफ मदद को हाथ बढ़ाया है। दुर्गम इलाकों के किसानों का आर्थिक उन्नयन सेना के एजेंडे पर प्रोजक्ट सद्भावना के तहत आया है। सेना की मदद से किसानों को खेती की अत्याधुनिक तकनीकों को जानने समझने का मौका मिल रहा है।

वैसे तो 1990 के बाद से पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद के चलते जम्मू-कश्मीर जैसा भारत का सुंदर राज्य कई क्षेत्रों में बहुत पिछड़ गया है। अर्द्धसैन्य बलों और पुलिस के हाथ से स्थितियां नहीं संभली तो कश्मीर में सेना को तैनात करना पड़ा। लेकिन तमाम स्वार्थी तत्वों ने सेना पर भी उंगली उठायी और उसकी छवि आहत करने की कोशिश की। हालांकि उनकी दाल गली नहीं। सेना ने तमाम उपायों के साथ बीते दो दशकों से प्रोजेक्ट सद्भावना के तहत जम्मू-कश्मीर के लोगों के दिलों में जगह बनाने की तमाम कोशिशें की हैं। सेना ने स्कूल खोलने से लेकर बच्चों और युवाओं को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया।

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सेना की तरफ से युवाओं और स्कूली छात्रों को भारत भ्रमण कराने के साथ ग्रामीण इलाकों में आतंकवाद से प्रभावित आधारभूत ढांचा फिर से खड़ा करने में मदद की। इससे आतंकवाद के खिलाफ मुहिम में भी सकारात्मक असर पड़ा। लेकिन पहली बार आपरेशन सद्भावना से किसानों को जोड़ने की पहल की गयी है। सेना का प्रयास है कि कश्मीर के जटिल हालात के बीच परंपरागत तरीके से खेती बाड़ी कर रहे किसान नयी तकनीकों के साथ बेहतर उत्पादन करें जिससे उनका आर्थिक उऩ्नयन हो सके। प्रोजेक्ट सद्भावना के तहत अब भारतीय सेना किसानों को कृषि व बागबानी में वैज्ञानिक तकनीक अपनाने के लिए प्रेरित कर रही है।

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इसी के तहत जम्मू कश्मीर के रामबन जिले के बेहद दुर्गम इलाके के किसानों को भारतीय सेना की मदद से देश के सबसे बेहतरीन भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई या पूसा) में दो दिन का दौरा कराया गया। मेजर राहुल पांडेय के नेतृत्व में यहां पहुंचे किसानों की टीम में अधिकतर छोटे और मामूली खेती बाड़ी से गुजारा करने वाले शामिल थे।

गरीब और कमजोर हालात के ऐसे 20 किसानों तथा किश्तवाड़ जिले के 20 सरपंचों ने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के जाने माने कृषि वैज्ञानिकों को अपनी जमीनी हकीकत से अवगत कराते हुए उनके अनुभवों को जमीन पर समझा। इसी तरह चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय हिसार में भी उन्होंने पशु पालन और दूसरे क्षेत्रों की गतिविधियों को देखा समझा। कई किसानों ने हिमाचल प्रदेश में पालमपुर के चौधरी श्रवण कुमार कृषि विश्वविद्यालय और सोलन के वाईएस परमार वानिकी विश्वविद्यालय का दौरा कर अलग अलग क्षेत्रों की जानकारी हासिल की। वहां के किसानों, मोहम्मद सलीम, अंग्रेज सिंह और गुलाम मोहम्मद लोन ने माना कि यह दौरा उनके लिए जीवन को बदलने वाला है। इससे पहली बार वे बहुत कुछ ऐसा ज्ञान हासिल करने में सफल रहे हैं जिसकी मदद से अपनी खेती की तस्वीर बदल सकते हैं।

