बड़े राजनीतिक अपराधी सरगनाओं पर हाथ रखने में पुलिस पीछे

बड़े राजनीतिक अपराधी सरगनाओं पर हाथ रखने में पुलिस पीछेअपराधी।

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में योगी सरकार आने के बाद सूबे में जिस तरह छोटे अपराधियों पर कहर बनकर यूपी पुलिस टूट पड़ी है, उससे यही प्रतीत हो रहा है कि प्रदेश से अपराध का सफाया जड़ से खत्म हो जायेगा, लेकिन इससे बिल्कुल इतर यूपी पुलिस की कार्रवाई उन अपराधियों पर आकर रुक जाती है, जिन्हें राजनीतिक संरक्षण लंबे समय से प्राप्त है। इन राजनीतिक अपराधियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई करने से कन्नी काट रही है और वह जेल में बंद रहकर जरायम की दुनिया का बखूबी संचालन कर रहे हैं।

यूपी में अगर राजनीतिक अपराधी की बात करे तो सबसे पहले नम्बर पर मऊ विधानसभा क्षेत्र से विधायक मुख्तार अंसारी का है, जो लंबे समय से जेल अदला-बदली खेल का कर रहे हैं, लेकिन आज तक अदालत में चल रहे मुकदमों में पुलिस का अभियोजन पक्ष उन पर कोई आरोप साबित नहीं कर पाया है। इसका ही फायदा उठाकर एक लंबे दशक से मुख्तार जेल में बंद होने के बाद भी पूर्वांचल में जरायम की दुनिया बड़े आराम से चला रहे हैं। जबकि कुछ माह पहले ही तीस हजारी कोर्ट से दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को बड़ा झटका लगा है। विधायक मुख्तार अंसारी, गैंगस्टटर मुन्ना बजरंगी, मिराज व इफ्तिखार को कोर्ट ने मकोका के केस से सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है।

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अदालत ने चारों आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि उक्त सभी पर अभियोजन अपना आरोप साबित करने में पूरी तरह से नाकाम रहा है। वहीं पुलिस ने उन चारों के खिलाफ मकोका मामले में अदालत में चार्जशीट फाइल की थी। पुलिस का कहना था कि ये चारों उत्तर प्रदेश व देश के कई अन्यक राज्यों में संगठित अपराध का साम्राज्यद चला रहे हैं। यह गतिविधि महाराष्ट्र ऑर्गेनाइज्ड क्राइम कंट्रोल एक्टव (मकोका) के तहत अपराध है। अदालत ने उक्त चारों पर मई, 2012 में आरोप तय करते हुए इनके खिलाफ मुकदमा चलाने के आदेश जारी किए थे, लेकिन कोर्ट ने इन सभी बाहुबली अपराधियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। यूपी में अभियोजन पक्ष लंबे समय से कमजोर रहा है, जिसका फायदा उठाकर यह अपराधी कानून का मखौल उड़ाते दिखते हैं।

कुछ यही हाल कुख्यात अपराधी मुन्ना बजरंगी का है, जो बाहुबली विधायक मुख्तार के ही आदमी कहलाते हैं। जबकि सत्ता के गलियारों में अक्सर यही चर्चा रहती है कि, मुख्तार अपनी राजनीतिक पहुंच का फायदा उठाकर मुन्ना बजरंगी को यूपी पुलिस के चंगुल से हमेशा बचाते आये हैं, जिसके चलते आजतक यूपी का अभियोजन पक्ष इन बड़े अपराधियों पर अदालत में आरोप साबित कर पाने में नाकाम रहा है।

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अगर बात करे मुन्ना बजरंगी के इतिहास की तो जौनपुर जिले के सुरेरी थाना क्षेत्र के पूरे दयाल कसेरू गाँव के पारसनाथ सिंह के बेटे मुन्ना बजरंगी और उसके साथियों ने 29 नवम्बर 2005 को गाजीपुर जिले में मोहम्मदाबाद क्षेत्र के विधायक कृष्णानन्द राय की हत्या की तो उसका नाम सुर्खियों में आ गया। इसके बाद उसने नेपाल में एक पूर्व मंत्री के घर शरण ली। इस दौरान कई बार उसके गोरखपुर में होने की खबर मिली। एक बार सहजनवा में वह पुलिस के हाथ से बच निकला। आपराधिक सफर में मुन्ना के इतने किस्से हैं जिनके लिए पन्ने कम पड़ जायेंगे।

यूपी के तीसरे बड़े बाहुबली अपराधी की बात करे तो उसमें माफिया से राजनेता बने बृजेश सिहं 90 के दशक में उत्तर प्रदेश के बाहुबली मुख्तार अंसारी के गैंग से आमना-सामना हुआ। इस दौरान वह पुलिस और मुख्तार के गैंग से बचने के लिए मुंबई चले गए। यहां पहुंचने के बाद दाऊद के करीबी सुभाष ठाकुर से मुलाकात की। फिर इनके माध्यम से दाऊद से मिले। दाऊद के जीजा इब्राहिम कासकर की हत्या का बदला लेने के लिए बृजेश 12 फरवरी 1992 को जेजे अस्पताल पहुंचा। यहां डॉक्टर बनकर गवली के गैंग के 4 लोगों को पुलिस के पहरे के बीच मार दिया। उनकी इस शातिराना चाल देखकर दाऊद बृजेश के दिमाग का लोहा मान गया। इसके बाद दोनों बेहद करीब आ गए।