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भारत के दूसरे हिस्सों और खास तौर पर मैदानी इलाकों के किसानों की तुलना में इन दुर्गम इलाकों के किसानों की अलग ही कहानी है। देश दुनिया से कटे इन किसानों को पहाड़ों पर बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, तिस पर वाजिब दाम और बाजार की दिक्कत है। लेकिन यहां आकर उन्होंने खेती की ताजा-तरीन तकनीकों को करीब से देखा-समझा। अपने अनुभवों के आधार पर कृषि वैज्ञानिकों के साथ उन्होंने गहन संवाद भी किया। यहां के अनुभवो से वे काफी खुश दिखे। सेना के अधिकारी और जवान समन्वय के लिए उनके साथ रहे।

रामबन के किसान फारूक अहमद ने बताया कि सेना के वे शुक्रगुजार हैं जिनकी मदद से इतना कुछ देख सके हैं और जान सके हैं। उनकी कोशिश होगी कि इसकी जानकारी वे अपने गाँवों के आसपास के किसानों को दें और राज्य सरकार से और सक्रिय पहल की मांग करें। रामबन जम्म-कश्मीर का काफी पिछड़ा इलाका है। यहां पर पानी की दिक्कतों के साथ आधारभूत ढांचा बहुत कमजोर है।

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एग्रीकल्चर टेक्नालोजी इंफारमेशन सेंटर (एटिक) के प्रभारी डॉ. एनवी कुंभरे ने पहले से ही इस दौरे को ध्यान में रख कर इन किसानों के लिए जरूरी साहित्य जुटाने के साथ विषय विशेषज्ञों की तैयारी कर रखी थी। इनको फील्ड से भी बहुत कुछ जानने समझने को मिला। जैविक खेती से लेकर संरक्षित खेती के गुर इन्होंने जाने और बायोटेक फार्म, सब्जियों की खेती, ग्रीन हाउस आदि के साथ नयी कृषि और सिंचाई की तकनीकों को देखा। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में एग्रोनामी के अध्यक्ष डॉ. विनोद कुमार सिंह और फल तथा उद्यान प्रोद्योगिकी के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. एमके वर्मा ने इन किसानों से खुल कर बात की और सवाल जवाब के साथ खेती के तमाम गुर बताए।

जम्मू और कश्मीर राज्य की 80 फीसदी आबादी खेती-बाड़ी पर निर्भर है। धान, गेहूं, मक्का, जौ बाजरा और ज्वार यहां की मुख्य फसलें हैं। कश्मीर के सेब, अखरोट और केसर दुनिया भर में विख्यात हैं। बागवानी उत्पादों से यहां के तैंतीस लाख लोगों की रोजी रोटी चलती है। लेकिन आतंकवाद के कारण यहां कृषि और बागवानी क्षेत्र में वाजिब निवेश नहीं हुआ जिससे कृषि विकास ठहरा रहा। एक तो किसानों को उपज का उचित दाम नहीं मिलता दूसरे कृषि और बागवानी उत्पादों के कारोबार पर बिचौलिए हावी हैं। कृषि क्षेत्र में जम्मू कश्मीर की औसत विकास दर बहुत धीमी है और भंडारण के साथ जरूरी आधारभूत सुविधाओं की कमी है।

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देश में सेब के कुल उत्पादन का 66 फीसदी और अखरोट का 90 प्रतिशत जम्मू-कश्मीर में ही होता है। केसर की खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार काफी मदद दे रही है। प्रधानमंत्री पैकेज में भी बागवानी क्षेत्र के विकास को 500 करोड़ रुपए दिए गए हैं। जम्मू-कश्मीर का करीब 20 फीसदी क्षेत्र बागवानी के तहत आता है। अभी यहां फलों की खेती में व्यापक संभावनाएं हैं।