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हालांकि 1993 में हुए मुंबई ब्लास्ट के बाद दोनों में मतभेद हो गया। जानकारों की मानें तो बृजेश सिंह मुंबई को दहलाने की दाऊद की योजना से पूरी तरह अनजान था। इस ब्लास्ट में हजारों बेगुनाह मारे गए और सैंकड़ों लोग घायल हुए। इस वारदात से बृजेश सिंह को गहरा आघात लगा। दाऊद के इस कदम के बाद दोनों के बीच एक दीवार खड़ी हो गई और वह दाऊद से अलग हो गया। इसके बाद तो बृजेश सिंह की गिनती राष्ट्रीय स्तर के माफिया में आने लगी, लेकिन जैसे-जैसे बृजेश सिंह का नाम ऊपर उठता गया वैसे-वैसे उसके दुश्मन भी बढ़ते चले गए और यूपी समेत पूरे देश भर में जरायम की दुनिया में बृजेश सिंह का सिक्का चलने लगा।

इसके बाद बृजेश सिंह का यूपी में दहशत का दूसरा नाम गिना जाने लगा। सूत्रों की माने तो यूपी पुलिस माफिया बृजेश सिंह पर बड़ी कार्रवाई करने जा रही थी, लेकिन इसकी भनक उसे पहले ही लग गई, जिसके चलते बृजेश सिंह ने अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर सरेंडर किया, लेकिन पुलिस रिकार्ड में इसे एक गिरफ्तारी के रुप में दिखाया गया। इसके बाद तो जेल में ही बंद रहते हुए बृजेश सिंह ने वाराणसी से यूपी से एमएलसी का चुनाव लड़ा और जीत भी गया। इसके बाद तो साफ जाहिर था कि, यूपी के अभियोजन पक्ष को अदालत में बृजेश सिंह के खिलाफ मजबूत पैरवी करने में हाथ पीछे करने पड़े और सहारनपुर जेल में बंद होने के बावजूद पूर्वांचल सहित पूरे प्रदेश में वह अपना सामाज्य स्थापित किए हुए हैं।

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कुछ ऐसा ही इतिहास जौनपुर से पूर्व सांसद धनंजय सिंह का है, जहां 1990 में हाईस्कूल में पढ़ने के दौरान लखनऊ महार्षि मंदिर के एक पूर्व शिक्षक गोविंद उनियाल की हत्या में पहली बार धनंजय का नाम आया, हालांकि पुलिस इस मामले में आरोप साबित नहीं कर पाई थी। यहीं से उन पर आपराधिक मामलों से जुड़े आरोप लगने शुरू हुए। इंटर करने के बाद लखनऊ यूनिवर्सिटी में स्नातक में प्रवेश के साथ ही छात्र राजनीति और सरकारी विभागों के टेंडर में वर्चस्व की होड़ में धनंजय का नाम कई गंभीर आपराधिक मामलों में जुड़ा। स्नातक पूरा करने के साथ-साथ हत्या की साजिश और प्रयास, लूट जैसे गंभीर मामलों से जुड़े आधा दर्जन मुकदमे लखनऊ के हसनगंज थाने में दर्ज हो गए। इसके बावजूद भी इतने वर्ष बीतने के बाद भी इन बाहुबलियों को अदालत से सजा नहीं मिल पाई।

अगर इस तरह के बाहुबली विधायकों पर कार्रवाई की बात करे तो इसमें बिहार में नवम्बर 2005 में नीतीश सरकार बनने के बाद बिहार सरकार ने अभियोजन पक्ष को इतना अधिक मजबूत किया कि, राजनीतिक अपराधियों को सलाखों के पीछे भेजने का काम कर दिया और इनके खिलाफ अदालत में मजबूत पैरवी करवा इन बाहुबली नेताओं को चुनाव लड़ने से भी वंचित कर दिया था। जिसका उदाहरण लवली आनंद, मुन्ना शुक्ला और शाहबुद्दीन जैसे सरीखे नेता रहे हैं। जबकि ऐसी राजनैतिक इच्छा अबतक योगी सरकार के अंदर नहीं दिखी, जिसका लाभ उठाकर इन बड़े अपराधियों के चेले बाहर जरायम का सामाज्य बेधड़क चला रहे हैं और इन पर हाथ रखने में यूपी भी कतरा रही है।

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वहीं इस मामले में डीजी अभियोजन सुजान वीर सिंह का कहना है कि, अभियोजन विभाग से मेरे द्धारा हत्या, लूट और डकैती से मामले में संस्तृति नहीं दी जाती है। इन मामलों में प्रदेश सरकार के गृह और न्याय विभाग से अभियोजन को तेज करने की मंजूरी ली जाती है। उन्होंने कहा कि, अभियोजन विभाग चोरी और विभागीय भ्रष्टाचार की पैरवी करता है, जहां दोषियों पर कार्रवाई जल्द करने के लिए अभियोजन पक्ष को मंजूरी दी जाती है।

वहीं यूपी में बड़े अपराधियों पर कार्रवाई के मसले पर रिटायर्ड डीजी सुब्रत त्रिपाठी ने कहा कि, यूपी में लंबे समय से बड़े अपराधियों को राजनैतिक संरक्षण मिलता रहा है, जिसके चलते पुलिस इनके सामने बौना साबित होती है। उन्होंने कहा कि, अगर योगी सरकार को कार्रवाई करनी है इन जेल में बंद अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर अभियोजन पक्ष को मजबूत करने का काम करें। उधर इस मसले पर वरिष्ठ अधिवक्ता बृजेश सिन्हा का कहना है कि, अक्सर बड़े अपराधियों पर कोर्ट में पैरवी के मामले में सरकारी वकील को साक्ष्य और सबूत कोर्ट के सामने पेश करने में पीछे रहते हैं, जिसके अदालत इन अपराधियों पर फैसला नहीं सुना पाती है और इनका केस अदालत में आजीवन चलता रहता है।

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