लेकिन असली समस्या खाद्यान्न उत्पादन है। जरूरत से कम अनाज पैदा होने के नाते राज्य को करीब सात लाख टन अऩाज बाहर से मंगाना पड़ता है। अधिकतर किसान कमजोर दशा में हैं। हाल के सालों में जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौती यहां दिखने लगी है और कई प्राकृतिक प्रकोपों ने भी यहां के किसानों को बहुत कमजोर किया है। फिर भी जैविक खेती और कुछ दूसरे क्षेत्रों में नयी संभावनाएं हैं। जम्मू कश्मीर में कम उत्पादकता के साथ जमीनों पर दबाव भी बढ़ रहा है। थोड़ी जगह में ज्यादा करने को नयी तकनीक और संसाधन दोनों चाहिए। दुर्गम इलाकों में आतंकवाद के चलते राज्य मशीनरी खास सक्रिय नहीं है।

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जम्मू-कश्मीर क्षेत्र तीन प्राकृतिक क्षेत्रों में विभाजित है जम्मू, कश्मीर घाटी और कारगिल तथा लेह। इन तीनों क्षेत्रों की जलवायु क्रमशः ऊष्ण, शीतोष्ण और शीतप्रद है। लद्दाख तो शीत रेगिस्तान है और यहां पर खेती के लिए महज चार महीने मिलते हैं। पूरे राज्य में 24.15 लाख हेक्टेयर भूमि है, जिसमें से महज 8.26 लाख हेक्टेयर में खेती होती है। शेष भूमि पर वन या पर्वत हैं। सिंचाई की सुविधाएं बहुत कमजोर हैं। सरकार के उदासीन रवैये और आतंकवाद के चलते यहां पर कृषि का उचित विकास संभव नहीं हो पाया। अधिकांश क्षेत्रों में केवल एक फसल ही उगाई जाती है। फिर भी पिछले कुछ वर्षों के दौरान जम्मू एवं कश्मीर ने धान, मक्का, सब्जियों और केसर के उत्पादन स्तर को बढ़ाने में सफलता हासिल की है।

दरअसर प्रोजेक्ट सद्भावना जिसे पहले ऑपरेशन सद्‍भावना कहा जाता था, इसकी शुरुआत 1998 में भारतीय सेना की उत्तरी कमान ने की थी। कश्मीरी जनता और सेना के बीच बेहतर संबंध स्थापित करने के इरादे से यह पहल शुरू की गयी। इसके तहत पहले पिछड़े क्षेत्रों के वंचित बच्चों को शिक्षित करने के लिए सेना ने 55 अंग्रेजी माध्यम के गुडविल स्कूल खोले। इनमें प्रशासन औऱ शिक्षण के लिए स्थानीय लोगों की ही तैनाती की गयी। साथ ही राज्य सरकार के 2,700 स्कूलों को भी खेल सुविधाओं, कंप्यूटर, किताबें, यूनीफार्म और कई मामलों में सेना ने मदद की।

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सेना ने ग्रामीण इलाकों के विकास पर भी ध्यान दिया। गाँवों में छोटी जल विद्युत परियोजाओं के साथ आतंकवादियों के द्वारा ध्वस्त स्थापनाओं को फिर से बनाने में मदद की। साथ ही स्थानीय नागरिकों को चिकित्सा सुविधा देने और महिलाओं को सशक्त बनाने में मदद की। इसी तरह युवाओं को मशीन ऑपरेटर, कंपाउंडर, टूरिस्ट गाइड बनाने के साथ मुर्गीपालन और पशुपालन में मदद की। यहां की कनेक्टिविटी बेहतर बनाने के साथ सेना ने कई आदर्श गांव विकसित किए हैं। 2005 में आए भूकंप और फिर कई आपदाओं में भी सेना ने नागरिकों की रात दिन मदद की।

बेशक सेना एक अलग हालात में आपरेशन सद्भावना के तहत किसानों के आर्थिक उन्नयन की दिशा में एक नयी कोशिश कर रही है। लेकिन पहाड़ी इलाको के किसानों के लिए बड़े कॉरपोरेट्स और बड़ी कंपनियां सीएसआर के तहत ऐसे अभियान चलाएं तो वहां खेती बाड़ी की तस्वीर बदलने में काफी मदद मिल सकती है।

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